समत्व का साधन
भागो नहीं जागो !
गीता के उपदेश का मुख्य कारण था परिस्थितिजन्य भय के कारण हतोत्साहित अर्जुन को संबल प्रदान करना! भगवान अर्जुन के रथ की केवल डोर संभालने सारथी नहीं बनें थे, अपितु अर्जुन की बागडोर उन्होंने अपने हाथ में ली थी। जब युद्ध से अर्जुन का मन परावृत्त हो रहा है यह भगवान ने देखा तो अन्यान्य वचनों से वें अर्जुन को कर्तव्य कर्म हेतु प्रवृत्त करने में लग गये। अपनी पराजित क्षुद्र मानसिकता से अर्जुन बाहर निकले और युद्ध करे इसलिए भगवान ने आरंभ में ही अर्जुन को 'उत्तिष्ठ परंतप' (अध्याय 2.3) का आदेश दिया। अर्जुन ने युद्ध नहीं करने हेतु अनेक तर्क दिये। गुरु का हत्यारा तथा कुल का विनाशी बन रक्तरंजित हाथों से प्राप्त राज्य तथा सुख नहीं चाहिए, इसलिए शस्त्र त्याग कर पलायन करने की बात भी अर्जुन ने कही। और ऐसे विचारों से अर्जुन बाहर निकले, वह भागे नहीं अपितु जागे और युद्ध करें यह गीता का मूल उद्देश्य था।
एक ओर सोलहवें अध्याय में अहिंसा को दैवी गुणसंपद बताने वाले भगवान श्रीकृष्ण 'ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि' अर्थात् युद्धके लिए तैयार हो जा; इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को प्राप्त नहीं होगा, ऐसी बात कहते हैं यह परस्पर विरोधाभास लगता है। युद्ध के अंतिम परिणाम सदैव बुरे होते हैं ऐसा हम सदैव पढ़ते आये हैं। फिर भी भगवान अर्जुन को युद्ध के लिए प्रवृत्त कर रहे है यह पढ़कर आश्चर्य होता है अतः इस संबंध में कुछ चिंतन आवश्यक है।
संघर्ष यह मानव जीवन का स्थायी भाव है। परिस्थिति से, प्रकृति से, विरोधी विचारधारा से संघर्ष तथा अपने अस्तित्व, स्वातंत्र्य और सम्मान हेतु युद्ध सदियों से चलते आये हैं। मानव जीवन के विकास की जड़ें जितनी उसकी जिज्ञासा में निहित हैं उतनी ही युद्ध में भी छिपी हुयी हैं। सारे अंतरिक्ष विज्ञान की जड़ें युद्ध सामर्थ्य को बढ़ाने के लिए किये गये प्रयासों में मिलती है। युद्ध के परिणाम कुछ समय के लिए भले ही विनाशक लगते हो, परंतु दूरगामी परिणाम भी देखने चाहिए। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अनेकों की बली चढ़ी परंतु यदि वैसा नहीं होता तो आज भी हम परतंत्र ही होते। गुरु गोविंदसिंह जी एवं उनके समस्त परिवार की शहादत ने परकीय आक्रांताओं को रोकने एवं भारतीय जनमानस के शौर्य बढ़ाने का कारण बना। छत्रपति शिवाजी महाराज युद्ध नहीं करते तो मुगलों के आक्रमण में हम पीसे जाते। दूसरे महायुद्ध में अणु बमों की मार झेलने के पश्चात जापान का स्वत्व जगा और वह देश सामर्थ्य के साथ उठ खड़ा हुआ। इतिहास के हर पन्ने पर ऐसे उदाहरण हमें देखने मिलते हैं। महाभारत का युद्ध टालने के अनेक प्रयास हुए। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने हस्तिनापुर जाकर शांतिवार्ता का प्रयास किया। जब सारे विकल्प असफल हुए तब आरपार की लड़ाई यह एक ही पर्याय बचा था। आतातायी दुर्योधन और उसकी सेना का विनाश यही समस्या का अंतिम हल था। हस्तिनापुर साम्राज्य का उज्ज्वल हितकारी भविष्य उसी में निहित था।
कई बार हमारे व्यक्तिगत. पारिवारिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय जीवन में ऐसी घड़ी आती है जहां हमें निर्णायक भूमिका लेनी पड़ती हैं। व्यक्तिगत बैर की भावना से नहीं अपितु समष्टि के हित में कुछ कटुता भरे निर्णय करने पड़ते हैं। गीता की सीख यहीं है कि ऐसे युद्ध से कदापि भागना नहीं चाहिए अपितु अपनी बुद्धि को स्थिर कर, समत्व में रहकर, निर्वैर होकर, विवेक को जगाकर, भगवद्स्मरण करते हुए अर्थात् जाग कर युद्ध करना चाहिए। इसी में समष्टि का अर्थात जगत् का कल्याण है।
मामनुस्मर युध्य च !
