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गीता मैत्री
— ४१
प्रारंभिक साधक
2500 साधकों
प्रशिक्षकों की टीम
45 प्रशिक्षकों
भाषाएँ
13 भाषाओं
जेल कक्षाएँ
50 जेलों में
इतिहास और विकास (2020–2025)

॥ श्री गणेशाय नमः॥

आइए , जानते है इन पांच वर्षों की यात्रा के हर छोटे – बड़े पड़ाव के बारे में जिसमें आप जैसे साधकों का भी योगदान है।

२०२० से २०२५ तक गीता परिवार की वृद्धि दर्शाता आँकड़ा-चित्र — ३ से १३ भाषाएँ, २५०० से १२.५ लाख साधक, १ से १८० देश।

सन 2020..
हर तरफ मायूसी, निराशा का माहौल .. कोरोना वायरस अज्ञात शत्रु की तरह इंसानों के जीवन पर काल बनकर व्याप्त हो रहा था।


हर तरफ से प्राप्त नकारात्मक सूचनाये मानव मन को व्यथित कर रही थी। ऐसे असमंजस के माहौल में एक आवाज ने सबके मन में ऊर्जा भर दी ..


यह आवाज आ रही थी गीता परिवार से ..“आओ गीता सीखें “

और फिर जैसे हर व्यक्ति को संजीवनी मिल गई।

जिस किसी के पास यह ऑनलाइन जुड़ने के लिए लिंक पहुंची वह अपने आप को भाग्यवान मानने लगा।
मात्र दो दिन में 2000 से ज्यादा लोगों ने रजिस्ट्रेशन करवा लिया। लगभग हर उम्र के लोगों ने रजिस्ट्रेशन करवाया जिसमें महिलाओं की संख्या ज्यादा थी।

सघन वन में हवाओं की सायं सायं के बीच जैसे किसी ने बांसुरी की धुन छेड़ दी हो ऐसा सभी को प्रतीत हो रहा था। हर तरफ चर्चा का विषय था कि गीता परिवार द्वारा ऑनलाइन गीता जी के श्लोक सिखाए जा रहे है। लोगों को संशय था कि हमें पढ़ना आयेगा या नहीं क्योंकि हमें तो संस्कृत ही नहीं आती ..लेकिन जब पढ़ना / पढ़ाना आरंभ हुआ तो देखते ही देखते दो हजार की संख्या बीस हजार में बदल गई। और आज 2025 में हम बारह लाख के पार है।


आइए, जानते है इन पांच वर्षों की यात्रा के हर छोटे – बड़े पड़ाव के बारे में जिसमें आप जैसे साधकों का भी योगदान है।

एक घोष वाक्य से नवचेतना
परम पूज्य गुरुदेव के प्रेरणादायी घोषवाक्य – “गीता पढ़ें, पढ़ाएँ, जीवन में लाएँ” – ने असंख्य हृदयों में नवचेतना का संचार किया। इसी प्रेरणा से, स्वामीजी के कृपापात्र शिष्य एवं लखनऊ निवासी, गीता परिवार के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष (वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष) डॉ. आशू गोयल ने एक अद्भुत संकल्प लिया — “जन-जन तक गीता का संदेश पहुँचाना और गीता को सरलता से सिखाना।”
यह संकल्प सुनते ही गीता परिवार के हर कोने में उत्साह की लहर दौड़ गई।

यद्यपि गीता परिवार पिछले 35 वर्षों से देशभर में सेवा कर रहा था — बच्चों में संस्कारों के बीज बोना, बड़ों को जीवन में गीता का मर्म अपनाने की शिक्षा देना — फिर भी समय की पुकार अलग थी। विभिन्न स्थानों पर विशेषज्ञों द्वारा गीता का ज्ञान दिया जाता रहा, लेकिन अब आवश्यकता थी कि यह अमृत ऑनलाइन माध्यम से हर घर तक पहुँचे।

आशू भैया ने हार न मानते हुए टीम बनाई, व्हाट्सएप और झूम से जुड़ने की सरल वीडियो गाइड तैयार की, और साधकों को भेजी। साथ ही, प्रशिक्षकों की खोज भी पूरी तत्परता से शुरू हुई। राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष डॉ. संजय मालपाणी, गीता परिवार की हमारी स्वर कोकिला आ.सुवर्णा मालपाणी जी, नागपुर निवासी श्री श्रीनिवास वर्णेकर व श्रीमती वंदना वर्णेकर जैसे समर्पित सहयोगियों के साथ मिलकर 45 प्रशिक्षकों की सशक्त टीम खड़ी हुई। उतने ही जोशीले 45 तकनीकी सहायकों का दल भी साथ आया।

फिर आया प्रचार का दौर — व्हाट्सएप लिंक, झूम लिंक, और सोशल मीडिया के जरिए हर कोने में यह संदेश फैलाया गया। परिणाम अद्भुत रहा — शुरुआती दौर में ही हिंदी भाषा के 45 वर्गों में 45 प्रशिक्षक, 45 तकनीकी सहायक और 2500 साधक जुड़ गए।

इस अप्रत्याशित और अपार प्रतिसाद ने सभी का उत्साह दोगुना कर दिया। इसके बाद तो हर दो महीने में नवाचार और सुधार होते गए — साधकों का परिचय सत्र, आनंद उत्सव और अन्य रचनात्मक आयोजन इस परिवार को और मजबूत करते रहे। धीरे-धीरे यह सिर्फ़ “ऑनलाइन क्लास” नहीं रहा, बल्कि एक जीवंत, स्नेहमय और आध्यात्मिक परिवार का रूप ले लिया, जहाँ हर कोई गीता साधना की धारा में बहता चला गया।

एक से अनेक भाषाओं की ओर : गीता परिवार का महाविस्तार

साधकों की प्रबल इच्छाशक्ति और सेवा-भाव ने गीता परिवार की सीमाएँ लगातार बढ़ाईं। जो यात्रा एक भाषा से आरम्भ हुई, वह देखते-देखते अनेक भाषाओं में बहने लगी। मात्र एक वर्ष में 6 भाषाओं में संपूर्ण पाठ्यक्रम तैयार हो गया, और हर तीन महीने में एक नई भाषा का पुष्प इस बगिया में खिलने लगा। आज, 13 भाषाओं में गीता की कक्षाएँ निर्बाध रूप से प्रवाहित हो रही हैं — मानो गीता का संदेश हर दिशा में अपनी गूंज फैला रहा हो।

2500 साधकों और 1000 कार्यकर्ताओं से प्रारंभ हुई यह साधना-यात्रा, आज 12 लाख साधकों और 12 हजार समर्पित कार्यकर्ताओं के विराट स्वरूप में विकसित हो चुकी है। और अद्भुत यह कि – अधिकांश एक-दूसरे को जानते तक नहीं, फिर भी इस मंच पर सभी परिवार की तरह घुल-मिल गए हैं। भारत ही नहीं, विश्व के कोने-कोने से साधक और सेवी इस गंगा में आचमन करने चले आ रहे हैं — और यह प्रवाह अविराम है।

प्रथम स्तर : 2 अध्याय
द्वितीय स्तर : 4 अध्याय
तृतीय स्तर : 6 अध्याय
चतुर्थ स्तर : 6 अध्याय

गीता का मर्म – विवेचन सत्र
श्लोकों के साथ उनके गूढ़ मर्म को समझने के लिए शनिवार और रविवार को विशेष विवेचन सत्र आरंभ हुए।
इनका संचालन संजय जी मालपाणी, डॉ. आशू जी गोयल, श्रीनिवास जी वर्णेकर, वंदना जी वर्णेकर, श्रद्धा जी रावदेव, विकास जी वैद्य, रूपल जी शुक्ला और कविता जी वर्मा जैसे अनुभवी मार्गदर्शकों द्वारा किया जाता है।
बालकों हेतु विशेष विवेचन का संचालन ज्योति जी शुक्ला, जाह्नवी जी देखणे और श्रुति जी नायक करती हैं।

सेवा और समर्पण का अद्वितीय भाव

जो भी गीता परिवार से जुड़ता है, वह मानो जीवन का एक नया उद्देश्य पा लेता है — गीता सेवा। निःशुल्क चलने वाली इन कक्षाओं में सभी, अपनी क्षमता और समय के अनुसार सेवा में जुट जाते हैं — कोई प्रशिक्षक बनता है, कोई तकनीकी सहायक; कोई कॉलिंग टीम में जुड़ता है, तो कोई संगठन की बागडोर संभालता है।
अनुशासन और सुचारू संचालन हेतु समूह संचालक (GC), बैच संचालक (BC) और सूत्र संचालक जैसी जिम्मेदारियाँ अनेक सेवकों ने अपनाई हैं।

इसी भावना से प्रेरित होकर परीक्षाओं और उपाधियों की योजना बनाई गई—ताकि साधक उत्साहपूर्वक आगे बढ़ें और हर स्तर पर अपनी प्रगति का अनुभव करें।

साधना के सोपान: उपाधियों की गरिमामयी यात्रा
प्रथम स्तर: गीता गुंजन
द्वितीय स्तर: गीता जिज्ञासु
तृतीय स्तर: गीता पाठक
चतुर्थ स्तर: गीता पथिक एवं गीता व्रती

इन उपाधियों ने साधकों के मन में आत्म-सम्मान और आनंद की एक नई लहर उत्पन्न की। और फिर आया सर्वोच्च चरण — जिन साधकों ने पूरी गीता कंठस्थ कर ली, वे गीता व्रती बने। और जो इससे भी आगे बढ़े, उन्हें मिली विचक्षण की गौरवपूर्ण उपाधि। जो कभी गीता से अनभिज्ञ थे, वे आज गीता के चलते-फिरते भंडार बन गए हैं।

* जेलों में गीता की गूँज: अंधकार में आशा का आलोक*

परम पूज्य स्वामीजी के हृदय में यह विचार प्रस्फुटित हुआ— “गीता का प्रकाश जेल में बंद कैदियों तक फैलाना चाहिए।”

क्योंकि कोई भी व्यक्ति जन्म से अपराधी नहीं होता, बल्कि उसके कर्म उसे उस मार्ग पर ले जाते हैं। और भगवद् गीता तो कर्मयोग का ग्रंथ है। सेवादल ने इस संकल्प को सहर्ष स्वीकार किया। कुछ ही समय में, ज़ूम पैनल के माध्यम से कई राज्यों की जेलों में गीता की कक्षाएँ आरंभ हो गईं। यह एक ऐतिहासिक प्रयोग था।

कैदियों को ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके टूटे हुए दिलों पर मरहम लगा दिया हो। अंधेरी कोठरियों में ज्ञान का दीप प्रज्वलित हुआ और उसका प्रकाश उनकी अंतरात्मा तक पहुँचा।

* संख्या नहीं, संकल्प की शक्ति: कैदियों की साधना के आँकड़े*
50 जेलों में
2000+ कैदी गीता पाठ में संलग्न
500+ कैदी गीता गुंजन परीक्षा में सफल
50+ कैदी गीता जिज्ञासु परीक्षा में सफल
15+ कैदी गीता पाठक परीक्षा में सफल
9 कैदी गीता पथिक परीक्षा में सफल

राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में ये कक्षाएँ आज भी निर्बाध रूप से चल रही हैं। साथ ही, चर्चा सत्र और संवाद सेतु के माध्यम से उनके विचारों, स्वभाव और आत्मविश्वास में आश्चर्यजनक परिवर्तन आया है।

प्रेरणादायक उपलब्धियाँ:
100 से अधिक विद्यालयों में गीता कक्षाएँ संचालित
4000 से अधिक बालकों ने गीता गुंजन प्रमाणपत्र प्राप्त किया
हर प्रमाणपत्र के साथ उनके मन में संस्कारों का बीज बोया गया है
जो आगे चलकर समाज में फलित होकर एक गीता युग की नींव रखेगा

यह गीता युग है: कलियुग में ज्ञान का नवप्रभात
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे || 4.8
कुछ लोग कहते हैं कि यह कलियुग है—अंधकार, भ्रम और अधर्म का युग। पर हम कहते हैं, यह गीता युग है—ज्ञान, भक्ति और कर्म की पुनर्स्थापना का युग। यह वह समय है जब श्रीमद्भगवद्गीता केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शक बन रही है। यह युग है जब हर घर में गीता की गूंज हो, हर हाथ में गीता का कर्मयोग हो, और हर हृदय में गीता का समर्पण हो।

गीता परिवार में जो एक बार जुड़ता है, वह केवल एक साधक नहीं रहता—वह इस आध्यात्मिक परिवार का अभिन्न अंग बन जाता है। यहाँ सेवा न स्वार्थ से होती है, न दिखावे से—यह सेवा होती है समर्पण से, श्रद्धा से, और जनकल्याण की भावना से। हमारे कार्यकर्ता न केवल प्रचारक हैं, वे गीता के जीवंत उदाहरण हैं—जो अपने जीवन से गीता के सिद्धांतों को साकार कर रहे हैं।

“हर घर गीता, हर कर गीता” का यह संकल्प कोई अभियान मात्र नहीं है, यह एक चेतना है, एक क्रांति है, एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण है। और इस पुनर्जागरण में आप सभी का योगदान अमूल्य है। आप सभी को सादर वंदन, जिन्होंने इस युग को गीता युग बनाने में अपना तन, मन और समय समर्पित किया।

ईश्वर भक्ति की निर्मल धारा, संस्कारों की गहराई, और सेवा की भावना से सिंचित यह गीता परिवार आज एक आंदोलन बन चुका है—एक ऐसा आंदोलन जो न केवल जीवन बदलता है, बल्कि समाज को दिशा देता है।

यह गीता युग है। यह हमारा युग है। यह गीता परिवार का युग है।

मात्र दो दिन में 2000 से ज्यादा लोगों ने रजिस्ट्रेशन करवा लिया।

2500 साधकोंप्रारंभिक साधक
45 प्रशिक्षकोंप्रशिक्षकों की टीम
13 भाषाओंभाषाएँ
50 जेलों मेंजेल कक्षाएँ

इतिहास और विकास (2020–2025)