
श्रीज्ञानेश्वरी चिंतन
मूर्तिमंत आनंद का अक्षय स्रोत है भावार्थ दीपिका ज्ञानेश्वरी। श्री ज्ञानेश्वर महाराज ने, सद्गुरु निवृत्तिनाथ कृपा प्रसादरूपी प्राप्त अपने अंतरंग का आत्मानंद ज्ञानेश्वरी के माध्यम से प्रवाहित किया। अनेक प्रमेय, तत्वज्ञान के गहन सिद्धांतों से मंडित रसमयी ज्ञानेश्वरी जीवन के वास्तविकता से भी उतनीही समरस है।
संसार कितना भी आकर्षक प्रतीत क्यों न हो, उसमें न अटकते हुए, और कितना भी भयावह लगे फिरभी न डगमगाते हुए परम गंतव्य किओर अग्रेसर करने का पाथेय हमे ज्ञानेश्वरी प्रदान करती है।ज्ञानेश्वरी को सद्गुरु देव ने आधुनिक वेद की उपमादी हैं। यह ऐसा अद्भुत दिव्य ब्रह्मरस का रसपान है कि चखने के बाद उसमे डुबे ही रहने को मन करता है। उसके गहन अर्थ मे प्रवेश करने का साहस केवल महाराज के कृपासे ही कर सकते है। ज्ञानेश्वरी की जीवन दर्शन करनेवाली कुछ मनोवैज्ञानिक ओवियों का चिंतन उनके चरणों में समर्पित होकर सद्गुरु के मार्गदर्शन मे करनने का प्रयास है।धृतराष्ट्र के वचन से भगवतद्गीता का आरंभ होता है।मानवी विकारों का सर्वोच्च प्रतिनिधि है धृतराष्ट्र। इसका विश्लेषण करते हुए ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं-
पुत्र स्नेहे मोहितु । धृतराष्ट्र असे पुसतु ।
म्हणे संजया सांगे मातु । कुरुक्षेत्री ची ।।१.८५ ।।
मोहित पुत्रस्नेह से । धृतराष्ट्र है पूछते ।
वृत्त कुरुक्षेत्र के । बताओ संजय ।।
धृतराष्ट्र के इस तीव्र पुत्र मोह के कारण ही दोनो कुल और संपूर्ण सृष्टि विनाश की कगार पर है इस ओर ज्ञानेश्वर महाराज हमारी दृष्टि ले जाते है। अर्जुन मे भी स्वजनों क प्रती मोह है। “दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण”यह अर्जुन के गीता में शब्द है।ज्ञानेश्वर महाराज इस मोह का अप्रतिम वर्णन करते है। स्वजनों को देखकर कैसी हो गई अर्जुन की अवस्था?
जैसे भ्रमर भेदी कोडे ।
भलतैसे काष्ठ कोरडे ।
परी कलिके माजी सापडे ।
कोवळीये ।।
भ्रमर करता है छेद ऐसे ।
काष्ठ को सहजता से ।
बन्दी वह भी होता कैसे ।
कोमल कलिका में।।
मनुष्य के स्वजन स्नेह का अत्यंत मनोवैज्ञानिक विश्लेषण महाराज करते हैं।सूखे काष्ठ को भी सहजता से छेद करनेवाला भ्रमर शाम के समय पराग सेवन करने केलिए कमलपुष्प पर बैठता है। सूर्यास्त होने पर जब वह कमल कलिका पंखुड़ियों को सीमट लेती है, तब वही भ्रमर कमल की कोमल पंखुडिओंको भी छेद नहीं पाता।महाराज कहते हैं जीवन मे कठीन बंधन को तोडना सरल है, किंतु कोमल बंधन तोडना अत्यंत कठीन है।हम सब इन कोमल बंधनों में अटकते है। मुक्ती का , मोक्ष का आनन्द पाना है तो कठीन हो या कोमल बन्धनो से अंतरंग मे मुक्त होना सीखना होगा ।
ज्ञानेश्वरी के चिंतन से माउली हम सबको यह परम आनंद की अनुभूति प्रदान करे यही उनके चरणों में प्रार्थना ।
- सौ. वंदना वर्णेकर

