
समत्व की साधना
गीता के दूसरे अध्याय में योग की व्याख्या कही गयी -‘समत्त्वं योग उच्यते’! समत्व ही योग है। आगे अन्यान्य श्लोकों मे समत्व की बात करते समय भगवान ने कहा सुख-दुःख, शीत-उष्ण, मान-अपमान, निन्दा- स्तुति, ऐसी सभी परिस्थितियों में हमें अपने आप को समत्व भाव में रखना होगा। शत्रु और मित्र तथा पत्थर और सोना भी समान लगे ऐसी मनोदशा बनानी होगी। ऐसी मनोदशा अभ्यास से बन सकती हैं यह भी भगवान ने बताया। छठें अध्याय में आत्मसंयमय के सूत्र बताते समय यह भी कहा की शरीर का समत्व कैसे साधना है? फिर श्वासोच्छ्वास का समत्व कैसे साधे यह भी बताया।
गीता संथा कक्षा का महायज्ञ चला तो प्रतिदिन हजारो स्वयंसेवक कार्यकर्ता बंधु - भगिनी प्रशिक्षक अथवा तकनिकि कार्य के लिए गीता सेवी बनें। निरपेक्ष भाव से प्रतिदिन लगभग एक हजार ज़ूम कक्षाएँ चलने लगी। किसी भी प्रकार के सम्मान की अपेक्षा के बिना, ये सारे गीता सेवी अपने कार्य में जुड़ गयें। प्रशिक्षण अथवा अन्य कार्य करते समय हर परिस्थिति में धैर्य रखते हुए ये सारे कार्यरत हैं। अनायास ही “अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः” का भाव इनके मन में प्रतिष्ठित होता चला गया। सभी गीता साधकों के साथ समान व्यवहार करते समय क्रोध को वश में करना, ये सीखते चले गये। थंड और गर्मी में भी कक्षा का समय पालन इन्होनें सीखा। ज़ूम कक्षा में सिखाते समय घंटा भर सीधे बैठने का अभ्यास होता गया। पूरा ध्यान प्रशिक्षण में लगाकर ये सब ‘समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलमं स्थिरः’ का प्रयास करते रहे। गीताजी के श्लोक सिखाते समय जब हम छंदबद्ध पद्धति से श्लोक पढ़ते हैं तब अपने आप श्वासोच्छ्वास की गति सम हो जाती है। ‘प्राणापानौ समौ कृत्वा’ इस महाविधा का अनायास अभ्यास गीता प्रशिक्षकों का होता रहा।
इस उपक्रम का लाभ लेते लेते ‘संतुष्टः सततं योगी’ इस गीता वचन की अनुभूति गीता सेवियों को होने लगती हैं। इस अनुपम श्रीकृष्ण सेवा का असीम आनंद हर व्यक्ति को होता है। दिन भर के कार्य-कलाप गीता कक्षा के इर्द-गिर्द घूमने लगते हैं। ‘मामनुस्मर युध्य च’ इस गीतोक्ति के अनुसार हर क्षण गीता का स्मरण मन में रहता हैं। ‘सततं कीर्तयन्तो मां’ की प्रत्यक्ष अनुभूति होती रहती हैं, मन में सदैव “गीता गुञ्जन” चलता रहता है। इन सभी बातों का परिणाम आत्मस्थिति बदलने में होता हैं, आत्म-स्थिति में बदलाव के साथ-साथ मनोस्थिति बदलने लगती है। और मनःस्थिति के बदलते ही परिस्थिति बदल जाती है। ऐसा अद्भुत अनुभव अनेक गीता सेवियों ने प्राप्त किया।
घर में सुख-दुःख की घड़ी हो अथवा करोना के काल में कोई अस्पताल में भर्ती हो तब भी इन कर्मठ स्वयंसेवकों ने अपनी सेवाएँ प्रदान की और गीता का कर्मयोग जीवन में अपनाया। इससे बढ़कर कोई साधना नहीं, अन्य कोई उपासना नहीं। ऐसे सारे कर्मयोगी भक्तों को सादर नमन !
- डॉ. संजय मालपाणी
