गीता मैत्री
अंक १ · जून २०२५
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपने को अधोगति में न डाले; क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा ही आत्मा का शत्रु।
( गीता ६.५ )
अनुक्रमणिका
१हमारे पथप्रदर्शक५१ मिनट
जीवन विजय के मंत्र२ मिनट↓
मामनुस्मर युध्य च५ मिनट↓
वन्दे मातरम् !८ मिनट↓
२इतिहास और विकास (2020–2025)१४ मिनट
॥ श्री गणेशाय नमः॥९ मिनट↓
Marking a Milestone५ मिनट↓
३संस्थागत संरचना९१ मिनट
वॉलंटियर प्रशिक्षण मॉडल४ मिनट↓
पाठ्यक्रम व परीक्षायें४ मिनट↓
अनुक्रमणिका · २
वैचारिक विवेचन सत्र३ मिनट↓
साधक से गीताप्रेमी तक११ मिनट↓
महाकुम्भ में महाप्रचार१० मिनट↓
गीता मैत्री मिलन२३ मिनट↓
४शैक्षणिक योगदान१ मिनट
अनुक्रमणिका · ३
५सेवा और संगठन४ मिनट
६विशेष अनुभाग२० मिनट
Local to Global२ मिनट↓
७भाव एक भाषा अनेक५४ मिनट
भाव एक भाषा अनेक५४ मिनट↓
८संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वर९ मिनट
९रचनात्मक पेज८ मिनट
रामायण प्रश्नावली१ मिनट↓
भगवद्गीता प्रश्नावली:१ मिनट↓
Find in Image – 1१ मिनट↓
अनुक्रमणिका · ४
६अनुभाग १
हमारे पथप्रदर्शक
८ रचनाएँ
अनुभाग २
इतिहास और विकास (2020–2025)
२ रचनाएँ
अनुभाग ३
संस्थागत संरचना
१६ रचनाएँ
अनुभाग ४
शैक्षणिक योगदान
१ रचनाएँ
अनुभाग ५
सेवा और संगठन
१ रचनाएँ
अनुभाग ६
विशेष अनुभाग
३ रचनाएँ
अनुभाग ७
भाव एक भाषा अनेक
१ रचनाएँ
अनुभाग ८
संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वर
१ रचनाएँ
अनुभाग ९
रचनात्मक पेज
८ रचनाएँ














