गीता चिन्तनिका सत्र: द्वितीय पारायण – 27 फरवरी 2022
गीता चिन्तनिका सत्र
द्वितीय पारायण – 27 फरवरी 2022
फरवरी 2022 फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी एवं त्रिस्पर्शा एकादशी के पावन तथा अनूठे संयोग के शुभ अवसर पर गीता चिंतनिका के द्वितीय सत्र के पठन एवं चिंतन में महाराष्ट्र से अनुजा भट्टड़ दीदी ने परम पूज्य गुरुदेव श्री गोविंददेव गिरी जी महाराज की सूक्ष्म उपस्थिति में सभी गीता साधकों और गीता रसिकों का स्वागत किया।
गुरु स्वरूपिणी, मुक्तिदायिनी, मोक्षदायिनी, परम पुनीता, भक्तिदायिनी, शक्तिदायिनी, मातृ रूपिणी भगवद्गीता के श्रवण, पठन, पारायण एवं चिंतन का शुभ अवसर प्राप्त हुआ है।
आत्मा की हार्दिक भावना का नाम है प्रार्थना। दिल के भीतर भरी आग का नाम है प्रार्थना। सत्र का शुभारंभ प्रार्थना से किया गया।
अत्यंत अल्प आयु में ही बाल गीताव्रती बनी बिटिया दिव्या करवा जो 2020 से गीता परिवार से जुड़ी हुई हैं , , के द्वारा मनमोहक एवं मधुर वाणी में प्रार्थना की गयी।
कार्यक्रम की अगली कड़ी में मन का तिमिर हरण करने , ज्ञानाग्नि से कर्म को भस्म करने, ज्ञान का दीप आलोकित करने हेतु गीताव्रती श्री अमोल काबरा जी और उनके परिवार को आमंत्रित किया गया। रोचक एवं श्रेष्ठ बात यह है कि अमोल जी का पूरा परिवार गीताव्रती है । पत्नी श्रीमती नेहा काबरा जी गीता परिवार में ट्रेनर हैं और पुत्र तनय काबरा जी 9 वर्ष की अत्यंत अल्प आयु में ही गीतव्रती हो गए हैं। अमोल काबरा जी सितंबर 2020 से गीता परिवार से जुड़े हैं तथा गीता संथा वर्ग में ट्रेनर, टेक, ग्रुप कोऑर्डिनेटर इत्यादि कई भूमिकायें निभा रहे हैं।
परिवार के सभी सदस्यों के द्वारा घर के बहुत ही सुंदर मंदिर में आरती का आयोजन किया गया।
हम सबके लिए अत्यंत हर्ष का विषय है कि गीता परिवार सफलता की एक और पायदान पर चढ़ने जा रहा है । आज एक विशेष कार्यक्रम होने जा रहा है पाठकों की सुविधा हेतु नई वेबसाइट का लॉन्च होने जा रहा है । अत्यंत कर्मठ कार्यकर्ता, बहुत सारी टीमों को संभालने वाले, सभी का मार्गदर्शन करने वाले, सभी के प्रिय श्री संतोष भैया ने नई वेबसाइट की लॉन्चिंग की प्रक्रिया में बताया कि गीता परिवार के द्वारा सभी की सुविधा हेतु vivechan.learngeeta.com इस नई वेबसाइट का निर्माण किया गया। सभी साधकों की यह इच्छा रहती है कि पुराने विवेचन भी किसी भी पुन: पुन: सुन सकें।
अत: इस नई वेबसाइट पर सभी साप्ताहिक विवेचन
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उपलब्ध हैं। सूची में सबसे ऊपर नवीनतम विवेचन होते हैं। लिंक या गीता की इमेज पर क्लिक करने से विवेचन सुन और देख सकते हैं। अध्यायों की सूची दी गयी है, जिस अध्याय का विवेचन सुनना हो उसका चयन करने पर उस अध्याय के विवेचन को सुना जा सकता है । अध्याय, अध्याय का कोई पार्ट, विवेचक, दिनांक, भाषा एवं टाइटल के आधार पर चयन करने की सुविधा इस वेबसाइट पर उपलब्ध है। पिछले 10, 25, 50 या 100 विवेचन आपको स्क्रीन पर देखने का ऑप्शन है । अंग्रेजी, हिंदी दोनों माध्यम के विवेचन इस वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। विवेचन के अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में पीडीएफ(PDF) भी उपलब्ध हैं। इसप्रकार से संतोष भैया ने वेबसाइट के बारे में विस्तार से समझाया। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि सभी को इस वेबसाइट से बहुत लाभ होगा।
इसके पश्चात अध्याय 13, 14 एवं 15 के शुद्ध पठन हेतु क्रमशः गीताव्रतियों को सादर आमंत्रित किया गया।
अध्याय 13 के पठन के लिए महाराष्ट्र से गीताव्रती श्री कपिल सावांरकर जी को आमंत्रित किया गया, जिन्होंने बहुत ही सुंदर पठन किया।
इसके पश्चात विठ्ठल भगवान की पावन नगरी पंढरपुर महाराष्ट्र से गीताव्रती श्री सुधीर जी जो कि मार्च 2021 से गीता परिवार से जुड़े हैं, आप ट्रेनर भी हैं,ज्येष्ठ साधक भी हैं, आपने अध्याय 14 का पठन किया।
अध्याय 15 के पठन के लिए अनुराधा करवा दीदी को आमंत्रित किया गया जो सितंबर 2022 से गीता परिवार से जुड़ी हैं और गीता परिवार में कई तरह की सेवायें दे रही हैं।
इसके पश्चात अनुजा भट्टड़ दीदी ने तीनों गीताव्रती गीता साधकों को सुंदर तथा सुस्पष्ट गीता पठन के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।
सर्वप्रथम अध्याय 13 के विवेचन के लिए भोपाल से गीताव्रती डॉ. अपर्णा जी, जो कि फरवरी 2021 से गीता परिवार से जुड़ी हुई हैं और अनेक प्रकार की सेवाएँ गीता परिवार को प्रदान कर रही हैं।
अध्याय 13 क्षेत्र क्षेत्रज्ञविभागयोग में भगवान ने सगुण साकार की उपासना का विस्तार से वर्णन किया। इस अध्याय को समझने से सम्पूर्ण धर्मशास्त्र समझ में आता है। यह एक अनुभूति का अध्याय है, जीवन से दुःख को मिटाने के लिए इस अध्याय का अध्ययन, मनन, चिंतन करना चाहिये। यह अध्याय ज्ञानयोग से परिपूर्ण तथा सम्पन्न है।
शरीर क्षेत्र के नाम से पुकारा गया है शरीर को जो जानता है वह क्षेत्रज्ञ है।
प्रकृति, पुरुष, परमात्मा तथा पुरुषोत्तम के संयोग से हमारा शरीर बना
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हमारे अंदर भगवान का अंश है। दुःख देह जन्य होता है। आनंद में दुःखों की अनुभूति नहीं होती है। इस जीवन में अच्छे कर्म किये गए तो अच्छा जन्म प्राप्त होता है।शरीर प्रकृति से प्राप्त है, आत्मा उस पुरुष से प्राप्त है। दोनों के संयोग से हम इस जीवन में आये हैं। किसी भी प्राणी को किसी भी प्रकार से नहीं सताना चाहिये।
ज्ञानचक्षु से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को देखने वाला परमात्मा को प्राप्त होता है। अंत में अनुजा भट्टड़ दीदी अपर्णा दीदी का धन्यवाद ज्ञापित किया।
चौदहवें अध्याय के विवेचन के लिए कोटा राजस्थान से गीताव्रती मनीषा गांधी जी, जो 2021 से गीता परिवार से जुड़ी हैं और गायन एवं लेखन में विशेष रुचि रखती हैं को आमंत्रित किया गया।
इस अध्याय में भगवान कहते हैं कि बंधन दो प्रकार से होता है प्रकृति से और प्रकृति के कार्य गुणों से। प्रकृति के बंधन से छूटने के लिए भगवान ने 13वें अध्याय में बता दिया था। प्रकृति के कार्य गुणों के बंधन से छूटने के लिए भगवान ने इस अध्याय में बताया कि उत्तम और श्रेष्ठ ज्ञान को जानकर बड़े बड़े मुनियों ने संसार से मुक्ति प्राप्त की है और परमात्मा को प्राप्त हुए हैं। इस ज्ञान का आश्रय करके परमात्मा से साधर्मता को प्राप्त होकर महासर्ग में पैदा नहीं होते और महाप्रलय में व्याकुल नहीं होते हैं क्योंकि उनकी दृष्टि में मुझ वासुदेव से भिन्न कोई वस्तु है ही नहीं, परमात्मा के सिवाय संसार में इस से बढ़कर कोई व्यापक तत्व नहीं है। मूल प्रकृति को यहाँ महद्ब्रह्म कहा गया है।
भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन! सत्व, रज और तमोगुण, ये प्रकृति से उत्पन्न हुए तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं। सत्वगुण से सुख और ज्ञान होने पर साधक को यह सावधानी रखनी चाहिये कि ये सुख और ज्ञान मेरे लक्ष्य और भाग्य नहीं है। ये तो लक्ष्य की प्राप्ति के कारण हैं।
रजोगुण तृष्णा और आसक्ति पैदा करते हैं जिससे जीवात्मा बँधता है।
तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है जो प्रमाद ,आलस्य और निद्रा के द्वारा देह के साथ संबंध मानने वालों को बाँधता है।
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मृत्यु के समय सत्व गुण अधिक हों तो वह निर्मल लोक में, रजोगुण अधिक हों तो मनुष्य योनि में और तमोगुण अधिक होने पर मूढ़ योनि में जन्म लेता है। सत्व कर्म का फल शुभ निर्मल, रजो कर्म का फल दुःख और तमोगुण का फल अज्ञान कहा गया है।
जो मनुष्य सुख-दुःख में सम, मिट्टी के ढ़ेले और सोने में सम, निंदा स्तुति में सम, मान अपमान मैं सम और मित्र शत्रु के पक्ष में सम रहता है उसे गुणातीत कहा गया है।
भगवान की सगुण उपासना करने से ज्ञान योग, कर्मयोग और ध्यानयोग तीनों सिद्ध हो जाते हैं। भगवान कहते हैं कि शाश्वत धर्म का और एकांतिक सुख का आश्रय मैं ही हूँ।
15वें अध्याय के विवेचन के लिए मुम्बई से श्री द्वारका प्रसाद जी गग्गढ़ को आमंत्रित किया गया।
उन्होंने बताया कि गीता में जीवन के सिद्धांत जो अब तक बताए हैं उनकी पूर्णता अध्याय 15 से होती है।
इस अध्याय में समस्त वेदों का सार है, इसलिये इस अध्याय को पुरुषोत्तम योग नाम से जाना जाता है। इस अध्याय में संसार को विशाल वृक्ष बताया गया है जिसमें ऊपर की ओर मूल जो ईश्वरीय ऊर्जा से पोषित हैं तथा नीचे की ओर त्रिगुणों से पोषित इसकी अनंत शाखाएं हैं।
एक संसार रूपी वृक्ष अविनाशी है और दूसरा इससे भी परे परम अविनाशी है। वेद इस अविनाशी संसार रूपी वृक्ष के पत्ते कहे गए हैं। जिसने इस संसार रूपी वृक्ष को जान लिया, समझो उसने वेद को जान लिया है। इस संसार रूप अश्वत्थ वृक्ष को दृढ़ असंगत रूप शस्त्र के द्वारा काटकर ही परम पद परमेश्वर को खोज पाएंगे।
समर्पण से जिनकी मोह ममता नष्ट हो गई है, जो कामना से रहित हो गए हैं। जो सुख दुःख आदि द्वंद्वों से मुक्त हो गए हैं ऐसे साधक अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं। ऐसी अवस्था आने पर ही संसार रूपी वृक्ष कटता है और वह लौटकर संसार में नहीं आते हैं वही मेरा परमधाम है। इस संसार में जीव मेरा ही अंश है वह प्रकृति में स्थित मन और पांचों इंद्रियों को आकर्षित करता है। जिस प्रकार वायु गंध के स्थान से गंध को ले जाती है उसी प्रकार जीवात्मा भी जिस शरीर को छोड़कर जाता है वहाँ से मन और पाँचों इंद्रियों के साथ अपने शरीर में स्थित होकर यह जीवात्मा आँख, कान, नाक त्वचा, जिव्हा और मन का आश्रय लेकर विषयों का सेवन करता रहता है।
भगवान कहते हैं कि मैं क्षर से अतीत हूँ और अक्षर से भी उत्तम हूँ, इसलिए पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ। जो मोहरहित मनुष्य मुझे पुरूषोत्तम जानता है वह सब प्रकार से मेरा ही भजन करता है।
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इसके पश्चात अनुजा दीदी ने सभी के धन्यवाद ज्ञापन के लिए बीकानेर, राजस्थान से श्री सुरेश व्यास भैया जो आरंभ से ही गीता परिवार से जुड़े हुए हैं, उन्हें आमंत्रित किया। विगत कई वर्षों से प्रमुख तकनीकी सहायक के रूप में हर टीम से जुड़े हुए हैं। श्री सुरेश व्यास भैया ने परमपिता परमेश्वर एवं पूज्य स्वामी गोविंददेव गिरि जी महाराज की सूक्ष्म उपस्थिति में तथा राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष श्री संजय भैया और उपाध्यक्ष श्री आशू भैया जिनके मन मस्तिष्क में यह जुनून सवार है कि विश्व के कोने-कोने में श्रीमद्भगवद्गीता को पहुँचाया जाए आपकी उपस्थिति से ही गीता परिवार बहुत आगे बढ़ पाया है, धन्यवाद दिया।
उन्होंने हरिनारायण जी व्यास, निर्मला जी , कविता मानधने जी का भी धन्यवाद ज्ञापित किया। गीताव्रती श्री कपिल जी, श्री सुधीर जी, श्री अनुराधा जी जिन्होंने क्रमशः अध्याय 13, 14 एवं 15 का गीता परायण बहुत ही स्पष्ट शब्दों में किया उन्हें भी धन्यवाद ज्ञापित किया।
गीता विवेचन के लिए अध्याय 13, 14 एवं 15 के लिए क्रमशः अपर्णा जी मनीषा जी एवं श्री द्वारका प्रसाद जी गग्गढ़ का भी धन्यवाद ज्ञापित किया गया इन्होंने बहुत ही सुंदर विवेचन तीनों अध्यायों का किया।
समापन प्रार्थना हेतु कोलकाता से स्वाति बजाज दीदी जो अक्टूबर 2020 से गीता परिवार से जुड़ी हुई है उनको भी अग्रिम धन्यवाद दिया गया कृष्णरूपी साधकों का भी धन्यवाद जिन्होंने विवेचन को बहुत ही ढंग से सुना और आशा है कि वे इसे जीवन में लाएंगे और सभी तकनीकी सहायकों का जो पर्दे के पीछे रहकर काम करते हैं और उनके बिना यह विवेचन सत्र नामुमकिन था उन्हें भी बहुत-बहुत धन्यवाद दिया।
गीता जी हमारे मन के आंतरिक युद्ध में विजयी होने के लिए तैयार करती हैं और हमें आत्मानुशासन आत्मउन्नति का सोपान बद्ध उपाय बताती हैं। इस प्रकार से 13, 14 एवं 15वें अध्याय के चिंतनिका सत्र का समापन हुआ।
अन्य गीता चिन्तनिका सत्रों की सूची जिनमे साधकों के द्वारा श्लोक उच्चारण एवं चिंतन किया गया -
| सत्र | अध्याय | दिनांक | लिंक |
|---|---|---|---|
| गीता चिन्तनिका सत्र | - 16,17,18वाँ | -14/03/22 | https://youtu.be/CY_fZMOBFp8 |
| गीता चिन्तनिका सत्र | - 1, 2, 3वाँ अध्याय | - 28/03/22 | https://youtu.be/8GVbtY2LtL0 |
| गीता चिन्तनिका सत्र | - 4, 5, 6वाँ अध्याय | - 13/04/22 | https://youtu.be/rL8G8Ms1N3I |
| गीता चिन्तनिका सत्र | - 7, 8, 9वाँ अध्याय | - 27/04/22 | https://youtu.be/OHr4s08PT_4 |
| गीता चिन्तनिका सत्र | - 10, 11, 12वाँ अध्याय | - 12/05/22 | https://youtu.be/CQOwrJeOsEE |
| गीता चिन्तनिका सत्र | - 13, 14, 15वाँ अध्याय | - 26/05/22 | https://youtu.be/QavMZAF3dgs |
| गीता चिन्तनिका सत्र | - 16, 17, 18वाँ अध्याय | - 11/06/22 | https://youtu.be/HJnUb1y9-e4 |
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