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गीता मैत्री अंक ३जनवरी से जून २०२२
०३संपादकीय

सम्पादकीय

क्या है गीता मैत्री ? एक पत्रिका ? एक पुस्तक ? गीता परिवार के कार्यक्रम लर्नगीता का लेखा-जोखा या हमारी उपलब्धियों की प्रतिकृति? इसमें हमारे गणमान्यों के संदेश-उपदेश हैं, कुछ भाग्यशालियों के छाया चित्र भी हैं। यह सब तो है ही परन्तु गीता मैत्री के स्वरुप किन्तु जब मन को टटोलता हूँ तो इतने से संतोष नहीं होता। अंतर्मन से एक ध्वनि स्पंदित होती है कि गीता मैत्री इससे अधिक कुछ और भी है और यह स्पंदन सदा ही प्रवाहित होते रहते हैं। बहुत चिंतन के बाद प. पू. स्वामीजी के स्मरण के साथ ही ध्यान में आता है कि गीता मैत्री इन सबसे अलग भी एक बहुत बड़ा संदेश है।

एक सज्जन ने पूछा – 'गीता मैत्री क्या है?' मैंने पूछा – 'क्या आपकी गीता से मैत्री है?' उन्होंने कहा – 'हाँ, गीता तो मेरे जीवन का अंग बन गयी है।' तो मैंने कहा कि आपकी गीता से मैत्री है तो मेरी भी आपसे मैत्री है क्यूँकि मित्र का मित्र हमारे मित्र के समान ही होता है। और गीता मैत्री गीता मित्रों का समूह है, पूरे विश्व के अलग अलग भागों से, अलग अलग भाषा-संस्कृति के गीताप्रेमियों का समूह।

अब हम पूरे विश्व से नगर-नगर, गाँव - गाँव इन मित्रों को एकत्र कर रहे हैं और गीता मैत्री मिलन कर रहे हैं, गीता मैत्री मिलन उत्सव मनाये जा रहे हैं जिसका विवरण इस तृतीय संस्करण में भी दिया जा रहा है। आज मैं देश के किसी भी कोने में जाता हूँ तो प्राय: अनायास ही गीता साधकों से भेंट हो जाती है, जब हमे पता चलता है कि वह भी लर्नगीता कार्यक्रम के अंतर्गत किसी स्तर में गीता सीख रहें हैं तो मन प्रफुल्लित हो उठता है, आँखें प्रेमाश्रुओं से पूरित हो जाती हैं उस व्यक्ति के लिए ऐसा लगता ही नहीं है कि हम पहली बार मिल रहे हैं।

कहा गया है - ‘मित्र दर्शनेन आह्लाद: वर्धते’ अर्थात मित्र के दर्शन से आनन्द का वर्धन होता है और यह बात हम सभी के द्वारा अनुभव की गयी है। जब हम किसी भी गीता साधक से मिलते हैं तो हृदय की किसी निचली सतह से आनन्द की एक नयी लहर उत्पन्न हो जाती है और आनन्द की यह लहर ही साक्षी हमारी गीता मैत्री की ! और निरंतर उपन्न होने वाली आनन्द की ये लहरें ही साक्षी है हमारे गीता प्रचार की!

'गीता पढ़ें, पढ़ायें, जीवन में लायें', 'हर घर गीता, हर कर गीता' इस प्रकार के ध्येय वाक्य हमे प. पू. स्वामीजी के द्वारा दिये गये हैं, अब हमे गीतामय जीवन जीते हुए अधिकाधिक लोगों तक गीता को पहुँचाना है एवं जिस प्रकार भगवान ने कहा है - "गीता मे हृदयं पार्थ" अर्थात हे पार्थ! गीता मेरा हृदय है, उसी प्रकार हमे भी अपना मानस बनाना है एवं हमारी गीता मैत्री इसी प्रकार बनी रहे ऐसी प्रार्थना है।

यह संस्करण सभी पाठकों को आनन्द प्रदान करेगा, इसी आशा के साथ..

जय श्री कृष्ण...

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