ऑनलाइन भगवद्गीता - जीवन की सार्थकता
ऑनलाइन भगवद्गीता
जीवन की सार्थकता
पिछले कई वर्षों से भगवद्गीता सिखाने का थोड़ा बहुत अनुभव था, किंतु वह सामने बैठकर सामूहिक अनुपठन के साथ ही किया था। जून 2020 में LOCK DOWN के समय अचानक गीता परिवार की ओर से मैसेज आया कि ऑनलाइन गीता संथा कक्षा में शामिल होना है। पहले तो मैंने सोचा कि मैं इसे कर ही नहीं पाऊंगी, इसलिये मैंने इसका कोई जवाब नहीं दिया। एक सप्ताह के बाद फिर से मैसेज आया की ज्वाइन तो करना ही है। जैसे तैसे तय समय में मीटिंग ज्वाइन कर ली। पहले दिन तो थोड़ा कठिन लगा, किंतु सोचा की अभ्यास से यह किया जा सकता है और फिर कुछ समय की ही तो बात है, फिर तो सब कुछ पहले जैसा ही सीखना होगा। आश्चर्य की बात है कि समय कैसे बीतता चला गया और हर दिन कुछ टेक्निकल बातें सीखते हुये उस काम को अपने आप ही करते चले गये।
इसी दौरान Learn Geeta App भी तैयार हो गई और गीता परिवार का दायरा बढ़ता ही गया। परम पूज्य स्वामी जी के शुभ वरदहस्त के साथ आदरणीय संजय भैया और आदरणीय आशू भैया और उनकी पूरी टीम के अथक परिश्रम से लर्नगीता का कार्य सुव्यवस्थित और सुचारु रूप से चल पड़ा। L1, L2, L3 और L4 इस तरह कारवां आगे - आगे बढ़ता ही जा रहा था और मन में अत्यंत संतोष का अनुभव भी हो रहा था।
गीता परिवार के जो पांच सूत्र हैं, वह इस ऑनलाइन गीता संथा के माध्यम से और अधिक कार्यान्वित होंगे, ऐसा मेरा मानना है, क्योंकि जब पूरे घर में भगवद्गीता गुंजायमान होगी तो घर का वातावरण अपने आप ही पवित्र एवं प्रसन्न रहेगा, इसका एक मुख्य कारण जो मैंने देखा, वह यह है कि इस दौरान महिलाएं इसमें अधिक संख्या में शामिल हो रही हैं, जिसमें अधिकांश महिलाएं ऐसी हैं जो ज़ूम कक्षा तो क्या मोबाइल ऑपरेट करना भी कम ही जानती हैं। शुरु शुरु में उन्हें घर का कोई सदस्य सहायता कर देता है और समय के साथ-साथ वह सब कुछ सीख जाती हैं।
ये महिलाएं घर के सभी सदस्यों को प्रसन्न रखते हुये अपनी कक्षा सुचारु रूप से करती हैं। इसका उदाहरण मैंने अपनी एक कक्षा में प्रत्यक्ष देखा है कि एक महिला प्रतिभागी अपने पोते को संभालते हुये तथा कभी कभी रसोई का कार्य करते हुये भी कक्षा में पूरा ध्यान रखती थी। इससे यह ध्यान में आया की महिलाएँ अपने घर के कार्यों में व्यस्त रहते हुये भी भगवद्गीता सीखने के लिये पूर्ण उत्साह के साथ समय निकालती हैं।
एक और वृद्ध साधिका जिन्हें पंढरपुर की वारी में जाना था, तो उन्होंने एक दिन पहले बता दिया कि कल से मैं वारी में रहूंगी, लेकिन कक्षा में भी उपस्थित रहूंगी, मुझे अन्म्यूट ना किया जाये, मैं रोज के श्लोक केवल सुनती रहूंगी, इससे पता चलता है कि मन में कितनी ललक है सीखने की।
महाकवि महाराजा भर्तृहरि ने लिखा ही है:
सत्संगति: कथय किं न करोति पुंसाम्
मनुष्य को यदि संगति अच्छी मिले तो वह सदैव सत्कार्यों में ही रहता है।
भगवद्गीता सिखाने के इस महत्कार्य से मन को जो संतोष मिलता हैं वह अकथनीय है, इस कार्य में जुड़ने से जीवन की सभी समस्याओं का समाधान स्वत: ही हो जाता है।
परमेश्वर से यही प्रार्थना है कि गीता परिवार के माध्यम से इसी प्रकार गीता सेवारत रहूं।
परमपूज्य स्वामी जी के चरणों में शत शत वंदन।

