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गीता मैत्री अंक ४जुलाई से दिसम्बर २०२२
सन्त उद्गार
०२संत वाणी

सन्त उद्गार

प.पू स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज
संस्थापक अध्सक्ष गीता परिवार
कोषाध्यक्ष रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास

हमारी भूमि वेदों से जानी जाती है जहाँ आदि शंकराचार्य का जन्म हुआ। यहाँ मात्र एक परिवार की बात नहीं होती है किन्तु सम्पूर्ण विश्व को ही एक परिवार के रूप में बताया जाता है। वसुधैव कुटुम्बकम् अर्थात् सम्पूर्ण वसुधा ही हमारा परिवार है। वह केवल यहाँ तक नहीं रुकते किन्तु हम सभी एक ही तत्त्व हैं। हम सब एक हैं। यहाँ 'वह' और 'तुम' शब्द नहीं हैं, किंतु यहाँ सदा 'हमारा' ही है। अतः किसी के द्वारा किसी के लिये किया गया गलत कार्य उस व्यक्ति के स्वयं के लिये ही होता है।

वेदों में कहा गया है - आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वत:। अर्थात् हमारे लिये सभी ओर से कल्याणकारी विचार आयें। उन सभी विचारों को हमें सुनना चाहिये एवं जीवन में उतारना चाहिये। शायद सभी संप्रदायों की भाषायें भिन्न-भिन्न हो सकती हैं किंतु मूल विचार सबका एक ही है और यह विचार कुछ इस प्रकार से कहा जा सकता है जैसा कि हम संस्कृत में बोलते हैं।

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु , मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्॥

अर्थात् सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी का जीवन मंगलमय बनें और कोई भी दुःख का भागी न बने। वैदिक विचार व्यक्ति, समाज, प्रकृति और परमेश्वर में संतुलन की बात करते हैं। और यह संतुलन योग कहलाता है। आज हमें सभी साम्प्रदायिक विचारों को संतुलित करना है। अतः हमें आज साथ आना है। जिस प्रेममय, ज्ञानमय, परस्पर सकारात्मक भावों एवं एकता वाले विश्व की कल्पना ज्ञानेश्वर माऊली ने की, ऐसे नये विश्व की हम स्थापना करेंगे । यह हमारी प्रार्थना या अपेक्षा नहीं किन्तु यह हमारा लक्ष्य है।

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