मुख्य सामग्री पर जाएँ
गीता मैत्री अंक २नवम्बर से दिसम्बर २०२१
०६गीता चिंतनिका सत्र

गीता चिन्तनिका

दैवी प्रवृत्ति का जब उत्थान होने लगता है व आसुरी प्रवृत्ति का दमन होने लगता है तथा भगवान के दर्शन की उत्कंठा उत्पन्न होती है तथापि देह का विस्मरण होने लगता है तब परमात्मा में विलय होने की प्रक्रिया शुरु होती है।

गीता चिन्तनिका

1 नवम्बर, 2021 रमा एकादशी
https://youtu.be/56giRVP8rcE

अध्याय 13, 14, 15
प्रार्थना : श्रीमती निवेदिता शर्मा जी, जम्मू-कश्मीर
दीप प्रज्ज्वलन : मृदुला आसावा जी, पुणे

क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नामक
13वेंअध्याय का पठन : गीताव्रती शिल्पाजी काबरा
चिंतन : वर्षा कासट जी, बीड

मुख्य बिन्दू:
हमारा शरीर क्षेत्र है और उसे भलीभाँति जाननेवाला क्षेत्रज्ञ।प्रथम अध्याय में वर्णित धर्मक्षेत्र व कुरुक्षेत्र वास्तव मै यह दैवी व आसुरी प्रवृत्तियाँ है। परमपिता परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाली पुण्य प्रवृत्ति दैवी प्रवृत्ति का उत्थान देह में बढने पर शरीर धर्मक्षेत्र बन जाता है। आसुरी प्रवृत्ति के कारण बुराई के रास्ते पर चलकर नश्वर संसार को ही सबकुछ मानकर चलता है तब शरीर कुरुक्षेत्र बन जाता है।

भगवान कहते हैं कि मनुष्य जीवन का अंतिम सत्य मोक्ष है।कुछ लोग ध्यान एकाग्र कर ध्यान योग द्वारा, कुछ प्रखर बुद्धि से ज्ञान योग द्वारा, कुछ लोग कर्म में फल में आसक्ति ना रखकर कर्म साधना द्वारा, कुछ श्रद्धा से भक्ति द्वारा भगवान को हृदयमें धारण करते है।भगवान सजीव निर्जीव में समभाव से स्थित है। जीवात्मा और परमात्मा की एकरूपता को ज्ञान की पराकाष्ठा कहा गया है।

श्रद्धात्रयविभागयोग
नामक 17वें अध्याय का पठन - यथार्थ ढालकरी जी, मानवत
चिंतन: गीताव्रती रश्मी करवा जी

मुख्य बिन्दू –
सात्विक मनुष्य देवताओं का, राजसी मनुष्य राक्षसों का, तथा तामसी भूत- प्रेतगणों का पूजन करते है। आयु,सत्व, गुण, बल, आरोग्य बढाने वाले स्निग्ध पदार्थ सात्विक मनुष्य को प्रिय लगते हैं, अति कडवे, खट्टे, तीखे, नमकीन, गरम आहार राजसी मनुष्य को प्रिय लगते हैं एवं सड़ा हुआ, दुर्गन्धित, जूठा, बासी भोजन तामसी मनुष्य की प्रिय होते है। फलेच्छा रहित रहकर, शास्त्रविधि से नियन यज्ञ सात्विक, फलकी इच्छा रख एवं दिखावटी यज्ञ राजसी, शास्त्रविधि से हीन, बिना मंत्र, दक्षिणा से किया यज्ञ तामसी होता है।

देवता, ब्राम्हण, गुरूजनों का यथायोग्य पूजन, सत्य, स्वाध्याय, प्रिय, हितकारक भाषण वाणी का तप है शुद्ध, सौम्य, मन की निग्रहता प्रसन्न भाव यह मन सम्बंधी तप कहा गया है। शरीर, वाणी व मन का, परमश्रद्धा व फलेच्छा रहित भाव से किया गया तप सात्विक, सत्कार, मान, दिखावटी तप राजसी और हट के साथ, दूसरोंको कष्ट देनेवाला तप तामसी होता है।

सत्पात्र को दिया गया दान सात्विक, प्रत्युपकार, फल प्राप्ति के उद्देश्य से किया दान राजसी, और अयोग्य व अपात्र को दिया गया दान तामसी कहा गया है।

18वें अध्याय का पठन - ओमजी, जिंतूर
चिंतन : गीताव्रती श्री विजय कुलकर्णी जी

18वें अध्याय मे गीता समस्त अध्यायों का सार एवं उपसंहार है। जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है। सब प्रकार से मान, बड़ाई और आसक्ति को त्यागकर एक परमात्मा को ही परम आश्रय, परम गति और सर्वस्व समझना तथा अनन्य भाव से अतिशय श्रद्धा, भक्ति और प्रेमपूर्वक निरंतर भगवान के नाम, गुण, प्रभाव और स्वरूप का चिंतन करते रहना एवं भगवान का भजन, स्मरण करते हुए ही उनके आज्ञा अनुसार कर्तव्य कर्मों का निःस्वार्थ भाव से केवल परमेश्वर के लिए आचरण करना यह ‘सब प्रकार से परमात्मा के ही शरण’ होना है।

जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा। उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है तथा पृथ्वीभर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं।

आ. आशू भैया द्वारा मौलिक मार्गदर्शन- श्रीमद्भगवद्गीता का दैनिक जीवन मे उपयोग किस प्रकार हम कर सकते हैं व भगवद्गीता हमारे जीवन में परिलक्षित हो रही है अथवा नहीं यह जानने हेतु आ. आशू भैया द्वारा विशेष अनुसन्धान प्रस्तुत किया गया।

  • 1) शोक रहित जीवन।
  • 2) विपरीत परिस्थितीयों में संयम 3) अक्रोधी, क्षमाशील स्वभाव
  • 4) ध्यानमय जीवन
  • 5) जपयज्ञ
  • 6) अंतकाल में भगवद् स्मरण।
  • 7) भगवत् चिंतनमय जीवन
  • 8) सगुण भगवान की निरंतर अनुभूति।
  • 9) हम जैसे भी है भगवद्प्राप्ति के अधिकारी है।
  • 10) आओ भगवान को सर्वाधिक प्रिय हो जाए।

श्रीमद्भगवद्गीता जी की आरती विकासजी वैद्य, पुणे के करकमलों द्वारा संपन्न हुई।

मूल अंक के पृष्ठ देखें ३ पृष्ठ
मूल अंक, पृष्ठ १०मूल अंक, पृष्ठ ११मूल अंक, पृष्ठ १२