सनातन ज्ञान
प.पू स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज
संस्थापक अध्सक्ष गीता परिवार
कोषाध्यक्ष रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास
कभी कभी हमारे मन मे आ सकता है कि ज्ञान का निरंतर विकास होता जा रहा है और हम कैसे अनाड़ी लोग हैं जो पाँच हजार पुराने एक छोटे से ग्रंथ का पुनः पुनः अध्ययन एवं श्रवण कर रहे हैं। 'Advancement of Knowledge' का वेग आज बढ़ता जा रहा है। तो इस परिस्थिति में ऐसा प्रश्न आना स्वाभाविक है कि इतने पुरातन ग्रंथ को हम क्यों पढ़ रहे हैं।
मित्रों! हमे आज यह बात समझनी है कि यह ज्ञान पांच हज़ार वर्ष पुराना हो गया है ऐसा हमे लगता है किंतु भगवान ने तो कहा है-
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।4.1।।
यह ज्ञान भगवान ने इससे पहले सूर्य से कहा था वही ज्ञान अर्जुन को बोला। कहने का तात्पर्य यह है कि यह ज्ञान न नूतन है ना पुरातन किन्तु यह सनातन है। यह ज्ञान सदा से इसीप्रकार है और जितना आवश्यक यह हमारे लिए हज़ार वर्ष पूर्व था उतना ही महत्वपूर्ण यह आज है एवं इतना ही महत्वपूर्ण हज़ार वर्षों बाद भी रहेगा। यह ज्ञान सनातन है अतः पुनः पुनः इसकी आवृत्ति करनी ही चाहिए एवं इसे आत्मसात् करने का प्रयास भी करते रहना चाहिये। जिस प्रकार यह गीता शास्त्र सनातन है उसी प्रकार शंकराचार्य जी कहते हैं यह ऐतिहासिक अर्जुन भी केवल निमित्त है गीता का उपदेश तो सनातन अर्जुन हेतु किया गया है। इतिहास में पुनः पुनः ऐसे अर्जुन निर्माण होते रहते हैं। भगवद्गीता को माँ कहा गया है।
'अम्ब त्वामनुसन्दधामि भगवद्गीते भावद्वेषिणीम्।'
अर्जुन दु:खी हैं, उन्हें अकल्पित वैराग्य उत्पन्न हुआ है। यह वैराग्य हमे भी आता है जिसके कारण कर्तव्य का त्याग होता है, ऐसी हर स्थिति में मनुष्य हेतु अति सहायक यदि कुछ है तो वह भगवद्वाणी यह भगवद्गीता है। बालक रोता है, गिरता है, भूखा प्यासा हो जाता है तो जिस प्रकार माँ दौड़कर आती है उसीप्रकार जब शक्ति की भूख लगे, जब योग्य निर्णय की प्यास लगे, जब दुःखों के कारण अवसादग्रस्त अंत:करण हो जाये और लोगों के सामने अथवा एकांत में बैठकर बस रोने का मन करे उस समय ये गीता माता दौड़कर आती हैं, इसलिए भगवद्गीता को 'माँ' कहते हैं। भगवद्गीता का उपदेश साधारण बात नही है क्योंकि अर्जुन की स्थिति अत्यन्त गंभीर है अतः भगवान तात्कालिक उपाय नही करते हैं बल्कि ऐसा उपदेश करते हैं जो न केवल उस ऐतिहासिक अर्जुन की स्थिति सुधारे किन्तु सनातन अर्जुन में यह अवसाद उत्पन्न ही न हो पाये। इसलिये यह हमारा पाथेय है।
