
गीता - मेरी प्राणवायु
नमस्कार, मै महेश शेवाळे, मुंबई निवासी हूँ। मेरे दो पुत्र हैं, ज्येष्ठ पुत्र रोहित आयु १५ वर्ष तथा अवधूत आयु ११ वर्ष। इनमे रोहित का जन्म से ही एक कान पूर्ण रूप से और एक कान आधे से ज्यादा बंद था। इसके कारण उसकी श्रवणशक्ति में बड़ी मात्रा में कमी थी। श्रवणशक्ति में कमी के कारण उसके उच्चारण में भी काफी समस्याएं थी और वह साधारणरूप से उच्चारण नहीं कर पाता था। वह हिंदी-मराठी भी साधारण रूप से बोल नहीं सकता था। ऐसे मे संस्कृत उच्चारण तो उसके लिए बहुत ही ज्यादा कठिन होता था।
पिछले साल अप्रैल माह में हमने उसके एक कान का ऑपरेशन करके इम्प्लैन्ट किया है। उसके कारण अब उसकी श्रवण क्षमता में काफी सुधार हुआ है। वह ठीक से सुन पाता है, परंतु उसके उच्चारण में अभी पूर्ण रूप से सुधार नहीं हो पाया है।
जब हमें गीता परिवार के ऑनलाइन गीता क्लासेस के बारे में पहली बार ज्ञात हुआ, तो हमने हमारे घर के सभी सदस्यों का पंजीकरण किया था परंतु रोहित का नहीं किया था। उसका कारण यह था कि वह संस्कृत उच्चारण ठीक से नहीं कर पाएगा तो उसमें न्यूनता की भावना आ जाएगी, उसके आत्मविश्वास मे कमी आएगी। और यह उसके लिए दीर्घकालीन समस्या हो जाएगी। तो मैंने तब मेरी पत्नी, मेरी माँ-पिताजी, मेरा भतीजा मेरे छोटे पुत्र अवधूत इनका ही पंजीकरण किया।
इस कक्षा के प्रारंभ के पश्चात हमारे घर में इस गीता संस्था वर्ग के बारे में सदा चर्चा होती रहती थी।
रोहित को बचपन से ही प्राचीन भारतीय इतिहास के बारे में गहरी रुचि है। उसने रामायण और महाभारत दोनों का भरपूर अध्ययन किया हुआ है। घर मे सदैव गीता संथा वर्ग की चर्चा, श्लोकोंका पठन इत्यादि सुनकर वह भी गीता संथा वर्ग मे सम्मिलित होना चाहता था। हमने उसको समझाया कि उसकी विद्यालय की परीक्षा है तथा उसे उच्चरण की समस्याएं भी है। तो वह ठीक से संस्कृत श्लोक पढ़ नहीं पाएगा, इसलिए हम उसका पंजीकरण नहीं कर रहे हैं। तो उसने हम सब से बारंबार अनुरोध किया कि वह मन से प्रयास करेगा, खूब अभ्यास करेगा और ठीक से उच्चारण करेगा। वह उसे केवल एक अवसर देने के बिनती करता था।
तो उसकी लगन और इच्छा देखकर हमने नवंबर स्तर-१ के लिए उसका पंजीकरण कर दिया। उसके साथ ही में मेरा छोटा भाई और उसकी पत्नी ने भी संथा वर्ग का पंजीकरण कर दिया और वे दोनों भी रोहित के साथ ही कक्षा करने लगे। रोहित ने पूर्ण समर्पण भाव के साथ ही यह कक्षा पूर्ण की। उसने मन से सभी श्लोकों का एवं दोनों अध्यायोंका अभ्यास किया और अत्यंत सुंदर रूप से श्लोकों का पठन करने लगा। इससे उसकी उच्चारण में काफी सुधार हुआ और संस्कृत के कठिन शब्द भी वह ठीक से उच्चारण करने लगा। प्रथम स्तर (एल १) समाप्त होने के पर उसने द्वितीय स्तर (एल २) का भी
पंजीकरण किया। दूसरे स्तर मे जैसे ही 16 वा अध्याय समाप्त हुआ हो गया उसके केवल 10 दिन बाद गीता जिज्ञासु परीक्षा थी। तो उसने वह परीक्षा भी देने का निश्चय किया और परीक्षा का मन से अभ्यास प्रारंभ कर दिया । १६ वा अध्याय ०६ जनवरी को समाप्त हुआ था तो जिज्ञासु परीक्षा 16 जनवरी को थी। उसने जिज्ञासु की परीक्षा भी दे दी और इस परीक्षा मे उसे 100 में से 92 गुण प्राप्त हो गए! जब हमारे घर में मेरे माता-पिता और मेरी पत्नी ने रोहित के गुण देखे तो वह सब के सब भाव विभोर हो गए।
जिस के भविष्य को लेकर वे पिछले 15 साल से चिंतित थे वह चिंता कम हो गई। उनको विश्वास हो गया कि इस पुत्र पर श्रीगुरु की कृपा और श्रीकृष्ण भगवान का आशीर्वाद है।
वह सभी वर्गों में नियमित रूप से जाता भी है। जब से उसने अपना संथा वर्ग शुरू किया है तब से उसने उसके अध्याय के संदर्भ में जो भी विवेचन होते है, तो उनमे से एक भी विवेचन सत्र मे वह अब तक अनुपस्थित नहीं रहा है।
रोहित ने स्तर २ पूर्ण करके अब वह स्तर ३ कर रहा है। वह अब आगे जाकर गीता पाठक, गीता पथिक एवं गीताव्रती यह सभी परीक्षाएं भी देने वाला है। साथ ही मे 16 वर्ष की आयु होते ही गीता परिवार मे सेवा भी देने वाला है।
इस प्रकार गीता परिवार और गीता पठन ने रोहित के जीवन में एक चिरस्थाई सकारात्मक परिवर्तन लाया है।
इसके लिए हम सब गीता परिवार के हृदय से आभारी है।

