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गीता मैत्री अंक ४जुलाई से दिसम्बर २०२२
समष्टि में व्यष्टि
०४संपादकीय

समष्टि में व्यष्टि

संपादकीय

डॉ. आशू गोयल

गीता मैत्री वास्तव में गीता से मैत्री करने वालों के लिये एक ऐसा मंच है जहाँ वृत्तियों का शुभ से मिलन होता है। ये वृत्तियाँ सभी में किसी न किसी रूप से विद्यमान रहती हैं किन्तु जैसे लकड़ी में विद्यमान होते हुये भी अग्नि को व्यक्त होने हेतु पत्थर के घर्षण आदि निमित्त की आवश्यकता होती है वैसे ही यहाँ भी मैत्री के भावों को शब्दांकित करने का प्रयास ही इस गीतामैत्री न्यूजलेटर का मूल चिन्तन है जिसमें व्यष्टि विचारों को गीता चिंतन रूपी घर्षण से समष्टिगत किया जा रहा है। भगवद्गीता हमें "तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च" का व्यष्टि उपदेश के साथ "सर्वभूतहिते रता:" का समष्टि उपदेश भी देती है।

सर्वभूतहिते रता: की भावना को भगवान ने इतना महत्त्व दिया कि पाँचवें अध्याय के बाद बाहरवें अध्याय में इसकी पुनः आवृत्ति की है। सर्वभूतहिते रता: में 'सर्व' के अन्तर्गत 'स्व का हित' भी सम्मिलित है। सर्वभूतहिते रता: 'स्व' और 'पर' का संगम है अर्थात् स्वार्थ(स्वयं का हित) और परमार्थ(अन्य का हित) दोनों का संगम है।

एक बार एक गृहस्थ ने एक साधू से कहा- महाराज हम तो पापी हैं, केवल स्वार्थ की बात जानते हैं, आप तो परमार्थी हैं। साधू ने कहा - भाई तू स्वार्थ को ठीक से समझता नहीं, अगर तुम स्वार्थी हो तो हम दोगुने स्वार्थी हैं। स्वार्थ में परमार्थ निहित नहीं परन्तु परमार्थ में स्वार्थ निहित होता है। हम अपने कल्याण के लिये भजन साधन तो करते ही हैं, साथ में जो परहित हेतु भी जो उपदेशादि करते हैं वह भी तो स्वयं के लिये ही करते हैं। जैसे सुगंधी बांटने वाले को सुगंध की प्राप्ति स्वत: ही हो जाती है, ऐसे ही दूसरे का कल्याण करने वाले का कल्याण भी स्वत: ही होता है।

'गीता मैत्री' के विचारपुष्प का मूल उद्दिष्ट 'व्यष्टि से समष्टि' की एवं 'बिन्दु से सिन्धु' की यात्रा है। हम गीता

से मैत्री कर उसके उपदेशों को आत्मसात कर अन्य भाई-बन्धुओं को भी अपने साथ लायें एवं अपनी गीता मैत्री को विस्तारित करें, यही हमारा उद्देश्य है। वैसे तो हमारी मैत्री लौकिक है किन्तु जब गीता के माध्यम से वह मैत्री होती है तो उसमें एक महान उद्देश्य, उच्चतम गुण एवं आदर्शों का समावेश हो जाता है और वह लौकिक मित्रता भी अलौकिकता की मधुर सुगन्धी से भर जाती है।

जिस प्रकार गन्धहीन जल भी पुष्प के साहचर्य से सुगंधित हो उठता है उसी प्रकार गीता के द्वारा मैत्री होने से मैत्री शब्द दैदीप्यमान हो जाता है एवं उस दिव्य प्रकाश से साधकों का मार्ग प्रशस्त होने लगता है। आइये हम इस व्यष्टि से समष्टि की यात्रा में संलग्न होकर गीता मैत्री के पथ पर अग्रसर हों तथा स्वयं के साथ सबके कल्याण के निमित्त बनें।

इति

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