
संत उद्गार
श्रीमद्भगवद्गीता के 11<sup>वें</sup> अध्याय को विश्वरूपदर्शन कहा गया है क्योंकि इसमें भगवान के अत्यंत दुर्लभ स्वरूप का वर्णन दिया गया है। श्रीभगवान ने स्वयं कहा -
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम। देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः॥11.52॥
अर्जुन इस रूप का दर्शन करके धन्यता का अनुभव करते हैं। यह श्लोक इसलिए मेरे स्मरण में आया क्योंकि भगवान ने कहा है इस रूप के दर्शन करने की योग्यता मात्र भक्ति से प्राप्त होती है।
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥11.54॥
आज गीता परिवार के विश्वरूप का दर्शन हो रहा है। सभी एक दूसरे को विशेष रूप से न जानते हुए भी अत्यंत प्रेम से एक दूसरे के साथ रहते हैं। इतनी अधिक संख्या में कार्यकर्ता एक साथ जुड़कर अनुशासनपूर्वक कार्य करते हैं यह भगवान का चमत्कार है जो कृपापूर्वक गीता परिवार के ऊपर किया। यह सब कार्य करते हुए कार्यकर्ताओं के अन्तःकरण में जो भक्तिभाव है वही सर्वोच्च है।
यह भगवद्गीता अत्यंत विलक्षण है। भगवान ने इस विलक्षण शास्त्र को अर्जुन के समर्पण व भक्ति से प्रसन्न होकर सभी को प्रदान किया। गीता परिवार के साधक अर्जुन के छोटे छोटे अंश ही तो हैं। प्रतिदिन इतनी निष्ठा के साथ गीता का पठन व पाठन करते हैं और इसी के प्रभाव से आज गीता परिवार विकसित होता गया। यह परिवार किसी व्यक्ति का नहीं बल्कि स्वयं श्रीभगवान का परिवार है अतः स्वयं भगवान ही इसका संचालन कर रहे हैं।
हम गीता परिवार में भगवान का कार्य करते हैं एवं भगवान ने 11<sup>वें</sup> अध्याय में 55<sup>वें</sup> श्लोक में कहा जिसे आदि शंकराचार्य भगवान ने
समस्त गीता शास्त्र का सारभूत श्लोक कहा।
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः। निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥11.55॥
अर्थात् मेरा कार्य करने के जो परायण है,वह मुझे प्राप्त होता है अतः भगवान का यह कार्य ही हमारी पूजा है जिसे गीता परिवार के साधकों ने चरितार्थ कर दिया। आज यदि कोई पूछे कि गीता के अन्तिम अध्याय में कहा है
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥18.46॥
इसका व्यावहारिक दृष्टांत क्या हो सकता है तो मैं गर्व से कह सकता हूँ कि गीता परिवार के हमारे साधक इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। गीता परिवार के कार्यकर्ता सभी साधकों के भीतर बैठे कृष्ण की पूजा करते हैं एवं अत्यंत संयत मन से करते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि मुझे अत्यंत संयम एवं श्रद्धा से प्रभु की उपासना करनी चाहिये। यह कार्य ही हमारी सबसे बड़ी पूजा है।
भगवान ने कहा है मत्परम: जिसका आशय है - ‘अहमेव परमो यस्य स: मत्परम:’ अर्थात् जिसके लिये मैं ही परम हूँ। आज सभी गीता परिवार के कार्यकर्ताओं के लिये किसी भी अन्य कार्य से गीता परिवार का कार्य सर्वोपरि है। सभी को लगता है कि गीता परिवार का कार्य अवश्य होना चाहिए। मैंने अपने छात्र जीवन मे तीन लेख लिखें - कृष्णं शरणं गच्छामि, धर्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि। अर्थात् भगवान कृष्ण के शरण मे हूँ, मैं उनके द्वारा बताए गए धर्म के शरणागत हूँ अतः उसका पालन करना मेरा कर्तव्य है और संघ जिसका अर्थ है समूह, इसका आशय है कि गीता परिवार यह हमारा संघ है और हम इसके शरणागत हैं। आइये जो भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा बताये कार्य को कर रहा है ऐसे गीता परिवार के हम सभी शरणागत हो जायें।
- स्वामी गोविन्ददेव गिरि


