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गीता मैत्री अंक ४जुलाई से दिसम्बर २०२२
१२मार्गदर्शन

भगवद्कृपा का प्रत्यक्ष दिग्दर्शन

वसुदेवसुतं देवं, कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकी परमानन्दं, कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।।

विश्व साहित्य में श्रीमद्भगवद्गीता का अद्वितीय स्थान है। यह साक्षात् भगवान के श्रीमुख से निःसृत परम रहस्यमयी दिव्य वाणी है। इस में भगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाकर मनुष्य मात्र के कल्याण के लिये उपदेश दिया है। इस छोटे से ग्रंथ में भगवान ने अपने हृदय के बहुत ही विलक्षण भाव भर दिये हैं, जिनका आज तक कोई पार नहीं पा सका और न ही पा सकता है।

भगवान की दिव्य वाणी श्रीमद्भगवद्गीता के भाव बहुत ही गम्भीर और अनायास कल्याण करने वाले हैं। उनका मनन करने से साधक के हृदय में नये-नये विलक्षण भाव प्रकट होते हैं। समुद्र ( रत्नाकर ) में मिलने वाले रत्नों का तो अंत आ सकता है, पर गीता में मिलने वाले मनोमुग्धकारी भावरूपी रत्नों का अंत कभी नहीं आता।

श्रीमद्भगवद्गीता की महिमा अगाध और असीम है। यह भगवद्गीता ग्रंथ प्रस्थानत्रयी में माना जाता है। मनुष्यमात्र के उद्धार के लिये तीन राजमार्ग प्रस्थानत्रय के नाम से कहे जाते हैं। एक वैदिक प्रस्थान है, जिसको उपनिषद् कहते हैं। एक दार्शनिक प्रस्थान है, जिस को ब्रह्मसूत्र कहते हैं और एक स्मार्त प्रस्थान है, जिस को भगवद्गीता कहते हैं। उपनिषदों में मंत्र है, ब्रह्मसूत्र में सूत्र हैं और भगवद्गीता में श्लोक हैं।

भगवद्गीता में श्लोक होते हुये भी भगवान की वाणी होने से मंत्र ही हैं। इन श्लोक में बहुत गहरा अर्थ भरा हुआ होने से इनको सूत्र भी कह सकते हैं। उपनिषद् अधिकारी मनुष्यों के काम का विषय है और " ब्रह्मसूत्र " विद्वानों के काम का विषय है, परन्तु भगवद्गीता सभी के काम का विषय है।

भगवद्गीता का उपदेश महान अलौकिक हैं। इस पर कई टीकाएँ हो गयी हैं और टीकाएँ होती चली जा रही हैं। इस छोटे से ग्रंथ पर सर्वाधिक टीकाएँ उपलब्ध हैं क्योंकि यह अनन्त की वाणी है, इसलिये इस के भाव भी अनन्त हैं।

गीता एक प्रासादिक ग्रंथ है, इस का आश्रय लेकर पाठ करने मात्र से बड़े विचित्र, अलौकिक और शांतिदायक भाव स्फुटित होते हैं। इसका मन लगाकर पाठ करने मात्र से बड़ी शान्ति मिलती है। मन में कोई शंका होती है तो पाठ करते करते उस का समाधान हो जाता है।

ऐसी विलक्षण वाणी श्रीमद्भगवद्गीता को विश्व में प्रचारित, प्रसारित करने का बीड़ा गीता परिवार ने उठाया है। भगवद्कृपा का प्रत्यक्ष दिग्दर्शन हो रहा है।

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मूल अंक, पृष्ठ ३९