गीता चिन्तनिका 10, 11, 12वाँ अध्याय - 16/02/23
हर एकादशी को होने वाले “गीता चिन्तनिका सत्र” की शृंखला में 16-02-23 की 'विजया एकादशी' को गीता जी के अध्याय 10, 11 और 12 का सुन्दर पारायण और चिन्तन “गीता परिवार” के 'गीताव्रती साधक सदस्यों' द्वारा सम्पन्न हुआ।
गीता चिन्तनिका
अपने स्वागत-भाषण में बहुमुखी प्रतिभा के धनी, दक्षिणांचल के प्रमुख व गीता परिवार के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री हरिनारायण जी व्यास ने इस कार्यक्रम से जुड़े सभी साधकों का स्वागत और अभिनन्दन किया। अपने स्वागत-भाषण में उन्होंने घोषणा की कि स्तर-4 पूर्ण कर आगे बढ़ने वाले 'गीता-साधकों' के लिये नया कुछ करने के प्रयास जारी हैं। उन्होंने 'शत कोटि हनुमान चालीसा' पूर्ण करने के तहत “राम-प्रतिष्ठा” ऐप से जुड़ने हेतु भी सभी साधकों का आह्वान किया।
गीता अध्याय पारायणः 10वाँ गीताव्रती श्रीमती कविता निरालकर जी, उस्मानाबाद, 11वाँ गीताव्रती श्री हरि तिडके जी, नागपुर, 12वाँ गीताव्रती श्रीमती अनुसूया शाह जी, अहमदाबाद द्वारा सुमधुर और भावपूर्ण वाणी में किया गया। जिससे सारा वातावरण दिव्य और गीतामय हो गया।
गीता अध्याय 10वें के 'विभूति योग', 11वें के 'विश्वरूपदर्शन योग' और 12वें के 'भक्ति योग' का सुन्दर चिन्तन क्रमशः गीताव्रती श्रीमती आरती जोशी जी, (ठाणे), गीताव्रती श्रीमती कुसुम मारू जी, (कोटा), गीताव्रती श्रीमती रूपा झरिये जी, (बैंकॉक) द्वारा किया गया ।
10वें अध्याय में भगवान् अपने हृदय की अत्यन्त गोपनीय बातें बतला कर अन्त में यह बतलाते हैं कि सम्पूर्ण जगत् उनके एक अंश द्वारा स्थित है। 11वें अध्याय में भगवान् ने अपने विराट रूप का दर्शन अर्जुन को दिव्य चक्षु प्रदान कर करवाया और यह भी कहा कि उनके इस रूप को पूर्व में किसी ने नहीं देखा। वे स्वयं काल हैं और जगत् के समस्त जीव उनके विशाल और भंयकर मुख में प्रतिक्षण समा रहे हैं। ये भीष्म, द्रोण,कर्ण जयद्रथ आदि सभी योद्धा उनके द्वारा पहले ही मारे जाने निश्चित हैं-अर्जुन को तो 'निमित्तमात्र' बनना है । अध्याय के अन्त में भगवान् कहते हैं कि सारे कार्य उन्हें अर्पण कर आसक्तिरहित, वैररहित और अहंकाररहित होकर कर्म करने से मनुष्य उन्हें पा लेता है ।
12वें अध्याय में भगवान् ने सगुण और निर्गुण उपासकों की तुलना में उन्हें सर्वश्रेष्ठ योगी बतलाया है जो अपने मन और बुद्धि को उन्हें अर्पित कर श्रद्धापूर्वक उनकी नित्य उपासना करते हैं । उन्होंने भगवद्प्राप्ति का सुगम उपाय यह बतलाया कि समस्त कर्मों
को उन्हें अर्पण कर देना चाहिये । उन्होंने अपने भक्तों के 39 लक्षण बताये कि किस प्रकार सबसे मैत्री-भाव वाले, सुख-दुःख, मानापमान, मित्रारि और शीत-उष्ण में सम रहने वाले भक्त उन्हें प्रिय हैं।
कार्यक्रम की समाप्ति पर धन्यवाद -ज्ञापन श्री सुनील धूत जी ने किया। उन्होंने 'गीता-चिन्तनिका की बागडोर सम्भाले रखने वाले- श्रीमती कविता जी मानधने, श्रीमती निर्मला जी मारू और श्री हरिनारायण जी व्यास का भी आभार व्यक्त किया।
समापन प्रार्थना मुंबई से गीताव्रती श्री अतुल जी कुलकर्णी द्वारा की गयी। कार्यक्रम के समापन पर सभी ने मिलकर सामूहिक रूप से व समवेत स्वर मे “हनुमान चालीसा” का पाठ भी किया ।
अन्य चिन्तनिका सत्र -
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गीता चिन्तनिका सत्र - 16, 17, 18वाँ अध्याय - 18/03/23
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गीता चिन्तनिका सत्र - 1, 2, 3वाँ अध्याय - 2/04/23
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गीता चिन्तनिका सत्र - 7, 8, 9वाँ अध्याय - 1/05/23
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गीता चिन्तनिका सत्र - 10,11,12वाँ अध्याय - 15/05/23
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