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गीता मैत्री अंक ५जनवरी से जून २०२३
संत उद्गार
०२संत वाणी

संत उद्गार

प.पू स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज
संस्थापक अध्यक्ष-गीता परिवार, कोषाध्यक्ष-रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास

भगवद्गीता कितनी गहरी है ऐसा प्रश्न होने पर कहना होगा कि जितनी आपके चित्त की गहराई है उतनी गहरी है यह गीता। आकाश की अनन्तता का वर्णन करते हुए कहना होता है कि तितली अपनी क्षमता से उड़ती है, चिड़िया अपनी क्षमता से उड़ती है एवं गरुड़ अपनी गति से उड़ता है किन्तु कोई भी आकाश को पार नही कर पाता है उसी प्रकार भगवद्गीता की गहराई में जाते जाते अन्ततः ऐसा हो जाएगा कि आप भगवद्स्वरूप हो जायेंगे। केवल आप ही भगवद् स्वरूप हो जाएंगे, अन्य कुछ भी नही रह जायेगा। अतः श्रीकृष्णार्जुनसंवाद से पहले यह ब्रह्मविद्या है।

यह उसकी विद्या है जिसके द्वारा सारे संसार का जन्म हुआ। यह पंचमहाभूतात्मक सृष्टि जिसमे से निकली है यह उसकी विद्या है। उस तत्व से सिवाय अन्य कोई तत्व है ही नही, यह उस परम तत्व की विद्या है। यह संसार के परम स्त्रोत को जानने की विद्या है। और इतना ही नही क्योंकि इसका वर्णन तो उपनिषदों में भी मिलता है किन्तु भगवद्गीता की उपनिषदों से एक विलक्षणता है, वह है योगशास्त्र।

गीता में मात्र परमात्मविद्या नही है, ब्रह्मविद्या नही है किन्तु उसे व्यवहार मे कैसे उतारना है इसका प्रतिपादन भगवान ने भगवद्गीता में किया है। और विशेष बात है कि यह प्रतिपादन जैसा भगवद्गीता में किया है वैसा अन्य कहीं भी नही किया है।

उदाहरण के लिए भगवद्गीता में यज्ञ शब्द आया है उस यज्ञ शब्द को भगवद्गीताकार व्यवहार में ढालते ढालते बारह प्रकारों में उसका वर्णन करते हैं। और इस कारण वह यज्ञ शब्द जीवनव्यापी हो जाता है। यह यज्ञ शब्द भगवद्गीताकार ने वेदों से लिया किन्तु उसे इतना व्यवहारिक बना दिया कि यदि हम भगवद्गीता की दृष्टि से देखें तो हमारा सम्पूर्ण जीवन ही यज्ञमय ही दिखने लगे जायेगा।

भगवद्गीताकार यज्ञ, योग, भक्ति सभी को व्यवहार के एक एक अंग में डाल देते हैं और उसका परिणाम ऐसा होता है कि हमारा ऐहिक जीवन एवं आध्यात्मिक जीवन भिन्न भिन्न नही रह जाता है किन्तु एक ही हो जाता है। सम्पूर्ण जीवन को आध्यात्मिक बनाने का यह महान साधन है भगवद्गीता।

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