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गीता मैत्री
३३ — ४१
संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वर महाराज
संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वर

संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वर महाराज

इस वर्ष उनका 750 वां जन्म महोत्सव मनाया जा रहा है। इसी उपलक्ष्य में पसायदान का भावार्थ और महाराज के अलौकिक जीवन पट में झांकने का प्रयास करते हैं।

ll माऊली ll

७५० वा जन्मोत्सव

विश्व कल्याण का राजमार्ग : पसायदान

महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले के नेवासा तालुका में सात सौ वर्ष पूर्व अद्द्भुत घटना घटी, वहाँ के अमृतवाहिनी भगवती प्रवरा नदी के तट पर भगवान मोहिनी राजा के श्रीक्षेत्र में, विशाल अतिसुन्दर महादेव मंदिर के प्रांगण में अपने सद्गुरु श्री निवृत्तिनाथ के कृपा प्रसाद से, श्रीज्ञानेश्वर महाराज के मुखारविन्द से गीता के भावार्थरुपी भाष्य स्वरूप, 9000 ओवियों की (मराठी काव्य शैली) ज्ञानेश्वरी प्रस्फुटित हुई। गीता का सन्देश केवल संस्कृत पण्डितो तक सीमित न रहे, वह सामान्य जनों के हृदय तक संक्रमित हो इस उद्देश्य से महाराज ने गीता गंगा को सरल, हृदयस्पर्शी प्राकृत भाषा में प्रवाहित किया।

सारे उपनिषदों का सार भगवदगीता में है। इस भगवद्गीता का अर्थ सहित विस्तार करते हुए मधुरता के साथ रचा गया दिव्य रसायन ही ज्ञानेश्वरी है। जिसके समापन मे उन्होंने

विश्वकल्याण हेतु, विश्वात्मक परमात्मा के चरणों में जिस मंगल प्रसाद की याचना की, वह सम्पूर्ण विश्व मे अद्वितीयप्रार्थना है – जिसे पसायदान के रूप में जाना जाता है।

पसाय का अर्थ है प्रसाद। प्रभु से यह प्रसाददान का वरदान पाकर सन्तुष्ट होकर महाराज ने 21 वर्ष की छोटीआयु में ही कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी, शके 1296 को पुणे के समीप इन्द्रायणी नदी के सान्निध्य में, आळंदी में संजीवन समाधि ली।

सात सौ पचास वर्ष पूर्व का समय, जब सम्पूर्ण भारतवर्ष विदेशी आक्रमणकारियों के चपेट में था, धर्मान्धता चरम सीमा पर थी। सामान्य जनमानस भारतीय सनातन संस्कृति के चरम सिद्धान्तों को आत्मसात करने में असमर्थ था। ऐसे विपरीत परिस्थिति से में पैठण के नजदीक आपेगाव में जन्मा एक तेजस्वी, तपपूर्ण, विरागी युवक तीर्थयात्रा के लिए माता पिता की आज्ञा से घर से चल पड़ा | जिसका नाम था विठ्ठलपंत कुलकर्णी, यात्रा करते हुए विठ्ठलपंत आळंदी पहुंचे ! वहाँ उनका निवास सिद्धोपंत कुलकर्णी के घर पर था।

एक रात स्वप्न में दोनों को भगवान शिवजी का दर्शन हुआ। सिद्धोपन्त की तपस्विनी उपवर कन्या रुक्मिणी का विवाह विठ्ठलपंत से करने की शिवजी ने आज्ञा दी। वैराग्य की प्रतिमूर्ति विठ्ठलपंत ने शिवजी की आज्ञा को सर आँखो रख कर विवाह तो किया किन्तु उनका मन ईश्वर के प्रति आकृष्ट था। संसार में मन न लगने के कारण उन्होंने सन्यास धर्म स्वीकार ने हेतु गृहस्थाश्रम का त्याग किया। काशी नगरी में माँ गंगा के

तट पर अलौकिक सद्गुरु से उन्होंने सन्यास दीक्षा ग्रहण की। सन्यास के पश्चात उनका नाम चैतन्य स्वामी हुआ।

पति के बार-बार सन्यास धर्म स्वीकारने की प्रार्थना के कारण, अनावधान से रुक्मिणी देवी ने अनुज्ञा तो दे दी, लेकिन उन्होंने पति के पुनरागमन के लिए तीव्र व्रत, अनुष्ठान और तपाचरण आरंभ किया। इसके परिणाम स्वरूप एक विलक्षण घटना घटी। श्री विठ्ठल पंत को सन्यास दीक्षा देने वाले सद्‌गुरू स्वामि श्री रामेश्वर के दर्शन के लिए निकले और चलते हुए आळंदी आ पहुँचे। रुक्मिणी ने जैसे ही इस तेजस्वी महापुरुष की चरणवन्दना की, उनके मुख से “पुत्रवती भव” यह आशीर्वचन निकले। रुक्मिणी देवी भावविभोर हो गई, आँखों से अश्रुप्रात होने लगा।

सारा वृत्तान्त पूछने पर स्वामिजी के ध्यान मे आया कि उनका शिष्य चैतन्य ही रुक्मिणी देवी के पति हैं। वे तुरंत काशी लौटे और विठ्ठलपंत से कहा, “मेरे मुख से प्रभु के आशीर्वचन निकले हैं वे सत्य ही होंगे, त्वरीत गृहस्थाश्रम स्वीकार करो।” गुरु आज्ञा लेकर विठ्ठलपंत लौटे, रुक्मणि का पत्नी रूप में स्वीकार किया। तात्कालिक समाज के धर्म मार्तण्डों को यह मान्य नहीं हुआ। उन्हें समाज से बहिष्कृत किया गया विठ्ठलपंत – रुक्मणि के दिव्य तपःपूत गृहस्थाश्रम के आचरण के फल स्वरूप उनकी कोख से निवृत्ति, ज्ञानदेव, सोपान और मुक्ताई इन चार अलौकिक दिव्य बालकों ने जन्म लिया।

निवृत्तिनाथ शिवजी के, ज्ञानदेव भगवान विष्णु के, सोपानदेव ब्रह्माजी के और मुक्ताई आदिमाया की अवतार थे। ज्ञानेश्वर महाराज का जन्म तो जन्माष्टमी के दिन कृष्ण जन्म के समय मध्यरात्रि में ही हुआ है।

सन्न्यासी के पुत्र इस रूप मे संबोधित करते हुए समाज की घोर अवहेलना, अपमान, अत्याचार, उपहास का सामना इन दिव्य बालकों को करना पड़ा। पुत्रों के उपनयन संस्कार के लिए विठ्ठलपंत ने धर्ममार्तंडों का अनुनय किया। उन्हे देहान्त प्रायश्चित्त की सजा सुनाई गई। पुत्रों के कल्याण हेतु माता-पिता ने अत्यंत व्यथित अंतःकरण से प्रयाग में अपने देह का गंगार्पण किया। उस समय बड़े पुत्र निवृत्ति की अवस्था केवल दस वर्ष की थी।

माता-पिता के अचानक निर्वाण के कारण ज्ञानदेव, सोपान और मुक्ताई के हृदय विदीर्ण हो गए। लेकिन निवृत्तिनाथ जिन्हे 8 वर्ष की आयु में सद्गुरु गहिनीनाथ से त्र्यबकेश्वर में नाथ सम्प्रदाय की दीक्षा प्राप्त हुई थी। उन्होंने अपने भाईयों को सम्हाला। ज्ञानदेव को प्रथम अनुग्रहित किया। ज्येष्ठ भ्राता ही सद्गुरु प्राप्त हुए। उनके कृपा प्रसाद से ज्ञानदेव आत्मानन्द की दिव्य अनुभूति प्राप्त हुई। इसी आन्मानन्द के अमृत वर्षा उन्होंने ज्ञानेश्वरी के माध्यम से अपने श्रोताओं पर बरसाई। वे कहते हैं –

आर्ताचेनि वोरसे, गीतार्थन ग्रन्थन मिसे | वरिषला झान्तरसे, तो हा ग्रन्थु | |

ज्ञानेश्वरी के पदों से शान्त रस प्रवाहित होता है। उसके पठण से मन की चञ्चलता नष्ट होकर एकाग्रता बढ़ती है। उसकी विलक्षणता ये है कि सामाज के किये अत्याचारों की एक भी नकारात्मक प्रतिक्रिया ज्ञानेश्वरी में नहीं है।

समाज ने विष रूप हलाहल दिया, इस नीलकण्ठ ने वह केवल पचाया ही नहीं उसे ज्ञानामृत मे परिणित कर श्रोताओं के मन को प्रशान्ती की अनुभूति दी और समापन में विश्व कल्याण हेतु, विश्वात्मक परमात्मा के चरणों मे विश्व मांगल्य के लिए अद्वितीय अलौकिक प्रसाद दान की याचना की – पसायदान या प्रसाद दान के रूप में

आता विश्वात्मके देवे, येणे वाग्यज्ञे तोषावे। तोषोनि मज द्यावे पसायदान हे।।

पसायदान

आतां विश्वात्मके देवें, येणे वाग्यज्ञे तोषावें,

तोषोनि मज द्यावे, पसायदान हे ||1||

हे विश्वात्मक परमेश्वर आप ही के प्रेरणा से, कृपा से, संपन्न हुए मेरे इस वाग्यज्ञ से संतुष्ट होकर आप मुझे यह प्रसाद रुपी दान दीजिए।

जे खळांचि व्यंकटी सांडो, तया सत्कर्मी रती वाढो,

भूतां परस्परे पडो, मैत्र जीवांचे ||2||

सबसे पहले दुष्टों पर कृपा कर दो उनकी दुष्टता नष्ट हो, ऐसी प्रेरणा मिले कि वो सत्कर्म करने लग जाये

संसार के सारे लोगों का एक दुसरों के साथ परस्पर खूब प्रेम हो,मैत्र बढो।

 दुरितांचे तिमिर जावो, विश्व स्वधर्म सूर्ये पाहो,

जो जे वांछील तो तें लाहो, प्राणिजात ||3||

पाप का अंधकार समाप्त हो जाये, स्वधर्म का सूर्योदय हो कर के लोगों की दृष्टि साफ हो जाये, उन्हे हमें क्या करना चाहिए वो साफ दिखे, सबको वो वस्तू मिले जिसे वो चाहे।

वर्षत सकळ मंडळी, ईश्वरनिष्ठांची मांदियाळी,

अनवरत भूमंडळी, भेटतु भूता ||4||

जिनके आचार, उच्चार व विचार से सभी प्रकार की मंगलता बरसती है ऐसे ईश्वरनिष्ठ श्रेष्ठ श्रद्धावान,भूमंडल पर सभी जीवों से निरंतर मिलते रहे।संसार के लोगों को सत्संग प्राप्त हो जाये।जीवन का कल्याण संत के संग हो जाए।

चला कल्पतरूंचे आरव,चेतना चिंतामणींचे गांव,

बोलती जे अर्णव, पीयूषांचे ||5||

ऐसे संत अत्यंत बडी संख्या मे संसार को प्राप्त हो, जो कल्पतरू के उद्यान के समान हो।

(अर्थात कल्पवृक्ष यह हर एक इच्छा को पूरा करने वाला वृक्ष माना जाता है)

ये चेतना चिंतामणि के गाव हो, मानव जिस वस्तूका चिंतन करता है उसे देने वाले रत्न को चिंतामणी कहते है। मानव द्वारा चिंतन की गई उचित वस्तूओं को ही प्रदान करते है।

बोलने लगे तो मानो ऐसा बोल दे की भक्ति रूपी अमृत के सागर अपने आप प्रकट हो।

चन्द्रमें जे अलांछन, मार्तण्ड जे तापहीन,

ते सर्वाही सदा सज्जन, सोयरे होतु ||6||

ऐसे संत मिले जो चंद्रमा समान शितल हो पर चंद्रमा जैसे कलंक नाही हो,सूर्य जैसे तेजस्वी हो पर सूर्य मे जैसे ताप है वैसे ताप न हो। ये किसी का दाह न करे,

किंबहुना सर्व सुखी, पूर्ण होवोनि तिहीं लोकी,

भजिजो आदिपुरुषीं, अखण्डित ||7||

संत संगतीसे हर जीवमात्र को तीनो लोक के सारे सुख प्राप्त हो। उनके संस्कार से आपका भजन करने की प्रवृत्ती निर्माण हो सभी के भीतर आपकी भक्ति सुदृढ हो जाये, वो अखंड रहे।

आणि ग्रंथोपजिवीये, विशेषीं लोकीं इयें,

दृष्टादृष्ट विजये, हो आवें जी ||8||

जिन लोगो ने इस ग्रंथ को अपना जीवन धन बताया उन लोगो को इस संसार मे और इसके पश्चात परलोक मे भी दिव्य गती, सद्गती, शांती प्राप्त होवो विजय हो करके व इस संसार से चले और सीधे परमात्मा के पास जाकर के जीवन की कृतार्थता का अनुभव दे

येथ म्हणे श्री विश्वेश्वरावो, हा होईल दान पसावो,

येणे वरें ज्ञानदेवो, सुखिया झाला ||9||

समस्त देवी देवता ओके पक्षात स्वरूप निवृत्तीनाथ महाराज सद्गुरु के रूप में बैठे बैठे इन सारी बातों को सुन रहे थे

जैसे ही महाराज की प्रार्थना पुरी हुई और हात जोड के उन्होंने निवृत्तीनाथ महाराज की ओर देखा,तो गुरुवर्य निवृत्तीनाथ जीने हात उठा कर के कहा तथास्तु ऐसा ही होगा

यह सुनकर संत श्रेष्ठ श्री ज्ञानेश्वर जी महाराज परम आनंदित हो गये

पसायदान(हिन्दी अनुवाद)

विश्वात्मक परमात्मा, अब इस वाग्यज्ञ से राजी हो

प्रसन्न हो कर मुझे प्रभो बस यह वरदान प्रसादी दो।।१।।

दुष्टों की वक्रता छूटवे, सत्कर्मो मे निरत रहे

जीव मात्र मे सबसे सबकी अटूट मैत्री हो जाये।।२।।

अंधकार पापों का मिटकर स्वधर्म रवी हो जाये उनित

प्राणी मात्र को मिले वही जो उन्हे रहा हो चिर वांछित।।३।।

वर्षा समविध मंगलता की करने वाले संतजन 

भू मंडल पर सदैव उनका सबसे मंगल हो मिलन।।४।।

सचल कल्पतरू के उपवन जो बोल रहे अमृतसागर 

सजीव चिंतामणी समूह के मानो बस गये नगर।।५।।

लांछन रहित चंद्रमा मानो ताप रहित रवी अथवा जो

ऐसे सज्जन मिले सभी को बन समधी सम आप्त हो।।६।।

तीन्ही लोकों के वासी हो सकल सुखों के पूर्ण सदा 

आधी देव को भजे निरंतर प्रेम भाव से सदा।।७।।

और विशेष रूप से जिनको जीवनधन यह ग्रंथ रहे 

 इस परलोक कही भी उनके विजय सर्वदा साथ रहे।।८।।

यह सुनकर विश्वेश्वर बोले यही मिलेगा प्रसाद दान 

पाकर यह वर ज्ञानेश्वर भी हुए पूर्ण आनंद मगन।।९।।

निवृत्तिनाथ शिवजी के, ज्ञानदेव भगवान विष्णु के, सोपानदेव ब्रह्माजी के और मुक्ताई आदिमाया की अवतार थे।

9000 ओवियोंज्ञानेश्वरी
कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी, शके 1296संजीवन समाधि
मंडल आकृति वाली हल्की क्रीम रंग की सादा पृष्ठभूमि।
मंडल आकृति वाली हल्की क्रीम रंग की सादा पृष्ठभूमि।