GEETA MAITRI MILAN, THAILAND
परम पूज्य स्वामी श्री गोविंददेव गिरि जी महाराज जी को शत्-शत् नमन। थाईलैंड के गीतामयी यात्रा में अत्यंत ही आनंद की अनुभूति हुई।
with Pujya Swami Ji & Dr. Ashu Ji Goyal - 26th Nov 2023
सभी गीता परिवार के सदस्य उत्साह और अनंत आनंद से प्रफुल्ललित थे। जोरदार तैयारी के साथ गीता परिवार के गीता परिवार के अन्तरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष आशू भैया जी गोयल का स्वागत शंखनाद व पुष्प माला पहनाकर किया गया। गीता जी का पूजन सभी महानुभावों गीता परिवार के कोषाध्यक्ष श्री सिद्धार्थ जी हवेलिया, थाईलैंड के प्रसिद्ध उद्योगपति श्री सुनील कोठारी जी, स्वामी विवेकानन्द कल्चरल सेंटर के डायरेक्टर श्री चैतन्य प्रकाश योगी जी व स्वयं आदरणीय आशू भैया जी द्वारा संपन्न हुआ। गीता जी का 12वाँ अध्याय भक्तियोग का पठन सभी बाल गोपालों द्वारा किया गया। यह अत्यंत गौरव का विषय है कि गीता परिवार का संरक्षण थाईलैंड में भी हो रहा हैं। दीप प्रज्ज्वलन में सभी अतिथिगण उपस्थित थे। इस तरह तेजस्वी दीप सुशोभित किया गया। गीता परिवार के अध्यक्ष व संस्थापक, श्री राम जन्मभूमि अयोध्या के कोषाध्यक्ष परम पूज्य स्वामी गोविंद गिरि जी महाराज के पावन चरणों में शत्-शत् नंदन करते हुए थाईलैंड का गीता मैत्री मिलन समारोह आरंभ किया गया। गीता जी जो स्वयं श्री भगवान पद्मनाभ (विष्णु जी) के मुखारविंद से प्रकट हुई है, ऐसे गीता जी को भाव सहित आत्मसात् करना हमारा मुख्य कर्तव्य है। ऐसे अद्भुत गीता माता को सभी ने प्रणाम किया व गीता मैत्री मिलन हेतु भारत से पधारे गीता परिवार के अन्तर्राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष, 180 देश से अधिक देशों में ऑनलाइन गीता संस्था वर्गों में गीता कक्षाएँ संचालित कर रहे व सभी देशों से लगभग 8,00,000 साधकों के प्रिय, हमारे सबके मार्गदर्शक, श्रीमान आदरणीय आशू भैया जी गोयल का थाईलैंड देश की भूमि पर हर्षोल्लास के साथ स्वागत किया गया। गीता परिवार के कोषाध्यक्ष आदरणीय सिद्धार्थ हवेलिया भैया का भी स्वागत किया गया। व्यवसाय, भजन, समाज कल्याण कार्य में निरंतर कार्यरत् आदरणीय सुशील कोठारी जी का भी स्वागत किया गया। स्वामी विवेकानंद कल्चरल सेंटर एम्बैसी ऑफ़ इण्डिया चैतन्य प्रकाश योगी जी का भी हृदय से स्वागत किया गया। आप भारतीय संस्कृति के समृद्ध विरासत को प्रदर्शित करते हैं एवं भारत में थाईलैंड के लोगों को बहुस्तरीय आदान-प्रदान को बढ़ावा देने का भी कर रहे हैं। मानवाधिकार, कर्मठ कार्यकर्ता, कश्मीरी नेता सुशील पंडित जी का भी स्वागत किया गया। थाईलैंड की विभिन्न संस्थाओं के सभी अध्यक्षों का भी स्वागत किया गया। आज का
दिन गीता परिवार थाईलैंड के लिए दीपावली के समान है। गीता परिवार के सभी सदस्यों का भी स्वागत किया गया। गीता परिवार की कर्मठ कार्यकर्ता रूपा दीदी ने सभी का विशेष सम्मान किया। सिद्धार्थ हवेलिया जी ने भारत के गीता परिवार के कार्यों को संक्षिप्त में वर्णन करके समझाया, ऐसा गीता परिवार जिस पर संतों की दूर दृष्टि पड़ी। इसके पश्चात् गीता परिवार के संचालक, संस्थापक स्वामी श्री गोविंददेव गिरि जी महाराज का आगमन कार्यक्रम में हुआ और सभी ने परम पूज्य स्वामी जी को शत्-शत् नमन किया। परम पूज्य स्वामी जी ने योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में नमन किया।
श्रीमान सुमित कोठारी जी ने स्वामी जी का स्वागत व वंदन किया। अत्यंत सुंदर व मनमोहक वातावरण था, परम पूज्य स्वामी जी ने महान व आध्यात्मिक परंपरा का महायज्ञ प्रारंभ किया। आपने उसमें अकल्पनिक सफलता अर्जित की है।
उसके उपरांत गीता संथा वर्ग के प्रोग्राम डायरेक्टर व अन्तर्राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष आदरणीय आशू भैया जी गोयल का परिचय दिया गया। इन्होंने भगवान की वाणी तस्माद्योगी भवार्जुन को अपने जीवन में सार्थक किया हैं।
"योग वाशिष्ठ" के सप्त सोपान
थाईलैंड गीता मैत्री मिलन के शुभअवसर पर आदरणीय आशू भैया ने योग वाशिष्ठ के सप्त सोपान विषय पर अपने ज्ञान चक्षुओं को प्रदीप्त कर सभी को मार्गदर्शन का किया। आदरणीय आशू भैया ने कहा कि आज मेरे लिए अत्यंत आनंद का दिन है कि थाईलैंड की धरती पर अपने भारत के भाई बहनों के समक्ष गीता जी को प्रस्तुत होते देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। यह साधारण बात नहीं है विदेश की भूमि पर अपने संस्कृति का स्वाध्याय किया, यह देख कर मेरी धारणा थाईलैंड के लिए बदल गई है। सांस्कृतिक दृष्टि से जनमानस भारत से जुड़े हैं। इस तरह आदरणीय आशू भैया जी ने स्वामी जी को प्रणाम किया और कहा कि गीता परिवार की इतनी शाखाएँ देश-विदेश में है तथा गीता साधकों से मिलकर अत्यंत आनंद की प्राप्ति होती है यह सब आश्चर्य की बात है एवं यह सब साधु संतों, महापुरुषों के संकल्प से होता है, भगवान का आशीर्वाद होता है, तो देखों कैसा अद्भुत कार्य हो रहा है। इस तरह एक छोटी कक्षा संचालित कर दिन प्रतिदिन गीता कक्षाएँ बढ़ती ही चली गई। आज लाखों घरों व शहरों तक यह गीता जी पहुंच गई हैं। इस प्रकार लगभग 50,000 लोग प्रति माह जुड़ते हैं। गुरु शिष्य परंपरा को हमने अपनाया। सभी साधकों में सेवा भाव हैं। वैसे वे सभी भाव से सेवा देते हैं और यह सभी नि:शुल्क कक्षाएँ हैं सभी कक्षाएँ भगवद् कृपा से चलती हैं। परमपूज्य स्वामी जी की कल्पना थी कि विश्व तक गीता जी को पहुँचाना एवं यह स्वामी जी का स्वप्न 2020 में साकार हो गया। आज हम सभी मिलकर गीता जी के दीपक से विश्व में प्रकाश कर रहे हैं। स्वामी जी व हम सभी इस सेवाकार्य में सहयोगी हैं। यह हमारा सौभाग्य है कि हम अयोध्या में राम मंदिर बनते देख रहे हैं, कृष्ण मंदिर और काशी विश्वनाथ को इसी रास्ते पर हम देखते हैं। हमारी पीढ़ी को गौरव मिल रहा है भारत माता के उन्नयन व उत्कर्ष का समय आ गया है जिसके हम साक्षी हैं। योग वाशिष्ठ में महर्षि वशिष्ठ द्वारा भगवान् राम को यह सात सीढ़ियाँ ज्ञान की बताई गई। ज्ञान प्राप्त करने के लिए सात सीढ़ियाँ चढ़नी चाहिए, यह महर्षि वशिष्ठ का कहना है। यह जीवन यात्रा अंग है। 84 लाख योनियों में घूमते घूमते हमने मनुष्य जीवन प्राप्त किया है।
जीवन पथ में ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। जीवन में सफलता व उन्नयन होना चाहिए इसलिए सेवा भाव में हम लगते हैं इसे हम
अभ्युदय कहते हैं। हम पूजन करते हैं, दान, धर्म करते हैं, साधना करते हैं इसे निःश्रेयस कहा जाता है।
परम शक्ति को हम प्राप्त कर सकते हैं, अनुभव करते हैं इस प्राप्ति हेतु जिस मार्ग पर हम चलते हैं वह योग वाशिष्ठ हैं। भगवान् कहते हैं कि अगर भक्ति करते-करते मेरी प्राप्ति नहीं हुई तो अवश्य ही आप किसी योगभ्रष्ट के घर में जन्म लेंगे। यह भगवान का कहना है योग वाशिष्ठ की सात सीढियाँ आगे बताई गई हैं।
ये सात सीढ़ीयाँ कुछ इस प्रकार है:
- 1) शुभेच्छा - जो इच्छा हो उस तरह से भगवद् सेवा करें और शुभेच्छा अवश्य करें। गलत विचारों को टालना चाहिये। इसी को हम शुभेच्छा कहते हैं।
- 2) विचारणा - अच्छे विचारों का संकल्प अवश्य करें। जैसा हम विचार करते हैं, हम वैसे ही बनते हैं, इसलिए हमारे विचारों पर हमें ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
- 3) तनुमानसा - जो मनुष्य तन मन की परवाह को छोड़ देता हैं। तन व मन को भगवान में लगाने के लिए, इस जन हित को जान जाता हैं यही तनुमानसा है।
- 4) सत्वापत्ति -अधिक से अधिक समय भगवान में लगाना।
- 5) असंसक्ति - ऐसे लोग जो संसार और भगवान दोनों को पाना चाहते हैं।
- 6) पदार्थाभावनी - जिनको संसार के हर कण में, सारे पदार्थ में भगवान दिखते हैं।
- 7) तुरीया - यह स्थिति में अनुभव किया जा सकता है। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति जैसी स्थिति को पार करता है, उसे तुर्यगा स्थिति कहते हैं।
आदरणीय आशू भैया ने कहा गुरु व संत कृपा से इंद्रियों को वश में किया जा सकता है। यह फल, साधन, कृपा भगवान में सब लगाने से प्राप्त होती है एवं यह किसी किसी को ही मिलता है। इस प्रकार आदरणीय आशू भैया ने अपनी वाणी को विराम दिया और सभी को धन्यवाद कहा।
तदोपरांत परम पूज्य स्वामी जी का परिचय दिया गया। वह गीता परिवार के संस्थापक अध्यक्ष हैं। अनेक उपक्रमों का संयोजन करते हैं व गीता परिवार संचालन का संपूर्ण कार्य आपके निर्देशन में हो रहा है। भारत में वेदों का अस्तित्व पुनर्स्थापित करने हेतु वेद विद्यालयों की स्थापना परम पूज्य स्वामी जी ने की है। परमपूज्य स्वामी जी विभिन्न विषयों पर समान अधिकार रखते हैं; श्री भागवत, श्रीरामचरितमानस, देवीपुराण, महाभारत, महापुराण, देवी भागवत अनेक ग्रंथ हैं। इसके अतिरिक्त गुलाब राव महाराज, शंकर वेदांत, दर्शन शास्त्र, भारतीय प्रबंध शास्त्र, आदि पर अनेक व्याख्यान अपने दिए हैं। आप मराठी, हिंदी, गुजराती, संस्कृत, मारवाड़ी, अंग्रेजी भाषा के जानकार हैं। विदेशों में भी आपकी तेजस्वी वाणी का लाभ उठाया जा रहा है। भारत के हर बालक पर भारतीयता का संस्कार हो यह स्वप्न लिए, धर्म सिखाने, गगन में जय जय कार किये ऐसे स्वामी जी को आशीर्वचनों हेतु आमंत्रित किया गया। परमपूज्य स्वामी जी ने भजन से आरंभ किया।
स्वामी जी ने कहा - इस सुवर्ण भूमि के निवासी मेरे सारे भाई-बहनों के लिए मेरा सादर जय श्री कृष्ण। स्वामी जी ने कहा इस सुंदर भूमि पर आकर के अपनी परंपरा के चिन्ह पाकर मन, चित्त आह्लादित हो गया। गीता मैया के इस आयोजन देखकर मन आनंदित हो गया है। जब भक्ति के मार्ग पर प्रवेश करके परमात्मा के साथ संबंध को निश्चित करना होता है तब इस संबंध में प्रभु की आराधना करते हैं तो संबंध में गहराई आती है। भगवान का अर्जुन के साथ क्या संबंध है? इस संबंध को भगवान् सखाभाव से कहते हैं। इसका जो भाव है वह हमारी गीता परिवार का भाव है। कुछ गीताप्रेमियों का साथ में मिलना गीता मैत्री मिलन कहा जाता है, ऐसा अपनापन गीता परिवार में है। कोई भी भक्त जब बोलता है तो उसमें अनेक जिज्ञासा होती है। संवाद होना यहाँ आवश्यक हैं। आप संवाद अवश्य करिये भक्तों के कुछ प्रश्न स्वामी जी ने लिये-
प्रश्न 1- मनुष्य ईश्वर को मानता है परंतु मनुष्य ईश्वर की नहीं मानता ऐसा क्यों?
उत्तर - मनुष्य ईश्वर की तो छोड़ो खुद की भी नहीं मानता क्योंकि मनुष्य को उतना ज्ञान नहीं हैं। जीवन के हर क्षेत्र में ज्ञान है पर ज्ञान की बात को मनुष्य मानता नहीं है, उपदेश करता है।
मनुष्य को अपने विवेक का आदर करना चाहिए। अपने विवेक का आदर करो। तभी मनुष्य ईश्वर की भी मानेगा। यही प्रश्न अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण को किया था।
भगवान कहते हैं कामना जागती है कामना पूर्ण न होने पर क्रोध व लोभ होता है यह दोनों रजोगुण के कारण उपलब्ध होते हैं। हम रजोगुण के कारण भगवान् को नहीं मानते। मन की चंचलता के कारण मनुष्य भगवान् को नहीं मानता। ऐसा सबके साथ होता है, अपने ऊपर विजय प्राप्त करना अत्यंत आवश्यक है। आत्मा पर विजय आपको गीता पढ़ने प्राप्त होती हैं एवं आत्म विजय प्राप्त करते-करते, विश्व विजय प्राप्त हो जाता है। जो रोज भगवान के में मन लगाएगा उसे आत्मा पर विजय प्राप्त होगी। चंचलता कम हो जाएगी रजोगुण समाप्त हो जाएगा।
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥6.25॥
यह बदलाव धीरे-धीरे आता है। साधकों का मन जब ईश्वर में लगे , ईश्वर के साथ वे जब एक रूप हो जाए तभी मनुष्य ईश्वर को भी मानेगा और ईश्वर की भी मानेगा।
धीरे-धीरे मन बाहर के आकर्षण के कारण से, मनुष्य ईश्वर को नहीं मानता। अपने मन के साथ छोटे बच्चों की तरह व्यवहार करना चाहिए।
प्रश्न 2- भगवान हमें कहाँ जाने को कह रहे हैं?
उत्तर - भगवान अपने चिंतन की बात करते हैं, जो परमात्मा की आराधना करेंगे वह सद्गति को प्राप्त होगा। दर्शन शास्त्र के अनुसार सारे संसार में ऐसा कोई पदार्थ नहीं जिसमें सत्यता या सत्त्व, तम, रज गुण नहीं है। जीवन के विकास के लिए सभी आवश्यक है। संसार के सभी सुखों के लिए आपको पदार्थों पर, व्यक्तियों पर, परिस्थितियों पर निर्भर करना पड़ता है।
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः। स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥5.24॥
अंत में आपका मन किसी पदार्थ में अटका है तो आप तमोगुण में जन्म लेंगे और यदि किसी व्यक्ति के मन में रजोगुण है तो वह जन्म के समय रजोगुण में जन्म लेगा। यदि परमात्मा का चिंतन है का अंतिम क्षण में ही आप सतोगुण में जन्म लेंगे। उत्तम गति प्राप्त करेंगे आप वही होते हैं जो आपका मन होता है इसलिए आपको सोच बदलने की आवश्यकता है। अगर गीता के अनुसार सोचना हम सीख जाते हैं तो यह जीवन हमारा आनंद में और सुख में होता है और परलोक भी आनंदमय होता है। इस तरह परम पूज्य स्वामी गोविंद देव गुरु जी ने महाराज ने अपनी वाणी को विराम दिया।
उसके उपरांत थाईलैंड में बच्चों के द्वारा 12वें अध्याय का सुंदर कंठस्थ श्लोकों का गायन हुआ। और गीता परिवार के सभी बालकों को उपहार वितरित किए गए। लर्न गीता कार्यक्रम की लीगल एडवाइजर श्रीमती प्रियंका हवेलिया जी ने टीम 11 की घोषणा की व उनका सम्मान किया।। गीताव्रतियों की घोषणा की एवं सभी भारतीयों गीता साधकों का मंच पर सम्मान किया गया। परमपूज्य स्वामी जी ने सभी गीताव्रतियों को उपाधि से सम्मानित किया। गीता परिवार की प्रथम गीता विचक्षण थाईलैंड के बैंकॉक में से हैं प्रिय रूपा दीदी का सम्मान किया गया। थाईलैंड में हर घर गीता, हर कर गीता को सभी ने आत्मसात् किया है। सभी टीम 11 के सदस्यों का स्वागत किया गया। गीता परिवार की ओर से सभी को बधाई व शुभकामनाएँ दी गई। धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। सबका आभार प्रदर्शन किया गया।
इस प्रकार से थाईलैंड का गीता मैत्री मिलन का संपूर्ण कार्यक्रम अद्भुत रहा।




