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गीता मैत्री अंक २नवम्बर से दिसम्बर २०२१
०९गीता जयंती महोत्सव

गीता जयन्ती उत्सव

गीता परिवार द्वारा प. पू स्वामीजी श्रीगोविन्ददेव गिरि जी महाराज, संस्थापक अध्यक्ष, गीता परिवार तथा आचार्य श्री पुण्डरीक गोस्वामीजी महाराज के पावन सान्निध्य में 5159वां गीता जयंती उत्सव, मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी,संवत् 2078 तदनुसार 14 दिसंबर 2021 को बड़े हर्ष और उत्साह के साथ मनाया गया।

गीता जयन्ती उत्सव

14 दिसम्बर, 2021 https://youtu.be/oTQ7pmh7v8U

भारतीय परंपरा का निर्वाहन करते हुए मंगलाचरण प्रार्थना से कार्यक्रम का शुभारंभ गुरुअष्टकम स्तोत्र के संगीतमय पठन, गीता जी पर आधारित शास्त्रीय नृत्य नाटिका व योग प्रदर्शन के साथ हुआ।

गीता परिवार के राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष डॉ संजय जी मालपाणी द्वारा परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री गोविन्ददेव गिरि जी महाराज व परम आदरणीय आचार्य श्री पुण्डरीक गोस्वामीजी महाराज के श्री चरणों में प्रणिपात करते हुए कहा कि आ.स्वामीजी ने श्रीमद्भगवद्गीता रूपी पारसमणि हमें सौंप कर हमारा जीवन स्वर्णिम बना दिया है। उन्होंने कहा कि 2 वर्ष पूर्व संगमनेर में संपन्न हुए गीता जयंती महोत्सव में 35000 बच्चों द्वारा और अन्य साधकों द्वारा गीता जी के 12वें व 15वें अध्याय का सस्वर पाठ किया गया था तथा प.पू स्वामीजी के 71वें जन्मदिवस पर 71,000 पाठ करके उनको मंगलकामनाएं अर्पित की थीं।

आ.संजय भैय्या द्वारा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आ.आशू जी गोयल, गीता चिन्तनिका प्रमुख, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, श्री हरिनारायण जी व्यास, श्री गोविंद जी माहेश्वरी, श्रीमती प्रमिला जी माहेश्वरी, कलकत्ता से संदीप जी सोमाणी, सभी उपाध्यक्षों व आंचल प्रमुख, गीता परिवार राष्ट्रीय कार्यकारिणी, संथा वर्ग कार्यकर्ताओं, गीता सेवियों, लाखों साधकों का अभिनंदन किया।

गीता परिवार की गतिविधियों की सामान्य जानकारी देते हुए दक्षिणांचल प्रमुख, गीता चिन्तनिका प्रमुख, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री हरिनारायण जी व्यास द्वारा बताया गया कि इस समय गीता परिवार द्वारा 117 देशों में गीता शिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं । प्रतिदिन 5000 कार्यकर्ता, 956 जूम वर्ग से 300000 साधक लाभान्वित हो रहे हैं। सतत प्रयासों से प्रतिमाह 30 से 40 हजार साधक अगले स्तर पर प्रशिक्षण हेतु जुड़ते हैं। समय समय पर साधकों को अनेक वन्दनीय संत महात्माओं का आशीर्वाद भी मिलता रहता है।

इस अवसर पर प. पू स्वामीजी ने कहा कि गीता परिवार का वैनतेय अपने दो पंखों के साथ यानि भगवद्गीता और भारत माता इन पंखों के संग जीवन के अंतिम लक्ष्य यानि मानव कल्याण के लिए निर्बाध गति से चल रहा है। स्वामी जी ने कहा कि हमें अध्यात्म प्रवण उर्जा को राष्ट्रभक्ति का आयाम और राष्ट्रभक्ति की वाणी, कण्ठ व हृदय में भगवद्गीताके श्लोकों के बीच सामंजस्य स्थापित कर मानवता के कल्याण की ओर अग्रसर होना होगा।

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जीवन का कोई भी सेवा कार्य अध्यात्म का अनुष्ठान लिए बिना, अंत तक बिना थके, बिना रुके पूर्ण नहीं होता। अध्यात्म का कार्य जब तक सेवा में परिणित नहीं होता तब तक व्यावहारिक स्तर पर दिखाई नहीं देता है।हम अपने प्यारे भारतवर्ष को यही कहें, जैसे वनवास मे निराश पांडवों से मिलने गए भगवान श्री कृष्ण ने कहा था -मैं तुम्हारा हूँ, तुम्हारे साथ हूँ।आपका विरोधी मेरा विरोधी और आपका सहयोगी मेरा सहयोगी।वैसे ही हम अपने प्यारे भारतवर्ष को यही कहें कि मैं स्वयं, मेरा तन,मन,धन तुम्हें समर्पित है। आपकी परंपराओं का सम्मान करने वाला जो भी होगा उसे मैं मित्र मानूँगा जो सम्मान नहीं करेगा उसे विरोधी मानूंगा।

हम सब अध्यात्मिक उर्जा संग राष्ट्रभक्ति की अलख जगाएं। श्रीमद्भगवद्गीता का नित्य अमृतपान करके स्वयं के साथ ही साथ अखिल विश्व में मानव जाति का कल्याण करें।

गीता प्रवीण सुश्री कविता वर्मा द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता कंठस्थीकरण की गीता जिज्ञासु, गीता पाठक, गीता पथिक, गीताव्रती सभी परीक्षाएं उत्तीर्ण साधकों के शुद्ध उच्चारण सहित गीता जी के श्लोकों के पठन का अद्भुत,प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर अपने उद्गार व्यक्त करते हुए गीता परिवार के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आ. आशू भैय्या ने कहा कि हर माह 4000- 5000 प्रशिक्षार्थी, गीता जी के 3, 6, 12, 18 अध्याय, कण्ठस्थीकरण की परीक्षाएं देते हैं,उत्तीर्ण होते हैं। अब तक लगभग 10,000 प्रमाण पत्र प्रदान किए गए । 70, 000 से भी ज्यादा प्रमाण पत्र 12वें व 15वें अध्याय के शुद्ध पठन के लिए दिए जा चुके हैं ।

संगमनेर से आ. सुवर्णा जी मालपाणी व उनकी सहयोगीयों द्वारा 12वें अध्याय का सुस्वर पाठ किया गया।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि पूज्य श्री पुण्डरीक गोस्वामी जी महाराज ने अपने भावप्रवण उद्बोधन में कहा कि संसार रूपी भवसागर में तैरना वही सीख सकता है जिसने गीता जी का आश्रय लिया। जीवन के हर परिवेश का समाधान गीताजी के सूत्रों में निहित है। युद्ध स्थल पर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीतोपदेश दिया यानि विवाद के स्थल पर संवाद हुआ और अर्जुन अपने वैचारिक युद्ध से उपर उठे।

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जीवन में भी भौतिक युद्ध से पहले वैचारिक युद्ध का सृजन होता है। ऐसे में सत्पुरुषों के साथ संवाद से समाधान प्राप्त होता है। रण में कृष्ण अर्जुन के रथ,रथ के अश्व,लगाम एवं सारथी स्वयं श्रीकृष्ण थे। अगर आधुनिक परिवेश में इसे देखा जाए तो कार के 4 प्रमुख भाग-बाह्य आवरण, इंजन, चालक, इंधन- इन चारों एक दूसरे का पूरक व समान स्तर पर गतिशील होते हैं तभी कार चलती है। इसी प्रकार से गीता जीवन को 4 आयामोंमें समान स्तर पर गतिमान रखती है। वह हैं कार्यकी गतिशीलता, विचारों की स्पष्टता, हृदय की पवित्रता, और आध्यात्मिकता। यह चारों एक समान रूप से क्रियाशील हों तो जीवन उर्जा से परिपूर्ण होता है। स्वामी जी ने कहा कि वंशी के सुर शब्द में परिवर्तित हुए तो जाकर गीता के श्लोकों में परिणित हुए। गीता के श्लोक जब स्वरों में अवस्थित हुए तब वे वंशी के निनाद के रुप मे प्रगट हुए। सुर ही वंशी है, शब्द ही गीता है। सुरब्रह्म, शब्दब्रह्म से युक्त परब्रह्म के मुख से अवतीर्ण हुई गीता पथ है। जब यह पाथेय भी बन जाए तभी जीवन का उद्धार हो सकता है ।

श्रीमद्भगवद्गीता जी की आरती, नेत्रसुखद व सुंदर नृत्य के साथ प्रस्तुत की गई ।
गीता परिवार की उपाध्यक्ष सुश्री प्रमिला जी माहेश्वरी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया।

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