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गीता मैत्री अंक ३जनवरी से जून २०२२
०७आयोजन और अभियान

गीता भक्ति दिवस

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गीता परिवार के संथापक अध्यक्ष प. पू. स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज के 73वें जन्मदिन के उपलक्ष्य मे गीता परीवार द्वारा पौष कृष्ण, षट्तिला एकदशी के पावनपर्व पर दि. 28 जनवरी, 2022 को 'गीता भक्ति दिवस' उत्साह तथा भक्तिभाव के साथ मनाया गया। कार्यक्रम के प्रारंभ मे गीता परिवार के राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष डॉ. संजय जी मालपाणी ने कार्यक्रम की भूमिका स्पष्ट करते हुये सबको विदित किया की कार्यकर्तांओं तथा साधकों के आग्रह के पश्चात भी प.पू. स्वामीजी उनके जन्मदिन को मनाने के पक्ष मे नही रहते हैं। इसलिये हम सब लोग प. पू. स्वामीजी के जन्मदिन को 'गीता भक्ति दिवस' के रुप मे मनाने लगे हैं। दो वर्ष पुर्ण इसी श्रृंखला की एक कडी के रुप मे 'गीता महोत्सव' मनाया गया जिसमे पैंतिस हजार बालकोंने प. पू. स्वामीजी के 70वें जन्मदिन के उपलक्ष्य मे 70 हजार गीता अध्याय पठण कर अर्पण किये थे। उस के उपरांत इस वैश्विक महामारी के चलते गीता परिवार भी ऑनलाइन संथा के माध्यम से विश्वभर मे विस्तारित हो गया है। आज के इस 'गीता भक्ति दिवस' को 125 देशोंसे एकत्रित हुए शिष्यगण इस कार्यक्रम के माध्यम से मना रहे हैं।

आरंभ की प्रार्थना के पश्चात विश्वभर के 73 देशों से अनेक साधकों ने एक साथ दीप प्रज्ज्वलित कर प. पू. स्वामीजी के प्रणाम अर्पित किया। इस दीप पप्रज्ज्वलन की पार्श्वभूमि पर चल रहे गीता परिवार बाल-वृंद तुल्सिका दीदी के प्राक्कथन के नेपथ्य में श्रीमती विजया गोडबोले ताई द्वारे गाये हुए गीत ने वातावरण अतिमधुर एवं अर्थपूर्ण कर दिया।

इस उपरांत वेदश्री तपोवन स्थित 71 वैदिक छात्रों ने वेदमंत्रो के शक्तीपूरित शास्त्रीय पद्धति से पठन द्वारा प.पू.स्वामीजी का अभिष्टचिंतन किया।

गीता परिवार के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ.आशू जी गोयल ने स्वागत भाषण करते हुए बताया की विगत दो वर्षों मे 'लर्नगीता प्रकल्प' के माध्यम से विश्वभर के 123 देशोंसे 3.5 लाख से अधिक साधक प्रतिदिन 1 हजार से अधिक ज़ूम कक्षाओं के माध्यम से ऑनलाइन गीता संथा से जुडे हैं। इस समय आशू भैया ने देश-विदेश से

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इस 'लर्नगीता' कार्यक्रम मे सेवा दे रहे सभी सेवाकर्ताओं को “गीता पढ़ें, पढ़ा और जीवन में लाए” इस संदेश का पुनः स्मरण कराया।

इसके पश्चात गीता परिवार के परभणी के साधकों ने 1 6 वें अध्याय पर आधारित एक अत्यंत सुंदर, मनभावन, सामुहिक शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुत किया। नृत्य के माध्यम से इन सेवाकर्ताओं ने दैवी एवं आसुरी गुणों सुंदर चित्रण सादर किया।

'गीता न केवल भक्ति का महत्व वर्णित करती है वरन् शक्ती का महत्त्व भी बताती है', यह संदेश लेकर श्रीमती प्रमिला देवी माहेश्वरी जी, उपाध्यक्ष, गीता परिवार के नेतृत्व मे गीता परिवार का एक अंग 'अर्जुन युवा मंच' के युवा एवं युवतियों ने इसके पश्चात् अपने शस्त्र विद्या के कौशल्य का परिचय देते हुए तलवार बाजी से 73 निंबुओं का लक्ष्यवेध किया।

वीरतापूर्ण अद्भुत प्रदर्शन के पश्चात् समय था, गीता संथा वर्ग में जो सिखाया जाता है उसका एक प्रातिनिधिक स्वरूप में एक छोटा सा प्रात्यक्षिक देखने का ! 6 वर्ष के बालक रेवांश से लेकर 79 वर्ष के आयु के गोखले काका तक गीता संथा वर्ग से शिक्षा प्राप्त कर गीता के सभी 18 अध्यायों को कंठस्थ करने वाले इन साधकों ने अपने कंठस्थीकरण की छोटी सी परीक्षा सबके सामने प्रस्तुत की। किसी भी श्लोक की पहले पंक्ति का प्रारंभ कर देने पर उन्होंने बिना देखे, बिना समय गवाएं, तुरंत वह श्लोक और उसके आगे का श्लोक गा कर सबको प्रभावित कर दिया।

गीता में वर्णित सौ सद्गुणों को एक माला में पिरो कर उन्हें इसके बाद एक सुंदर गीत के माध्यम से प्रस्तुत किया गया।

आ. श्री संजय भैया ने कार्यक्रम को आगे बढाते हुए, इस कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि डॉक्टर जयदीप जी आर्य, मुख्य केंद्रीय प्रभारी, पतंजलि योगपीठ का परिचय दिया।

जयदीप जी आर्य ने इस समय अपने विचार व्यक्त करते हुए प. पू. स्वामीजी के समक्ष इस पावन पर्व पर अतिथि के रुप मे सम्मिलित कराने के लिये अपनी कृतज्ञता प्रकट की। उन्होने कहा कि गीता परिवार तथा पतंजलि योग पीठ एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर है। गीता के 'यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम। इस श्लोक का संदर्भ देते हुए डॉ.आर्य ने कहा कि, जहाँ इस प्रकार गीता प्रचार-प्रसार

के लिए समर्पित कार्य होता हो वहाँ विशाल शक्ति का अर्जन होना निश्चित है। विश्व के तथा भारत के सभी तत्ववेत्ता तथा महान ऋषि मुनियों ने गीता के महत्व का निरंतर वर्णन किया है । गीता परिवार द्वारा आयोजित इस स्वाध्याय तथा तप रूपी यज्ञ को अनेक

शुभकामनाएं देते हुए डॉ.आर्य ने अपने वचनों को विराम दिया।

डॉ. आर्य जी के संबोधन के पश्चात डॉ. संजय भैया ने प्रस्तावित किया कि अगले वर्ष प. पू. स्वामीजी के 74वें जन्मदिवस के अवसर पर गीता परिवार 740 गीताव्रतीयों के साथ पतजंलि योग पीठ पधारेंगे और वहाँ गीता भक्ति दिवस मनायेंगे।

आगे बढते हुए कार्यक्रम मे गीता परिवार के सक्रिय सदस्य श्री सत्यनारायणजी मुंदडा द्वारा संकलित “शॉर्ट नोट्स इन इंग्लिश फॉर संस्कार पाथेय” इस पुस्तक का विमोचन प. पू. स्वामीजी के करकमलों द्वारा किया गया। इस पुस्तक समेत गीता परिवार के ई न्युज लेटर 'गीता मैत्री' के नवंबर एवं दिसंबर माह के अंक का भी प. पू. स्वामीजी द्वारा विमोचन किया गया।

इसके पश्चात प. पू. स्वामीजी ने अपने आशीर्वचन से सबको संबोधित किया। प्रारंभ मे ही प. पू. स्वामीजी ने विश्व के 73 विभिन्न देशों से किए गए दीप प्रज्वलन की प्रशंसा कर सभी सेवाकर्ताओं के उत्साह को द्विगुणित किया। सद्गुणों के गीत के संबंध में स्वामी जी ने कहा कि “इस गीत के लिए सबको गीता का चिंतन एवं मंथन करना पड़ा। श्रीमद्भगवद्गीता गुणों का सागर है, अनेक रत्न उस में छुपे हुए हैं और आप लोगों ने मंथन कर इस सागर से रत्नों को निकाल लाया और गीतों में पिरो दिया। ” इस कृति में छिपे हुए रहस्य का उद्घाटन करते हुए परम पूज्य स्वामी जी ने कहा, “जब हम गीता जी के सान्निध्य में आते हैं, तो हमारा जीवन सुगंधित हो जाता है, जीवन अलौकिक होता जाता है। हमारे चिंतन की धारा बदलती है, हमारा जीवन अमूल्य होता जाता है। प. पू. स्वामी जी ने आगे कहा कि शिष्यगण जिन सद्गुणों को उनमे देखते हैं वह सद्गुण यदि उनमें होंगे तो वे सब सद्गुण श्रीमद्भगवद्गीता के मनन, चिंतन एवं भगवद्गीता के प्रति उनके प्रेम का ही परिणाम है। 'निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्' इस भगवद्गीता के चरण का उल्लेख करते हुए हुए प. पू. स्वामी जी ने एक दिव्य संदेश देते हुए कहा कि 'भगवद्गीता का प्रचार एवं प्रसार होना ही है, योग का प्रचार एवं प्रसार होना ही है। भारत माता अब जाग उठी है, हमारे देश का भविष्य बदल रहा है। हम लोग एक पुनरुत्थान के युग में आ पहुँचें हैं । हम इसमें अपना योगदान दे या ना दे, यह सब विधि लिखित होकर ही रहेगा । अतएव हम यदि इस सेवा के माध्यम से इस विशाल कार्य में जुड़ जाते हैं तो इस महान परिवर्तन का, इस महान प्रगति का, कुछ तो श्रेय हमें भी प्राप्त होगा। यदि हम अपने अहंकार के कारण अपने आप को इस महान कार्य से जुड़ने से रोकते हैं, तो उससे इस कार्य की या देश के प्रगती की कोई हानि नहीं होने वाली

है। अपितु हम अपने आप को इस महायज्ञ से दूर रख कर अपनी स्वयं की क्षति करेंगे। यह जगन्नाथ का रथ है और जो चलने ही वाला है। देश के भाग्य ने करवट बदल ली है, देश का पुरुषार्थ जग चुका है। सभी दृश्यों से देश का यह जागरण विलोकनीय लगता है। इसके कारण जो आनंद प्राप्त होता है, उस आनंद के साथ हमें इस कार्य में संलग्न होना चाहिए। हमें भगवद्गीता का कार्य, इस देश के सेवा का कार्य, देश की आगे की पीढ़ी को सक्षम बनाने का काम है। यह एक श्रेष्ठ कार्य है । समाज को अगर बदलना है, परिवर्तित करना है, तो परिवर्तन केवल नियमों से और विधि से नहीं होता है। उसके लिए

समाज को अंतरंग से बदलना चाहिए। अंतरंग से परिवर्तित समाज एक तेजस्वी समाज होता है। मैं देश के कुछ ऐसे संगठनों को जानता हूँ जिनके समर्पित कार्यकर्ताओं ने देश के उत्थान के लिए अपना सर्वस्व अर्पण किया है। इसी कारण हमारा देश जागृत हुआ है। गीता परिवार के जो 4-5 हजार सेवाकर्ता है, जो पूर्व समर्पण के साथ सेवा दे रहे हैं, मैं चाह कर भी उनके साथ वयक्तिक संबंध स्थापित नहीं कर पाता हूँ। परंतु इसके उपरांत भी वे सब इस सेवा को पुर्ण समर्पण के भाव के साथ कर रहे हैं। यह सब सेवाकर्ता स्वयं जाग चुके हैं तथा देश जगाने का जो कार्य चल रहा है उसमें सक्रिय रूप से योगदान दे रहे हैं। लोगों का इस बात का आश्चर्य होता है की गीता परिवार का यह विशाल कार्य पूर्णरूप से केवल सेवा भाव से कैसे चल रहा है। हमें आगे भी और बड़ा कार्य करना है। महाभारत में कहते हैं कि हमें प्रारंभ में ही संतोष नहीं करना चाहिए। जिसने संतोष कर लिया, उसकी प्रगति रुक जाती है। मैं महाभारत को भगवद्गीता का सर्वोत्तम भाष्य मानता हूँ। महाभारत के परिपेक्ष में यदि हम गीता समझते हैं, तो हम वास्तविक रूप में गीता को समझ पाते हैं। अगर हम बाकी बातों में संतोष मानते हैं तो वह ठीक है। परंतु गीता के प्रचार-प्रसार के कार्य में हमें संतुष्ट नहीं होना है। हमें सतत इस बात पर चिंतन करते रहना चाहिए कि हमने बाहर कितने लोगों तक गीता पहुँचाई है और हमारे अंतर में गीता का संदेश कितनी गहराई तक पहुँचा है। इस प्रकार हमें अंतरंग और बहिरंग से गीता के साथ संलग्न होना चाहिए। जो जीवन गीतामय होता है, वह भगवान श्री कृष्ण को अत्यंत प्रिय होता है। गीता प्रचार एवं प्रसार का हमारा कार्य यज्ञ भी है, तप भी है और दान भी हैं। यह कार्य हमारे जीवन में अपने आप सुगंध लाता है, हमारे जीवन को अलौकिक करता है, हमें निराशा से बाहर निकालता है। हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक होता है। यह न केवल मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है किंतु यह जीवन कैसे जिया जाए इसका प्रत्यक्ष मार्गदर्शक है। इस मार्ग पर आप लोगों के साथ चलने में मुझे स्वयं को अत्यंत आनंद की अनुभूति होती है । आप सब लोग गीता परिवार को एवं

गीता प्रचार-प्रसार के कार्य को संभाल रहे हैं। इससे मुझे और महत्वपूर्ण कार्यों के लिए समय देना संभव हो पा रहा हैं। (प. पू. स्वामीजी रामजन्मभूमि न्यास के कोषाध्यक्ष भी हैं) इसका मुझे आनंद एवं समाधान है। कुछ दिन पुर्व एक सुंदर बात मेरे अंदर से प्रकट हुई : “हर घर गीता हर कर गीता” । हमें गीता को हर घर में और हर घर के हर हाथ में पहुंचाना है। यह सूत्र हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमारा जीवन एक आनंद यात्रा है और यह आनंद यात्रा इसी प्रकार चलती रहनी चाहिए।

अपने वक्तव्य का समारोप करते हुए प. पू. स्वामीजी ने हमारे जीवन मे भगवान की उपस्थिति का गुह्य मन्त्र सबको देते हुए कहा कि 'आप लोगों ने मेरा जन्म दिवस मनाया। इस प्रकार के आयोजन में मुझे लेश-मात्र भी रुचि नहीं है। परंतु यदि इससे आप लोगों को आनंद मिलता है, तो यही मेरे लिए आनंद की बात है। हमारा कार्य चलता रहे और इसमें किसी भी प्रकार की व्यक्ति निष्ठा का निर्माण ना हो इसका हमें ध्यान रखना है। मैं आपके साथ हूँ, आप मेरे साथ हैं। हम दोनों अगर एक दूसरे के साथ हैं तो प्रत्यक्ष भगवान भी हमारे साथ हैं।'

हम सब गीता भक्ति दिवस मना रहे थे, भगवद्गीता में भक्ति की महिमा वर्णन करने वाला अत्यंत सुंदर एवं अर्थपूर्ण अध्याय है अध्याय क्र.12 इस भक्ति दिवस को अधिक सार्थक एवं आनंदमय बनाने के लिए 12वें अध्याय के सामूहिक अनुपठन से और क्या सुन्दर मार्ग हो सकता था ? नागपुर से श्रीनिवास वर्णेकर जी के नेतृत्व में गीता परिवार नागपुर के सदस्योंकी अगुवाई बारहवें अध्याय का सामूहिक अनुपठन किया गया। इस में सभी उपस्थित महानुभाव अपने अपने स्थानोंसे सम्मिलित हुए। यह एक अनुपम और अलौकिक दृष्य था, जहाँ विश्व भर से कोने कोने से साधक गीता भक्ति दिवस मनाने हेतु एक साथ, एक सुर में, एक लय में और भक्ति भाव के साथ भक्ति योग की शिक्षा देने वाले श्रीमद्भगवद्गीता के 12वें अध्याय का सहस्त्र कंठोंसे अनुपठन कर रहे थे।

इस भव्य, दिव्य एवं भावविभोर कर देने वाले अनुपठन के पश्चात् गीता परिवार के दक्षिणांचल प्रभारी तथा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री हरिनारायण व्यास जी ने धन्यवाद ज्ञापन दे कर कार्यक्रम का समापन किया। कार्यक्रम के अंत मे सभी को इस कार्यक्रम मे सहभागिता के फलस्वरुप 'गीता भक्ति दिवस प्रमाणपत्र' डीजिटल स्वरुप मे वितरित किया गया।

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