
स्तर–4 द्वितीय बैच की पूर्णाहुति एवं चतुर्थ बैच का उद्घाटन समारोह
विभिन्न समारोह
12 जनवरी 2022 के संक्रमण काल, विश्ववंदनीय स्वामी विवेकानंद जी के जन्मदिवस एवं मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर गीता परिवार के एक स्तर का आरम्भ और एक स्तर के अंत का अद्भुत संयोग उत्पन्न हुआ। जहाँ पर जून लेवल 4 (द्वितीय बैच ) की पूर्णाहुति तथा नवंबर लेवल 4 (चतुर्थ बैच ) का शुभारम्भ हो हुआ। आदरणीय संजय भैय्या जी ने कार्यक्रम के मुख्य अतिथी शारदा पीठ के परम् श्रद्धेय शंकराचार्य श्री श्री श्री विधुशेखर भारती जी को उद्बोधन हेतु आमंत्रित किया।
शारदापीठाधीश्वर विधुशेखर भारती जी ने अपनी दिव्य वाणी से सभी को सम्बोधित करते हुए कहा की मनुष्य जन्म दुर्लभं एवम श्रेष्ठ है। इसे अच्छे कामों में उपयोग लाकर सार्थक करना चाहिए। जीवन को सार्थक एवं धार्मिक जीवन जीने का मार्गदर्शन हम हमारे धर्म के मूल ग्रंथों, वेद, पुराण, स्मृति, इतिहास इत्यादि तथा गुरु के उपदेश द्वारा प्राप्त कर सकते है। किन्तु इन सद्ग्रन्थों को पढ़ना एवं समझना साधारण मनुष्य के लिए कठिन है अतः साधारण मनुष्य के कल्याण लिए भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को निम्मित रूप में रख कर गीता का उपदेश दिया। सनातन धर्मानुयायी को तो गीता का अध्ययन अवश्य ही करना चाहिए क्योंकि सनातन धर्म के मूल ग्रंथों के विषय एवं गीता के विषय एक ही हैं। अतः गीता के अध्ययन से सभी ग्रंथो का अध्ययन भी स्वतः ही हो जाता है। गीता पूरे विश्व के कल्याण के लिए लिखा गया ग्रन्थ है। जिसकी सीमा देश, भाषा, जाति, समुदाय में सीमित नहीं है, यह विश्व के प्रत्येक मनुष्य के लिए लाभप्रद है। दशमी तिथी को आयोजित पूर्णाहुति कार्यक्रम को बहुत संतोषप्रद बताते हुए स्वामी जी ने गीता परिवार के कार्यक्रम की प्रशंसा करते हुए सभी विद्यार्थियों एवं कार्यकर्ताओं को अपना आशीर्वाद प्रदान किया। साथ ही स्वामी जी ने कामना की गीता साधकों की यह संख्या हज़ारों और लाखों से बढ़ कर करोड़ों में पहुँच जाये।
आदरणीय संजय भैया ने शंकराचार्य महाराज जी बहुत आभार प्रकट किया तत्पश्चात् आदरणीय संजय भैय्या ने हम सभी के परम् पूज्य तथा गीता परिवार के मूलाधार एवं प्रणेता स्वामी गोविन्द देव गिरिजी महाराज जी को आशीर्वचन देने के लिए निवेदन किया । पूज्य स्वामी जी ने कहा की पूर्णाहुति एवं शुभारम्भ का कार्यक्रम एक साथ होना एक संक्रमण काल जैसा ही है ठीक वैसे ही जैसे मकर संक्रांति पर होता है । इसका अपना विशेष महत्व होता है ऐसे ही महत्वपूर्ण दिवस १२ जनवरी १८६३ को मकरसंक्रांति के ही दिन स्वामी विवेकानंद जी का जन्म हुआ था। हम
सभी— गीता पढ़ना, पढ़ाना एवं जीवन में उतारना - इसी को अपने जीवन की साधना बनाकर चले हैं। सारे विश्व का वांग्मय, महापुरुषोंका जीवन जानना और उनके विचारों का अध्ययन करना- इससे बड़ा लक्ष्य हो नहीं सकता और हमारी यह साधना हमारे जीवन को आनंदमय बना देगी। हमारा जीवन आनंदमय बने व्यक्तिगतरूप से यह पर्याप्त नहीं होता है। स्वामी विवेकानंद जी भी सारा जीवन हिमालय की कंदराओं में बैठकर गुजर सकते थे किन्तु गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य करके स्वामी जी भारत माता की सेवा के लिए चल पड़े थे। सेवा का मूल मंत्र बताते हुए स्वामी जी बताते है कि " शिव भावे जीव सेवा " जीवों की सेवा उन्हें शिव मानकर करनी चाहिए ।इससे सारा जीवन ही बदल जाता है । सच्ची सेवा करनी हो तो व्यक्ति को गुरु गोविन्द सिंह जी जैसा बन कर करनी चाहिए जिन्होंने अपना सर्वस्व स्वराष्ट्र तथा स्वधर्म की बलिवेदी पर बलिदान कर दिया ।
आदर्श हमेशा बहुत ही बड़े होने चाहिए तभी कुछ कार्य संभव हो पाता है । हम सभी को ऐसा यही ऊँचा लक्ष्य लेकर चलना चाहिए ।
आज भारतमाता कुछ और मांग रही है । स्वामी विवेकानंद हमेशा युवाओं से यही पूछा करते थे कि “आपने आनंद मठ पढ़ा है क्या ?” पूज्य स्वामी जी ने कहा कि “यही प्रश्न मैं गीतापरिवार के विशिष्ठ कार्यकर्ताओं से करना चाहता हूँ ।” हम सभी को बंकिम बाबू का उपन्यास “आनंद मठ” एक बार अवश्य ही पढ़ना चाहिए , जिसमे “वन्दे मातरम्” पहली बार छपा था। और जिसमें भारत माता बलिदान मांगती है । इस “वन्दे मातरम् ” का गान करते हुए हमारा भी रोम रोम पुलकित हो जाना चाहिए।
स्वामी विवेकानंद जी ने प्रत्यक्ष राजनीति में कुछ नहीं किया किन्तु राष्ट्र के लिए युवकों को प्रेरणा देकर, उनको खड़ा करने का उन्होंने महान कार्य किया । स्वामी जी को वेद एवं इतिहास कंठस्थ थे, जिससे वे ईसाई मिशनरियों एवं विदेशी विद्वानों के भारत के प्रति कुप्रचार एवं पूर्वाग्रहों को काट देते थे ।
इसी संदर्भ में स्वामीजी ने कहा कि हमें अपने जीवन एवं कार्य में अर्थ भरना है तो हमें अपने इतिहास को पढ़ना एवं जानना चाहिए । हमें अभी तक झूठा - कपोल कल्पित - नकारात्मक इतिहास पढ़ाया जा रहा है । गुरूजी गीता परिवार के प्रारंभिक दिवसों का स्मरण करते हुए बताते है कि पूर्व के दिनों में गीता परिवार द्वारा भारत का वास्तविक इतिहास पढ़ाया जाता था।
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इतिहास अध्ययन के ऐसे ही एक प्रसंग में जब गुरु जी ने छात्रों के समक्ष महाराणा प्रताप के द्वारा 32 किलों के विजय की कहानी सुनाई तब उस कक्षा में उपस्थित सभी छात्रों का रोमांच और हर्ष अपने चरम पर पहुँच गया था और महाराणा प्रताप के 32वें किले के विजय की बात सुनते ही पूरा सभा सदन तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था। जबकि उन दिनों में गीता परिवार में तालियां बजाना वर्जित था अत: इस घटना से वे स्वयं आश्चर्यचकित एवं स्तब्ध रह गए थे।
हमारा इतिहास हमें रोमहर्षकता देता है, हमें स्फूर्ति और चेतना प्रदान कर सही मार्ग दिखता है। जो अपने इतिहास को भूल जाते है वे अपना भविष्य निर्माण नहीं कर सकते। डॉ आंबेडकर जी भी कहा करते थे कि "आर्य जैसा कोई वंश नहीं होता, यह मूर्खों की बकवास है जो आर्यों को वंश बताते हैं। "
आर्य का अर्थ होता है - जिसमे सद्गुण भरे हों- “कृण्वन्तो विश्वम् आर्यम" का अर्थ होता है की सारे संसार को संस्कृति देकर सद्गुणों से भर देने वाले ।
आर्य बाहर से नहीं आये थे। आर्य द्रविड़ जैसा कोई संघर्ष नहीं था। यह बात अब प्रमाणित हो चुकी है। सिकन्दर ने भारत को जीता नहीं था, बल्कि पोरस से संधि करके वह लौट गया था। सूफी लोगों ने इस देश को बर्बाद करने एवं धर्मान्तरण करने के लिए छिपे ढंग से बहुत सारा काम किया । यह बड़ी विडम्बना ही है की हम सूफी लोगों का नाम सम्मान से लेते हैं ।
हमें यह सब अवश्य ही जानना चाहिए। अगर हम यह भूल गए तो कभी भी अपने सुखद और उज्जवल भविष्य का निर्माण नहीं कर पाएंगे । न भूलें, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को ! न भूलें, उन क्रांतिकारियों को जिन्होंने भगवद्गीता को हाथों में लेकर देश के लिए हँसते- हँसते फांसी के फन्दों को चूम लिया था ।
अंत में गुरु गोविन्द देव गिरि जी महाराज ने बड़े ही भावपूर्ण होकर ओजस्वी गंभीर स्वर में कहा कि "अगर अपने भीतर स्वामी विवेकानंद का निर्माण करना है, तो वेदांत पढ़ना होगा, गीता कंठस्थ करनी होगी, भारत माता से प्रेम करना होगा और हमारे वास्तविक इतिहास को जानना होगा। यह हमारे अंतर को ज्वाला से भर देगा, मस्तक को ठंडा रखकर गतिशील कार्य करने की प्रेरणा देगा। आपको अनेक कष्ट मिलेंगे किन्तु कष्ट भी प्रतीत नहीं होगा। आपका कष्ट तप बन जायेगा
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और आपके इस तेजोमय तप से भारतमाता का कल्याण होगा। भारतीय जनता की सेवा होगी। जीवन सार्थक होगा। "
यह आज की घडी में हमारे लिए स्वामी विवेकानंद जी का जीवन का सन्देश है :-
एष उपदेशः
एष आदेश, एतद् अनुशासन ! भारतमाता की जय !
कार्यक्रम की रूपरेखा एवं सम्मिलित सदस्य
सूत्र-सञ्चलन :
- श्रीमती कविता मानधने (पुणे, महाराष्ट्र)
आरम्भ- प्रार्थना :
- श्रीमती बिनीता देसाई (लन्दन, यू.के.)
दीप-प्रज्वलन :
- श्रीमती कविता तापड़िया (अहमदाबाद, गुजरात)
- श्रीमती विनी माहेश्वरी (मुंबई, महाराष्ट्र)
- श्रीमती पुनिता प्रसाद (चेन्नई, तमिलनाडु)
आभार ज्ञापन :
- श्रीमती कल्याणी जी शेष (नागपुर, महाराष्ट्र)
समापन प्रार्थना :
- सुश्री चारुशीला दांडे (शिकागो,अमेरिका)
मनोगत :
- सुश्री आनंदी नीलेश भुआर्य (अमरावती, महाराष्ट्र)
- श्रीमती प्राजक्ता अम्बेकर (कैलिफोर्निया, अमेरिका)
- श्रीमती मधुरा पाठक (पुणे, महाराष्ट्र)
- श्री अशोक शर्मा (गीताभवन, ऋषिकेश)
- श्री एस. एस. राठी (आनंद, गुजरात)
- श्री श्याम पांसे
- श्री अंजू महरोत्रा
- सुश्री सुकन्या नायर
- श्रीमती बीना गोड़ा
- श्रीमती भारती धुरत्कर
विभिन्न वर्गों के उदघाटन समारोहों की झलकियाँ
| 16th Batch March L1 | - 7/03/22 | https://youtu.be/7I_tM6DrLIA |
|---|---|---|
| 16th Batch April L2 | - 8/04/22 | https://youtu.be/3KyKERuLwac |
| 17th Batch March L1 | - 11/ 04/22 | https://youtu.be/४NJNL5TMXjM |
| 17th Batch May L2 | - 13/05/22 | https://youtu.be/ipykaqsqSSQ |
| 4th Batch May L4 | - 18/05/22 | https://youtu.be/OdQhaxLH९FQ |
| 8th Batch May L3 | - 20/05/22 | https://youtu.be/Or-mC९ANB-४ |
| 8th Batch May L3(II) | - 15/06/22 | https://youtu.be/Mz९fdlJgO_c |
| 18th Batch June L2 | - 27/06/22 | https://youtu.be/occ-X१xjW७४ |
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