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गीता मैत्री अंक ३जनवरी से जून २०२२
०६गीता चिंतनिका सत्र

गीता चिन्तनिका सत्र: अध्याय 7, 8, 9 – 14 जनवरी 2022

पुत्रदा एकादशी के पावन पर्व पर दिनांक 13 जनवरी 2022 को श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय क्रमांक 7, 8, और 9 पर गीता चिन्तनिका का सत्र आयोजित किया गया था। यह सत्र गीता परिवार द्वारा आयोजित प्रति एकादशी 3 अध्यायों के क्रमश: पारायण व चिंतन शृंखला का एक भाग था।

गीता चिन्तनिका सत्र

अध्याय 7, 8, 9 – 14 जनवरी 2022

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गीता परिवार के राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष डॉ. संजय मालपाणी जी ने इस अवसर पर अपनी ओजस्वी वाणी में सभी को गीता संदेश दिया तथा गीता चिन्तनिका सत्र के महत्व के बारे में अपने विचार प्रकट किये। इस समय आ.संजय भैया ने गीता संथा के चारों सोपान पूर्ण करके गीता जी को अपने जीवन में उतारने के लिए कटिबद्ध हुए, उन सभी साधकों की सराहना की जो निरंतर रूप से गीता चिन्तनिका सत्र में सेवा देते हैं तथा इन सत्र में नियमित रूप से भाग लेते हैं।

इस विषय का विस्तार करते हुए आ. संजय भैया ने कहा कि, 'गीता जी को हम जितनी बार पढ़ेंगे, जितनी बार हम उस पर मनन व चिंतन करेंगे, उतनी बार हमें नवीन सीख मिलेगी। एकादशी न केवल एक पावन पर्व है परंतु वह भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय तिथि भी है। यही कारण है कि एकादशी को गीता जी का चिंतन करना अत्यंत लाभदायक है।' छठे अध्याय में भगवान द्वारा किये गये मार्गदर्शन का आधार लेते हुए संजय भैया ने अत्यंत सुंदर रीति से चंचल मन को अभ्यास के द्वारा कैसे स्थिर किया जा सकता है यह स्पष्ट किया एवं प्रत्येक एकादशी को गीता चिन्तनिका के माध्यम से गीता के क्रमशः अध्यायों का सामूहिक पठन किस प्रकार से अभ्यास का एक उत्तम उदाहरण है, इसका महत्व प्रकट किया। प्रत्येक गीता चिन्तनिका सत्र में नवीन साधक चिन्तनिका एवं परिपाठ के लिये आते है, इस वैशिष्ट्य को सराहते हुए संजय भैया ने कहा कि गीता एक माता की भाँति इन सभी नवीन साधकों को उनकी प्रकृति एवं अभ्यास के अनुरूप प्रसाद देती है।

भगवान द्वारा सातवें अध्याय में दिये गये मार्गदर्शन की चर्चा करते हुए संजय भैया ने अत्यंत सरल किंतु प्रभावी पद्धति से यह समझाया कि यदि हमें अपने जीवन में तेजस्वी बनना है तो उसके लिये भगवान का सान्निध्य बहुत आवश्यक है। यह तेज प्राप्त करने के लिये एवं इस हेतु हमें सतत परमेश्वर का मनन चिंतन करके हमारे अंतर में स्थित ईश्वर को सदैव जागृत रखना है।

भगवान द्वारा आठवें अध्याय में दिये गये, 'यदि मुझे प्राप्त करना चाहते हो तो प्रति क्षण मेरा स्मरण करो' - इस संदेश का विस्तार करते हुए संजय भैया ने बताया कि हमें अपना विवेक हर क्षण जागरूक रखना है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारा मन और हमारी

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बुद्धि तभी एक साथ रहते हैं जब हमारा विवेक जागरूक रहता है। विवेक के जागरूक होने के कारण हम भगवान का स्मरण करते हैं और जिस क्षण हम हमारे विवेक को जागृत करते हैं उसी क्षण हम तेजस्वी बन जाते है।

नौवें अध्याय में भगवान द्वारा दिये हुए शिक्षा का विवेचन करते हुए संजय भैया ने कहा कि भगवान तो केवल स्नेह एवं प्रेम चाहते है। प्रेम से दिए गए पत्र, पुष्प, फल इतना ही नहीं तो केवल अल्प सा जल भी भगवान को प्रिय होता है। “भगवान भक्त की भावना, उसका प्रेम इस से प्रसन्न होते है” यह महत्वपूर्ण सूत्र इस समय संजय भैया ने सब को विस्तार के साथ समझाया। अपने वक्तव्य का समापन करते हुए संजय भैया ने इस गीता चिन्तनिका सत्र के लिए सब को शुभकामनाएं दी ।

इसके उपरांत सातवें अध्याय का पठन गीताव्रती श्रीमती मंगला अशोक नगरकर द्वारा किया गया। उनके बाद गीताव्रती श्रीमती अंजली लाहोटी जी ने आठवें अध्याय का तथा गीताव्रती श्रीमती शांता भुतडा जी ने नौवें अध्याय का मनभावन अनुपठन किया।

तीनों अध्यायों के अनुपठन के पश्चात इन तीनों अध्यायों का चिंतन प्रारंभ हुआ।

गीताव्रती श्रीमती संगीता गर्गे जी ने सातवें अध्याय का चिंतन सादर किया। उन्होंने बताया की सातवें अध्याय के प्रथम श्लोक के विषय में गीता परिवार के संस्थापक अध्यक्ष प.पू. स्वामी श्री गोविन्ददेव गिरि जी महाराज ने कहा है कि इस एक अध्याय का मनन चिंतन करना पूर्ण गीता के अभ्यास करने के समान है। ईश्वर को निरंतर स्मरण करते रहना यह मानव द्वारा किया जाने वाला सर्वोच्च पुरुषार्थ है। परमात्मा को अपना सर्वस्व अर्पण करनेवाले साधक ही परमेश्वर को तत्वतः जान सकते हैं। सातवें अध्याय का विषय ज्ञान विज्ञान योग है तथा इसमें भगवान द्वारा अर्जुन को सृष्टि निर्माण का समग्र ज्ञान प्रदान किया गया है। परमात्मा का ज्ञान ही संपूर्ण ज्ञान तथा परम सत्य है। सत्व, रज तथा तम इन तीनों गुणों के नियंता होने के उपरांत भी परमात्मा इन तीनों गुणों से परे होते हैं। जिस क्षण साधक निष्काम भक्ति करने लगता है उसी क्षण वह परम प्राप्ति की ओर अग्रसर हो जाता है। अध्यात्म का गूढ़ अर्थ स्वयं को जानना होता है।

अक्षर ब्रह्म योग पर आधारित आठवें अध्याय का चिंतन गीताव्रती सुरेश गांधी जी ने प्रस्तुत किया। आठवें अध्याय में अर्जुन के सात प्रश्नों के उत्तर देते हुए भगवान ने इस अध्याय में बताते है कि परम अक्षर का नाम 'ब्रह्म' है, 'अध्यात्म' शब्द आत्मा का वाचक है, चराचर के स्वरूप प्रकट करने के क्रिया को 'कर्म' कहते है। इसके आगे भगवान कहते की पंचमहाभूतों से बनी एवं सतत परिवर्तनशील नश्वर सृष्टि को 'अधिभूत' कहते है। ब्रह्माजी 'अधिदेव' है। सभी भूतों की अंतरात्मा के रूप में विराजमान परमात्मा को 'अधियज्ञ' कहते है। मानव अपने अंतकाल में जिस स्वरूप का स्मरण करता है, ध्यान करता है वही स्वरूप उसे प्राप्त होता है, इसी कारण हमें सतत भगवान का

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स्मरण करते रहना चाहिए। क्योंकि यदि मानव अंत काल में भगवान का स्मरण करता है तो निश्चित ही वह परम स्वरूप को प्राप्त करता है। जो आत्मा परमेश्वर को प्राप्त करता है वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है। भगवान ने यहाँ यह भी स्पष्ट किया है कि उन्हें भक्ति के माध्यम से सरलता से प्राप्त किया जा सकता है

नौवें अध्याय में भगवान ने राज विद्या राजयोग के बारे में विस्तार से बताया है। इसका सार रूप चिंतन गीताव्रती श्रीमती सुरेखा जी मनियार ने प्रस्तुत किया। जिस विद्या को जानने के पश्चात कुछ जानना शेष नहीं रहता उस विद्या को 'राज विद्या' कहते हैं तथा विश्व के सभी बातों में जो बात सबसे गुह्य है उसे 'राज गुह्य' कहा जाता है। भगवान की अनंत शक्तियां प्रकृति के द्वारा प्रकट होती है। भगवान विश्व के सभी चराचर में व्याप्त हैं और सभी चराचर भगवान का अंश है। तथापि इसके उपरांत भी भगवान किसी भी जीव से लिप्त नहीं है। इसके विपरीत जीवात्मा सांसारिक मोह माया में लिप्त होता है और इसी कारण वह जन्म-मृत्यु के चक्र से छुटकारा नहीं पा सकता। यदि जन्म मृत्यु के चक्र से छुटकारा प्राप्त करना है तो भगवान को जानना, उनको समझना तथा उनकी नवधा भक्ति आवश्यक है।

गीता परिवार के दक्षिणांचल के प्रभारी तथा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री हरिनारायण व्यास जी तथा गीता परिवार के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य श्रीमती निर्मला मारू काकी जी के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम का नियोजन एडवोकेट श्रीमती कविता मानधने जी द्वारा किया गया था।

श्रीमती उपासना झंझोटे जी ने इस कार्यक्रम का सूत्र संचालन किया तथा गीताव्रती श्रीमती कीर्ति सुहसरिया जी ने प्रारंभिक प्रार्थना प्रस्तुत की । पुणे की साधक श्रीमती सोनाली काला जी ने सुंदर दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम आरंभ किया।

कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन श्रीमती निर्मला मारु काकी जी ने किया तथा समापन गीताव्रती कु. दक्षिता अग्रवाल द्वारा समापन प्रार्थना के साथ हुआ।

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