Crossword Story
एक कहानी, जो विश्वास व समर्पण, नियति एवं ईश्वरत्व पर है। यह घटना तब की है जब समस्त देश के असंख्य सैन्य-दलों को भारत के सर्वाधिक रक्तरंजित महायुद्ध के लिये संघटित किया जा रहा था। कौरवों व पांडवों के बीच होने वाले महायुद्ध महाभारत के लिये, जो कि अठारह दिनों तक चलने वाला था।
कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र को विशाल अक्षौहिणी सेनाओं के आवागमन के योग्य बनाने हेतु सज्ज किया जा रहा था। प्रतिस्पर्धी तंबुओं के लिये स्थान साफ किये जा रहे थे। विशाल सेनाओं के लिये भोजन पकाने हेतु लकड़ियों के विशाल गट्ठर बनाये जा रहे थे। हाथियों द्वारा वृक्षों को गिराया जा रहा था। ऐसे ही एक वृक्ष पर एक गौरैया का घोंसला था जिसमें चार छोटे बच्चे थे। जैसे ही पेड़ को गिराया गया उसका घोंसला धरती पर गिर पड़ा। बच्चे जो अभी उड़ने के लिये बहुत छोटे थे, चमत्कारिक ढंग से सही-सलामत थे।
असुरक्षित व भयभीत गौरैया ने चारों ओर मदद के लिये देखा। उसी समय उसे कृष्ण दिखाई दिये जो अर्जुन के साथ मैदान का निरीक्षण कर रहे थे। वे वहाँ युद्धभूमि का परीक्षण करने आए थे जिससे युद्ध के आरंभ होने से पहले एक विजयी सैन्य रणनीति पर विचार किया जा सके। गौरैया ने कृष्ण के रथ के पास पहुँचने के लिये पूरी शक्ति से अपने पंख फड़फड़ाए।
“हे कृष्ण, कृपया मेरे बच्चों की रक्षा कीजिये” गौरैया ने प्रार्थना की। “कल जब यह युद्ध आरंभ होगा तो यह सब कुचले जाएंगे।”
“मैं तुम्हें सुन रहा हूँ” उन्होंने कहा जो सर्वज्ञ हैं। “किंतु मैं प्रकृति के नियम में बाधा नहीं डाल सकता।”
“भगवन मैं केवल इतना जानती हूँ कि आप मुझे बचाने आये हैं। मैं अपने बच्चों का भाग्य आपके हाथों में सौंपती हूँ। आप उन्हें मार सकते हैं या फिर बचा सकते हैं। अब यह आप पर है।”
यह संकेत करते हुए कि वे इस विषय में कुछ भी नहीं कर सकते, कृष्ण ने साधारण मनुष्य की भांति कहा, “समय का पहिया तो बिना विचार किए चलता है”।
“मैं कोई दर्शनशास्त्र नहीं जानती।” गौरैया ने विश्वास एवं श्रद्धा से कहा “आप ही समय का पहिया हैं। मैं तो यही जानती हूँ। मैं आत्मसमर्पण करती हूँ।”
“फिर अपने घोंसले में तीन सप्ताह का भोजन एकत्रित कर लो।”
इस वार्तालाप से अनभिज्ञ अर्जुन उस गौरैया को भगा रहा था। कृष्ण गौरैया को देखकर मुस्कुरा रहे थे। गौरैया ने
अभिवादन स्वरूप थोड़ी देर अपने पंख फड़फड़ाए और अपने घोंसले पर वापस आ गई।
दो दिन पश्चात् युद्ध आरंभ की घोषणा हेतु शंखनाद होने से पूर्व कृष्ण ने अर्जुन से उसका धनुष-बाण मांगा। अर्जुन भौचक्का था क्योंकि कृष्ण ने युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा ली थी। इस के अतिरिक्त अर्जुन को यह विश्वास था कि वह ही वहाँ सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर है।
“आज्ञा दें प्रभु” उसने दृढ़ विश्वास से कहा “मेरे बाणों के लिये कुछ भी अभेद्य नहीं है।”
अर्जुन से चुपचाप धनुष लेते हुए कृष्ण ने एक हाथी पर निशाना साधा। किंतु उस जानवर को मार गिराने के बजाए वह तीर उसके गले में लटकी घंटी पर लगा और चिंगारियाँ निकलीं।
कृष्ण को एक सरल सा निशाना चूकते देख अर्जुन अपनी हंसी रोक न सका।
“क्या, मैं करूँ?” उसने प्रस्ताव किया।
पुनः उसके प्रश्न एवं प्रतिक्रिया को अनदेखा करते हुए कृष्ण ने उसे उसका धनुष वापस कर दिया और कहा कि इसके आगे कुछ और करना आवश्यक नहीं है।
“किंतु केशव, आपने हाथी को क्यों निशाना बनाया?” अर्जुन ने पूछा।
“क्योंकि यही वह हाथी है जिसने उस पेड़ को गिराया था जिस पर उस गौरैया का घोंसला था।”
“कौन सी गौरैया?” अर्जुन ने आश्चर्य प्रकट किया “और वह हाथी सकुशल और जीवित है। केवल उसकी घंटी ही गिरी है।”
उसके प्रश्न की उपेक्षा करते हुए श्री कृष्ण ने उसे अपना शंख बजाने का आदेश दिया।
युद्ध शुरू हुआ और अगले अठारह दिनों में अनगिनत जीवन नष्ट हो गये। अन्त में पांडवों की विजय हुई। पुनः कृष्ण अर्जुन को लेकर रक्तिम युद्धक्षेत्र का निरीक्षण करने गये। वहाँ कईं शव पड़े थे जिनका अंतिम संस्कार भी नहीं किया गया था। युद्ध-भूमि में कटे हुए सिर, हाथ-पैर, निर्जीव घोड़े व हाथी कूड़े करकट के समान पड़े हुए थे।
कृष्ण एक स्थान पर रुके और हाथी की एक घंटी को विचार मग्न होकर देखने लगे।
उन्होंने कहा “अर्जुन, क्या तुम मेरे लिये इस घंटी को उठाकर दूसरी ओर रख दोगे?”
यद्यपि आदेश सरल था किंतु अर्जुन को तात्पर्य समझ नहीं आया। आखिरकार इस विशाल युद्धक्षेत्र में जहाँ बहुत सी अन्य वस्तुओं को हटाने की आवश्यकता थी, कृष्ण ने उसे एक तुच्छ धातु के टुकड़े को हटाने के लिए क्यों कहा? उसने उन्हें प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा।
“हाँ, वह घंटी। यह वही घंटी है जो उस हाथी के गले से तब गिरी थी जब मैंने उस पर तीर चलाया था।”
बिना कोई प्रश्न किये अर्जुन उस भारी घंटी को हटाने के लिये झुका। जैसे ही उसने उसे उठाया उसका संसार सदा के लिये परिवर्तित हो गया।
एक, दो, तीन, चार, पाँच। चार छोटी चिड़िया एक के पीछे एक करके उड़ गयीं और उनके पीछे एक गौरैया थी। माँ चिड़िया कृष्ण के चारों ओर अत्यधिक प्रसन्नता में चक्कर लगाते हुए परिक्रमा करने लगी। वह एक घंटी जो कृष्ण ने अठारह दिनों पूर्व विभाजित की थी उसने चिड़िया के पूरे परिवार की रक्षा की।
“मुझे क्षमा करें कृष्ण” अर्जुन ने कहा “आपको मानव शरीर में साधारण मनुष्यों की भांति व्यवहार करते देख मैं भूल गया था कि आप सचमुच कौन हैं।”
कृष्ण ने गौरैया को युद्ध भूमि में ही छोड़ दिया था क्योंकि यह उसके भाग्य में पूर्व निर्धारित था। वह चिड़िया अपने बच्चों के साथ किसी सुरक्षित स्थान पर जाने की इच्छा भी प्रकट कर सकती थी। वह कृष्ण से उसे अपने साथ ले जाने के लिए भी तर्क कर सकती थी। वह विनती कर सकती थी कि उसे तीन सप्ताहों का भोजन प्रदान किया जाये। उसने इनमें से कुछ भी नहीं किया। उसने केवल निर्देशों का पालन किया तथा स्वयं को उनके हाथों में सौंप दिया जिस पर उसे विश्वास था। उससे जो प्रयास अपेक्षित था उसने उसका त्याग नहीं
गीता में बार-बार ईश्वर पर पूर्ण रूप से विश्वास कर खुद को उन्हें सौंप देने की बात कही गई है। अतः मनुष्य को ईश्वर की भक्ति में पूर्णतः खुद को समर्पित कर देना चाहिए, जो भी हो रहा है उसे उनकी ही इच्छा मानकर उनका नाम जपना चाहिए। ऐसा करने वाला मनुष्य संसार के समस्त पापों से मुक्त हो ईश्वर के कृपा का पात्र बनता है और उसके सभी पापों का नाश होता है।
स्वयं (अपने आपको) भगवान् के अर्पित करना कि मैं भगवान् का ही हूँ और भगवान् ही मेरे हैं। स्वयं को भगवान् के अर्पित करने से नाम-जप, चिन्तन, ध्यान, सेवा-पूजा, आदि तथा शास्त्रनिहित कर्म मात्र स्वतः भगवान् के लिए ही होती हैं।
शरीर प्रकृति का और जीव भगवान् (परमात्मा) का अंश है। प्रकृति के कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहम् से तादात्म्य, ममता और कामना न करके केवल भगवान् को ही अपना मानने वाला यह कह सकता है कि 'मैं भगवान् का हूँ और भगवान् मेरे हैं।' जैसे की चिड़िया ने स्वयं को अपने बच्चोंसहीत भगवान श्रीकृष्ण को सम्पूर्ण विश्वाससे समर्पित कर दिया था।
रात्री के बाद निश्चीत सूर्योदय होना है यह सम्पूर्ण जगत का विश्वास। कीचड़ में उगते कमल को भगवद् चरणों में स्थान मिलना है यह विश्वास। गोपियोंको कृष्ण के प्रति अनुरागी विश्वास। संत सज्जनों को भगवद् भक्ति लिनता से मोक्ष प्राप्ति का विश्वास। सत्य को विश्वास की असत्य की हार निश्चित है।
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असंमूढ: स मर्त्येषु सर्वपापै: प्रमुच्यते ।।3।।
इस श्रीमद्भगवदगीता के अद्याय 10 के 3 रे श्लोक कोवर्तमान परिप्रेक्ष्य में समझा जाए तो जो भी हो रहा है उसको भगवान की इच्छा जानते हुए उसको स्वीकार करते हुए अनुशासन में रहें व उसकी सत्ता को सर्वोपरि मानें। भगवान अजन्मा है। वह समय समय पर पकृति को संतुलित भी करता है। यदि हम अनादि भगवान की सत्ता में पूर्ण विश्वास करते हुए उसे ही सब कारणों का कारण जानकर उनकी भक्ति करें तो भय व दुःख से मुक्ति मिलती है तथा समस्त पापों का भी नाश होता है।
निस्वार्थ भाव के साथ व सम्पूर्ण श्रद्धा से कर्म सर्वशक्तिमान परमेश्वरको अर्पण करनाही समर्पण है
समर्पण से ही परमात्मा सहाय बनते हैं। मीरा ने समर्पण यह कहकर कि 'मेरो तो गिरधर गोपाल बस दूसरो न कोई' किया तो मीरा को पिलाया जाने वाला जहर परमात्मा ने अमृत में बदल दिया। द्रौपदी ने हार थक कर जब अंत में केवल और केवल श्रीकृष्ण को समर्पण किया तो भगवान श्रीकृष्ण ने उनका चीर हरण नहीं होने दिया। समर्पण। राजा जनक ने अष्टावक्र ऋषि के प्रति समर्पण किया तो राजा जनक को तत्क्षण ज्ञान हो गया। रामकृष्ण परमहंस के प्रति बालक नरेंद्र का, जो कि बाद में स्वामी विवेकानंद के नाम से जाने गए, समर्पण हुआ तो काली मां उनके हृदय में प्रकट हो गई।
महाभारत युद्ध के दौरान अपने आपको स्वावलंबी समझ अर्जुन योगेश्वर श्रीकृष्ण भगवान के प्रति समर्पण को भूले तो धनुर्धारी अर्जुन के तीर चलने रुक गए। अर्जुन ने पीछे मुड़कर श्रीकृष्ण को निहारा। श्रीकृष्ण बोले 'चलाओ तीर।' अर्जुन सब कुछ समझते हुए बोले, 'भगवान भूल हो गई थी।' भगवान के प्रति अर्जुन का समर्पण भाव बना तो पुन: तीर चलने आरंभ हो गए। त्रेतायुग के अवतार भगवान श्रीरामचंद्र के प्रति भक्त हनुमान के समर्पण से हनुमान को
इतनी शक्ति प्राप्त हो गई थी कि उन्होंने समुद्र पर पुल का निर्माण कर दिया था। समर्पण से महान उपलब्धि मिलती है। अपने श्रद्धेय के प्रति समर्पण से सुख मिलता है। परमात्मा सबके परम श्रद्धेय हैं। इसलिए परमात्मा के प्रति समर्पण से परम सुख मिलता है। शांति का संचार होता है। जीवन सुखी तथा आनंदमय बनता है।
दो दिन पश्चात् युद्ध आरंभ की घोषणा हेतु शंखनाद होने से पूर्व कृष्ण ने अर्जुन से उसका धनुष-बाण मांगा। अर्जुन भौचक्का था क्योंकि कृष्ण ने युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा ली थी। इस के अतिरिक्त अर्जुन को यह विश्वास था कि वह ही वहाँ सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर है।
“आज्ञा दें प्रभु” उसने दृढ़ विश्वास से कहा “मेरे बाणों के लिये कुछ भी अभेद्य नहीं है।”
अर्जुन से चुपचाप धनुष लेते हुए कृष्ण ने एक हाथी पर निशाना साधा। किंतु उस जानवर को मार गिराने के बजाए वह तीर उसके गले में लटकी घंटी पर लगा और चिंगारियाँ निकलीं।
कृष्ण को एक सरल सा निशाना चूकते देख अर्जुन अपनी हंसी रोक न सका।
“क्या, मैं करूँ?” उसने प्रस्ताव किया।
पुनः उसके प्रश्न एवं प्रतिक्रिया को अनदेखा करते हुए कृष्ण ने उसे उसका धनुष वापस कर दिया और कहा कि इसके आगे कुछ और करना आवश्यक नहीं है।
“किंतु केशव, आपने हाथी को क्यों निशाना बनाया?” अर्जुन ने पूछा।
“क्योंकि यही वह हाथी है जिसने उस पेड़ को गिराया था जिस पर उस गौरैया का घोंसला था।”
“कौन सी गौरैया?” अर्जुन ने आश्चर्य प्रकट किया “और वह हाथी सकुशल और जीवित है। केवल उसकी घंटी ही गिरी है।”
उसके प्रश्न की उपेक्षा करते हुए श्री कृष्ण ने उसे अपना शंख बजाने का आदेश दिया।
युद्ध शुरू हुआ और अगले अठारह दिनों में अनगिनत जीवन नष्ट हो गये। अन्त में पांडवों की विजय हुई। पुनः कृष्ण अर्जुन को लेकर रक्तिम युद्धक्षेत्र का निरीक्षण करने गये। वहाँ कईं शव पड़े थे जिनका अंतिम संस्कार भी नहीं किया गया था। युद्ध-भूमि में कटे हुए सिर, हाथ-पैर, निर्जीव घोड़े व हाथी कूड़े करकट के समान पड़े हुए थे।
कृष्ण एक स्थान पर रुके और हाथी की एक घंटी को विचार मग्न होकर देखने लगे।
उन्होंने कहा “अर्जुन, क्या तुम मेरे लिये इस घंटी को उठाकर दूसरी ओर रख दोगे?”
यद्यपि आदेश सरल था किंतु अर्जुन को तात्पर्य समझ नहीं आया। आखिरकार इस विशाल युद्धक्षेत्र में जहाँ बहुत सी अन्य वस्तुओं को हटाने की आवश्यकता थी, कृष्ण ने उसे एक तुच्छ धातु के टुकड़े को हटाने के लिए क्यों कहा? उसने उन्हें प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा।
“हाँ, वह घंटी। यह वही घंटी है जो उस हाथी के गले से तब गिरी थी जब मैंने उस पर तीर चलाया था।”
बिना कोई प्रश्न किये अर्जुन उस भारी घंटी को हटाने के लिये झुका। जैसे ही उसने उसे उठाया उसका संसार सदा के लिये परिवर्तित हो गया।
एक, दो, तीन, चार, पाँच। चार छोटी चिड़िया एक के पीछे एक करके उड़ गयीं और उनके पीछे एक गौरैया थी। माँ चिड़िया कृष्ण के चारों ओर अत्यधिक प्रसन्नता में चक्कर लगाते हुए परिक्रमा करने लगी। वह एक घंटी जो कृष्ण ने अठारह दिनों पूर्व विभाजित की थी उसने चिड़िया के पूरे परिवार की रक्षा की।
“मुझे क्षमा करें कृष्ण” अर्जुन ने कहा “आपको मानव शरीर में साधारण मनुष्यों की भांति व्यवहार करते देख मैं भूल गया था कि आप सचमुच कौन हैं।”
कृष्ण ने गौरैया को युद्ध भूमि में ही छोड़ दिया था क्योंकि यह उसके भाग्य में पूर्व निर्धारित था। वह चिड़िया अपने बच्चों के साथ किसी सुरक्षित स्थान पर जाने की इच्छा भी प्रकट कर सकती थी। वह कृष्ण से उसे अपने साथ ले जाने के लिए भी तर्क कर सकती थी। वह विनती कर सकती थी कि उसे तीन सप्ताहों का भोजन प्रदान किया जाये। उसने इनमें से कुछ भी नहीं किया। उसने केवल निर्देशों का पालन किया तथा स्वयं को उनके हाथों में सौंप दिया जिस पर उसे विश्वास था। उससे जो प्रयास अपेक्षित था उसने उसका त्याग नहीं
गीता में बार-बार ईश्वर पर पूर्ण रूप से विश्वास कर खुद को उन्हें सौंप देने की बात कही गई है। अतः मनुष्य को ईश्वर की भक्ति में पूर्णतः खुद को समर्पित कर देना चाहिए, जो भी हो रहा है उसे उनकी ही इच्छा मानकर उनका नाम जपना चाहिए। ऐसा करने वाला मनुष्य संसार के समस्त पापों से मुक्त हो ईश्वर के कृपा का पात्र बनता है और उसके सभी पापों का नाश होता है।
स्वयं (अपने आपको) भगवान् के अर्पित करना कि मैं भगवान् का ही हूँ और भगवान् ही मेरे हैं। स्वयं को भगवान् के अर्पित करने से नाम-जप, चिन्तन, ध्यान, सेवा-पूजा, आदि तथा शास्त्रनिहित कर्म मात्र स्वतः भगवान् के लिए ही
होती हैं।
शरीर प्रकृति का और जीव भगवान् (परमात्मा) का अंश है। प्रकृति के कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहम् से तादात्म्य, ममता और कामना न करके केवल भगवान् को ही अपना मानने वाला यह कह सकता है कि 'मैं भगवान् का हूँ और भगवान् मेरे हैं।' जैसे की चिड़िया ने स्वयं को अपने बच्चोंसहीत भगवान श्रीकृष्ण को सम्पूर्ण विश्वाससे समर्पित कर दिया था।
रात्री के बाद निश्चीत सूर्योदय होना है यह सम्पूर्ण जगत का विश्वास। कीचड़ में उगते कमल को भगवद् चरणों में स्थान मिलना है यह विश्वास। गोपियोंको कृष्ण के प्रति अनुरागी विश्वास। संत सज्जनों को भगवद् भक्ति लिनता से मोक्ष प्राप्ति का विश्वास। सत्य को विश्वास की असत्य की हार निश्चित है।
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असंमूढ: स मर्त्येषु सर्वपापै: प्रमुच्यते ।।3।।
इस श्रीमद्भगवदगीता के अद्याय 10 के 3 रे श्लोक कोवर्तमान परिप्रेक्ष्य में समझा जाए तो जो भी हो रहा है उसको भगवान की इच्छा जानते हुए उसको स्वीकार करते हुए अनुशासन में रहें व उसकी सत्ता को सर्वोपरि मानें। भगवान अजन्मा है। वह समय समय पर पकृति को संतुलित भी करता है। यदि हम अनादि भगवान की सत्ता में पूर्ण विश्वास करते हुए उसे ही सब कारणों का कारण जानकर उनकी भक्ति करें तो भय व दुःख से मुक्ति मिलती है तथा समस्त पापों का भी नाश होता है।
निस्वार्थ भाव के साथ व सम्पूर्ण श्रद्धा से कर्म सर्वशक्तिमान परमेश्वरको अर्पण करनाही समर्पण है
समर्पण से ही परमात्मा सहाय बनते हैं। मीरा ने समर्पण यह कहकर कि 'मेरो तो गिरधर गोपाल बस दूसरो न कोई' किया तो मीरा को पिलाया जाने वाला जहर परमात्मा ने अमृत में बदल दिया। द्रौपदी ने हार थक कर जब अंत में केवल और केवल श्रीकृष्ण को समर्पण किया तो भगवान श्रीकृष्ण ने उनका चीर हरण नहीं होने दिया। समर्पण। राजा जनक ने अष्टावक्र ऋषि के प्रति समर्पण किया तो राजा जनक को तत्क्षण ज्ञान हो गया। रामकृष्ण परमहंस के प्रति बालक नरेंद्र का, जो कि बाद में स्वामी विवेकानंद के नाम से जाने गए, समर्पण हुआ तो काली मां उनके हृदय में प्रकट हो गई।
महाभारत युद्ध के दौरान अपने आपको स्वावलंबी समझ अर्जुन योगेश्वर श्रीकृष्ण भगवान के प्रति समर्पण को भूले तो धनुर्धारी अर्जुन के तीर चलने रुक गए। अर्जुन ने पीछे मुड़कर श्रीकृष्ण को निहारा। श्रीकृष्ण बोले 'चलाओ तीर।' अर्जुन सब कुछ समझते हुए बोले, 'भगवान भूल हो गई थी।' भगवान के प्रति अर्जुन का समर्पण भाव बना तो पुन: तीर चलने आरंभ हो गए। त्रेतायुग के अवतार भगवान श्रीरामचंद्र के प्रति भक्त हनुमान के समर्पण से हनुमान को इतनी शक्ति प्राप्त हो गई थी कि उन्होंने समुद्र पर पुल का निर्माण कर दिया था। समर्पण से महान उपलब्धि मिलती
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