
सम्पादकीय
ये अंक दैवी स्वभावयुक्त गीता मित्रों को भगवान श्री कृष्ण के 16वें अध्याय में वर्णित 26 प्रकार की दैवीय संपदा को अर्जित करने की प्रेरणा देता है। कोई पौधा जब बड़ा बनता है तो बढ़ते समय के अनुसार उससे पल्लवित और पुष्पित होने की भी आशा की जाती है। वो पौधा दिन प्रतिदिन पुष्ट हो रहा है, विकास को प्राप्त कर रहा है, उसमे नया सृजन हो रहा है और अब वह अन्य लोगो के लिये उपयोगी भी सिद्ध हो रहा है। उसमे एक आकर्षण, भव्यता, जीवन्तता प्रकट हो रही है। ऐसा ही हम अपनी गीता मैत्री पत्रिका से और अपने प्रिय आदरणीय प्रेमीजन पाठको एवं सदस्यों से भी आशा रखते हैं। जब पौधा अपने शैशव काल में था तो जो कीड़े मकोड़े भी उसको खा सकते थे, आज वह उस वृक्ष को अपना आश्रय बनाते हैं। जो गाय बकरी उस पौधे के विकास काल में उसे चर जाते थे, आज उसी वृक्ष से बाँध दिये जाते हैं। जो पौधा अधिक धूप में कुम्हला जाता था, आज वो मनुष्यों सहित अनेक जीव जन्तुओ को छाया का सुख दे रहा है। जो पौधा अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए भयभीत था, आज गीता के प्रथम दैवी गुण 'अभयम्' का प्रतीक बन गया। अब वह स्वयं के लिए नहीं, दूसरों को सुख देने, दूसरो के लिए उपयोगी होने के लिए अपना तना, छाल, पत्ते, पुष्प, फल, काष्ट, छाया, आक्सीजन देने वाला देवता बन गया। दैवीय गुण देवता बनाते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जैसे संत कवि भी उस वृक्ष की महिमा गाते हुए लिखते हैं।
"संत बिटप सरिता गिरि धरनी, परहित हेतु सबन की करनी।"
गीता माता की छत्र छाया मिलने से पहले हमें अपने जीवन में सार्थकता का अभाव सा भासता था।
आहारनिद्राभयमैथुनञ्च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् ।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः॥२५॥
ये सबके जीवन में है, मेरे भी जीवन में था, लेकिन सीखने से सिखाने की यात्रा में मुझे क्या क्या मिल गया जब इस पर ध्यान जाता है तो पूज्य स्वामी जी के आभारी हो जाते हैं, और अब जब मुख से 'अपने स्वामी' जी निकलता है तो उनसे अपना सम्बन्ध एक गर्व का अनुभव करवा देता है। एक दिन किसी छाया चित्र का एक गीत सुना तो स्वामी जी याद आ गयी। गीत के बोल थे- 'जब तुमको अपना कहते हैं, अपने पे गरूर आ जाता है।'
ऐसे ही किन्ही क्षणों को एक गीतकार ने लिखा - 'मै था इस जहाँ में जैसे खाली सीप होती, मेरी बढ़ गयी है कीमत तूने भर दिए हैं मोती।' मेरा पूर्ण विश्वास है कि हम सभी निश्चित ही गीताजी और स्वामीजी से जुड़कर उपरोक्त धन्यता का आनंद ले रहे हैं और अब चिरकाल तक इस आनन्द के सहभागी बने रहने को उत्सुक रहेंगे।
