GEETA MAITRI MILAN, SINGAPORE
with Pujya Swami Ji - 27th Nov 2023
मुख्य संयोजक श्री कमलजी मालवीय ने श्रद्धेय परम पूज्य स्वामी श्री गोविन्ददेव गिरिजी के सम्मान और वंदन के साथ गीता मैत्री मिलन सिंगापुर का शुभारंभ किया। इस अवसर पर ऑनलाइन जुड़े अन्तर्राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष आदरणीय डॉ. आशूजी गोयल का भी स्वागत किया गया। तत्पश्चात् श्री सोमणजी, हनुमानजी, गीता परिवार सिंगापुर के कोषाध्यक्ष और ऑफलाइन गीताजी का नियोजन करने वाले गीता परिवार के कोषाध्यक्ष श्री सिद्धार्थजी हवेलिया ने ऑफलाइन और ऑनलाइन कार्यक्रमों से जुड़े सभी गीता प्रेमियों का अभिनंदन और स्वागत किया।
दीपकजी ने श्री सिद्धार्थजी का परिचय देकर उन्हें गणमान्य सदस्यों का परिचय देने का कार्य सौंपा।
तत्पश्चात् श्रद्धेय स्वामीजी, गीता परिवार के अन्तर्राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष श्री आशूजी गोयल, राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष श्री संजय जी मालपाणी, रूपलजी शुक्ला और कविताजी वर्मा का परिचय दिया। प्रार्थना के पश्चात् सिद्धार्थजी ने गीता परिवार की कार्यप्रणाली से सभी को अवगत कराया।
गीता परिवार की स्थापना आज से 37 वर्ष पूर्व, सन् 1986 में, परम श्रद्धेय स्वामी गोविन्ददेव गिरिजी महाराज की देखरेख में हुई। स्वामीजी का तभी से अपना एक मिशन वाक्य है “गीता पढ़ें, पढ़ायें, जीवन में लायें”। स्वामीजी के जीवन का मूल मंत्र है “हर घर गीता, हर कर गीता”।
गीता परिवार की स्थापना पंच सूत्रों पर आधारित है - भगवद्भक्ति, भगवद्गीता, भारतमाता, विज्ञानदृष्टि, स्वामी विवेकानन्द
गत 37 वर्षों से ऑफलाइन कार्य होते आ रहे हैं। सन् 2020 से कोरोना की आपदा आने के पश्चात् ऑनलाइन कार्यक्रम हो रहे हैं।
ऑनलाइन लर्न गीता कार्यक्रम के अंतर्गत 181 देशों से 8 लाख से अधिक साधक 2000 ज़ूम कक्षाओं में 13 भाषाओं में 19 समय सत्रों पर 8000 गीता सेवियों की सहायता से गीताजी के श्लोकों के शुद्ध उच्चारण सीखने हेतु कार्यरत हैं। सौ से अधिक पुस्तक प्रकाशन व दस भाषाओं में सरल पठनीय गीता उपलब्ध है। इस प्रकार गीताजी की गूंज सारे विश्व में व्याप्त है।
उपलब्धियां :
- 75 करोड़ सूर्य नमस्कारों का समावेश गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में है।
- 35,000 बालकों द्वारा गीता महोत्सव का आयोजन।
- 12,500 बालकों द्वारा योग महोत्सव का आयोजन।
- विश्व की सबसे बड़ी ऑनलाइन गीता संथा वर्ग का पंजीकरण (गिनीज गोल्डन बुक ऑफ रिकॉर्ड्स) में समावेशित है।
- प्रधानमंत्री जी द्वारा लर्नगीता उपक्रम की सराहना।
अचंभित कर देने वाला महान् कार्य चालू है। श्री सत्यनारायण शर्मा जी ने श्रद्धेय स्वामी श्री गोविन्ददेव गिरिजी को प्रवचन के लिए आमंत्रित किया और कहा, “स्वामीजी की उपलब्धियों पर इतनी जोरदार तालियां बजाएँ कि उनकी गूंज अयोध्या धाम तक पहुँचे।” मुख्याध्यापक के पद से सेवानिवृत्त होने के पश्चात्, श्री सत्यनारायण जी ने जो गीता जिज्ञासु परीक्षा दी उसका प्रमाणपत्र स्वामीजी के हाथों प्राप्त किया।
“पंढरीनाथ भगवान की जय!” के उद्घोष के साथ, स्वामीजी ने अपना वक्तव्य शुरू किया।
World Hindu Congress के लिए बैंकॉक आना था, और जब आना ही था तो हिन्दु संस्कृति के प्राचीनतम और सर्वोच्च प्रतीक के रूप में खड़े अंकोरवाट मंदिर के दर्शन की लालसा थी। कंबोडिया जाना था, थाईलैंड से कंबोडिया पास है, लेकिन सिंगापुर का आकर्षण सिंगापुर खींच लाया। सिंगापुर में गीता परिवार का कार्य अति उत्तम चल रहा है। स्वामीजी की विनम्रता देखिए, वे बोले, “मुझे दर्शन देने के लिए आए हुए सभी साधकों का मैं स्वागत करता हूँ।”
भगवद्गीता का मुख्य स्वर मैत्री का है। शांत, लालन, सख्य, माधुर्य, दास्य और वात्सल्य भाव का है। सभी भावों से जब गीता की ओर देखते हैं तो सख्य भाव की प्रधानता दिखाई देती है। भगवान अर्जुन को सखा मानते हैं, अर्जुन भी कृष्ण को सखा ही मानते हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, सख्य भाव की अनुभूति अधिक है।
अर्जुन भगवान से बोले:
‘सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं, हे कृष्ण हे यादव हे सखेति। अजानता महिमानं तवेदं, मया प्रमादात्प्रणयेन वापि’॥11/41॥
उत्तर में भगवान अर्जुन से क्या कहते हैं, सुनिये:
‘स एवायं मया तेद्य, योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तोऽसि मे सखा चेति, रहस्यं ह्येतदुत्तमम्’ ॥4/3॥
अर्जुन तुम मेरे भक्त हो, सखा हो, मित्र हो।
कृष्णार्जुन संवाद यह मित्रों का संवाद है। गीता के अनेक भाष्य हुए, उसमें ज्ञानेश्वर महाराज का भाष्य सर्वोपरि है।
ज्ञानेश्वर महाराज श्रीमुख से क्या कहते हैं: “अरे पता है, मैं तो निराकार हूँ, पर फिर भी मैं साकार क्यों बन गया हूँ? क्योंकि जो मुझसे इतना प्रेम करते हैं, उनके दर्शन करना चाहता था।”
अब दर्शन के लिए नेत्रों की आवश्यकता होती है, तो ज्ञानेश्वर महाराज की भाषा में भगवान कहते हैं:
तो पहावा हे डोहाळे, म्हणोनि अचक्षुशी मज डोळे। हातीचेनी लीलाकमळे, पुजूं त्याचे॥12.223॥
माताओं को गर्भावस्था में कुछ खाने, कुछ पहनने की तीव्र इच्छा होती है, जिसे मराठी में डोहाळे कहते हैं। भगवान कहते हैं, “मुझे अपने भक्तों के दर्शन की तीव्र इच्छा होती है। मन में इतना आवेग आता है कि कब अपने भक्त के मस्तक पर अपने हाथों से कमल का फूल चढ़ाकर पूजा करूं। यह है भगवान् के द्वारा भक्त की पूजा।” भगवद्गीता, रामचरितमानस, श्रीमद्भागवत—इन सभी ग्रंथों का स्वर एक ही है।
स्वामीजी ने भक्ति के तीन प्रकार बताए हैं:
- पहली जो भक्त भगवान की करते हैं।
- दूसरी जो भक्त अपने गुरुदेव की करते हैं।
- तीसरी जो भगवान भक्तों की करते हैं।
इसलिये मैं सीधा कंबोडिया नहीं गया और आप लोगो के दर्शन करने पहले सिंगापुर आ गया। थोड़ा प्रवास ज्यादा करना पड़ा, परन्तु प्रिय लोगों के लिए इतना कष्ट कोई विशेष बात नहीं। आप सभी सिंगापुरवासियों का स्वागत और बधाई कि आप गीता परिवार से जुड़े हुए हैं। एक बात याद रखना मित्रों कि गीता परिवार का काम भगवान का निजी कार्य है। भगवान दिव्य देशों में अनेक स्थानों पर विराजे हैं। स्थान में भगवान का अत्यंत आसक्ती का भाव होता है। कार्य में कौन सा कार्य भगवान को सबसे अच्छा लगता है? जब यह सोचते हैं तो भगवान कहते हैं, “गीता मे हृदयं पार्थ”। अर्जुन, गीता मेरा हृदय है, बाकी सब काम मेरे अन्यान्य अवयव हैं। इसलिए जो गीता पढ़ता है, वह मुझे अत्यंत प्यारा है।
भगवान की पूजा करना चाहिये, भगवान के लिए गीत गाना चाहिये, उसे सजाना चाहिये, सुलाना चाहिये, जगाना चाहिये। ये सब भगवान को अच्छा लगता है, इससे भगवान की सेवा होती है। लेकिन मुझे वह सबसे प्रिय है जो गीता को हाथों में लेकर पढ़ता है। गीता का अध्ययन करने वाला मुझे ज्ञानयज्ञ से पूजित करता है।
पूरी गीता कहने के पश्चात् भगवान ने अर्जुन से कहा, “मैं उससे बहुत प्रेम करता हूं जो गीता पढ़ता है।” भगवान किस किससे प्रेम रते हैं, यह उन्होंने बारहवें अध्याय में बताया है।
अद्वेष्टा सर्व भूतानां, मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः, समदुःखसुखः क्षमी।
अठारहवें अध्याय में आकर भगवान ने कहा, “जो सद्गुणों का अभ्यास करते हैं, आरती करते हैं, तिलक लगाते हैं, वे तो मुझे प्रिय हैं ही, परंतु जो गीता पढ़ते व पढ़ाते हैं, वे मुझे अत्यंत प्रिय हैं। वर्तमान में तो मैं प्रेम करता ही हूं, लेकिन भविष्य में भी मैं किसी से इतना प्रेम नहीं करूंगा जितना गीता पढ़ने व पढ़ाने वालों से करूंगा।”
भगवान् अर्जुन से कहते हैं, “अपना कार्य करना मत छोड़ो। कोई व्यापार करता है, कोई अध्यापन करता है, कोई सैनिक है, कोई राजनेता है, कोई परमार्थ करता है। परमार्थ समय साध्य वस्तु नहीं, वरन् वृत्ति साध्य है। सभी अपना काम प्रामाणिकता से करो, लेकिन मुझे मत भूलो।
किसी भी गोपी ने अपना काम नहीं छोड़ा। वह काम करती रही, कृष्ण मथुरा गए, लेकिन एक भी गोपी ने अपना घर नहीं त्यागा। नारदजी ने कहा, ‘भक्त की भक्ति कैसी हो? यथा व्रज गोपिका जो यह कहती रहीं’, 'मैं कृष्ण की हूँ, कृष्ण को याद करती हूँ' अपना काम करते समय यह भावना रखती है कि यह काम मैं कृष्ण के लिए कर रही हूँ। बिलोना करती हैं तो कृष्ण के लिए, सोचती हैं, कृष्ण आएंगे, माखन खाएंगे। रसोई बनाती हैं तो कृष्ण के लिए, कि कृष्ण आएंगे, कहेंगे 'क्या बनाया है? भूख लगी है। सजती हैं तो कृष्ण के लिए, कि कृष्ण प्रसन्न होंगे, कहेंगे, कितनी सुंदर लग रही हो। गोपियों का बिलौना करना, गोपियों का रसोई बनाना, गोपियों का सजना सब कृष्ण के लिए। कार्य अपना करती हैं, याद भगवान को करती हैं।
अर्जुन, अध्यापन, राजनीति, व्यापार, सारे जो भी काम करो, कर्तव्य समझकर भगवान के लिए करो।
जीव भगवान का है और शरीर संसार का। शरीर से करना संसार का काम और मन से करना भगवान को याद, तो जीवन आनंद से चलेगा।
मेरी भक्ति करने वालों का नाश नहीं होगा। संकट नहीं आएगा ऐसा नहीं, लेकिन उस संकट से मैं तुम्हें उबारूंगा। मैं तुम्हें खड़ा करूंगा, यह भगवान का वचन है।
ये सारे छोटे-छोटे चरण बहुत महत्वपूर्ण हैं, ये तीन बातें भगवान ने कहीं। आत्मज्ञान कैसे प्राप्त करें?
उत्तम महापुरुष का चयन करें। स्वयं स्वामीजी ने अपने जीवन में तीन महापुरुषों का चयन किया:
1. पूज्य करपात्री महाराज
2. पूज्य राजेश्वर शास्त्री द्रविड
3. पूज्य गोपीनाथ जी कविराज
ऐसे महापुरुष अगली पीढ़ी को देखने नहीं मिलेंगे। आपका व्यवहार अत्यंत विनम्रता का होना चाहिए। एक पुलिस कमिश्नर ने किसी महात्मा का वाक्य सुना, "रोज माता-पिता को प्रणाम करना चाहिए।" उसने सुना, उसे अच्छा लगा तो वह माता-पिता से जोर से बोला,
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"कल से जब मैं ड्रेस पहनकर तैयार होकर निकलूं तो दरवाजे पर खड़े रहना, मैं आपको प्रणाम कर जाने वाला हूं।"
"जीवन का उद्देश्य आनंदपूर्वक जीना है।"
जीवन में आनंद का ही अनुभव करें। भगवान गीता को जीवन का आनंद कहते हैं। क्षणिक आनंद आपके सामने बहुत हैं, वह क्षणभंगुर हैं। जिसने मेरी भक्ति सीख ली, वह परम आनंद उठाते हैं।
भगवान अर्जुन से कहते हैं, "जिनके चित्त में मैं बस गया हूं, वे लोग सही रूप में जीवन का आनंद उठाते हैं।"
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥ 10/9॥
यह आनंद क्या होता है? जो इसे लेते हैं, उन्हें पता है। हम लोग हमारे उत्सव, हमारे फंक्शन मनाते हैं, बाहर से वाहवाही मिलती है, लेकिन अंदर से तनाव देते हैं। आनंद के लिए किया गया काम कभी-कभी कष्टदायी होता है। उसकी रिएक्शन होती है, यह short lived होता है। Percy B Shelley ने कहा,
"Our sweetest songs are those, that tell us of saddest thought."
प्रत्येक विषय का अपना स्थान होना चाहिये। ठाकुरजी मंदिर में हों, भोजन रसोईघर में ही बने, जूते जूते की जगह ही हों, हर वस्तु अपनी निर्धारित जगह पर ही हो। वैसे ही काम, क्रोध, मद, मत्सर कितना व कहां होना चाहिए, यह हमें भगवद्गीता सिखाती है।
"Life is not mathematical, it's chemical.”
जीवन की chemistry भगवद्गीता सिखाती है।
Life is for perpetual enjoyment.
विश्व आनंद का आविष्कार है। हमने आज तक क्षणिक आनंद को ही सर्वोच्च माना है।
पूरी गीता याद करें, क्रम से करें। न हो तो छोटा टुकड़ा करें, लेकिन समय नहीं है, आयु हो गई है, ऐसा न कहें। एक छोटा सा निर्णायक चरण भी आपका उद्धार करेगा। भगवान् गीता में कहते हैं, "बड़े-बड़े भय का नाश होता है, मनुष्य निरंतर आगे बढ़ता जाता है, इसलिए गीता पढ़ना-पढ़ाना।"
पढ़ने से confidence नहीं आता, जब दूसरों को पढ़ाते हैं, अपना ज्ञान पक्का होता है। दूसरों को ज्ञानी बनाने के लिए पढ़ाना, अपना ज्ञान पक्का करने के लिए पढ़ाना, क्योंकि गीता साक्षात् भगवान् की वाणी है। गीता परिवार ऐसा अद्भुत परिवार है, जहाँ न पढ़ाने वाला कुछ चाहता है, न पढ़ने वाला कुछ देता है।
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सेवा करने वाले आठ हजार लोग रोज एक घंटा देते हैं, यह सामान्य बात नहीं है। एक विशेष निर्धारित समय देना होता है। यह गीता का महान ज्ञानयज्ञ वास्तव में हमारे जीवन को अलौकिक, प्रकाशित और सुगंध से भरने वाला है। गीता परिवार ने जिस तरह से गीता पढ़ने और पढ़ाने की व्यवस्था की है, वह अद्भुत है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि, जिस प्रकार से गीता परिवार ने संस्कृत की गीता पुस्तक प्रकाशित की है, संसार में ऐसा कोई नहीं जिसने ऐसा काम किया हो। न भूतकाल में, न वर्तमान में, इतनी सुंदर गीता की पुस्तक किसी ने नहीं लिखी।
हम गीता पढ़ाने के आग्रही हैं। संस्कृत की मूल गीता आवश्यक है। उसका अनुवाद समझने और जानने के लिए किया जा सकता है, लेकिन कंठस्थ करना है तो संस्कृत में ही करना होगा। गायत्री मंत्र का अनुवाद नहीं हो सकता, संस्कृत मूल भाषा में ही उसका महत्व है। भगवद्गीता में भगवान् ने जो कहा है, वैसी उत्तम बात आज तक किसी ने नहीं कही। मनुष्य के रूप में जन्मे हुए प्रत्येक व्यक्ति को गीता का एक अध्याय रोज पढ़ना चाहिए। गीता पढ़ लो तो बाकी कुछ भी पढ़ने की आवश्यकता नहीं है।
सिंगापुर के मैत्री मिलन में आकर मुझे बहुत आनंद हुआ। सभी को धन्यवाद और आशीर्वाद के साथ स्वामीजी का वक्तव्य समाप्त हुआ।
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