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गीता मैत्री अंक ६जुलाई से दिसम्बर २०२३
११Soulfull Stanzas

प्रतिबिम्ब

हे कान्हा! तुम ही हो मेरे सच्चे मित्र
अपने होने के अहसास को
दिल से दिल तक पहूंचाकर
जीवन की सच्चाई का दिखाया तुमने चित्र
हे प्रभु!तुम ही हो मेरे सच्चे मित्र
मैं कहती रही अपने मन की बातों को
तुम सुनते रहे साथी बन दिन और रातों को
मैं घबराई तो तुमने ही सम्भाला
मैं इतराई तो अहम् चूर कर डाला
सांसो की जब भी टूटने लगती डोर
तुम आकर पकड लेते उसका छोर
जीवन के धूप और छांव के मेल में
हारता है जब मन सुख-दुख के खेल में
जीत के रास्ते नये खोल देते हो
ऐसा ना जाने भेजते हो कौन सा पत्र
हे कान्हा! तुम ही हो मेरे सच्चे मित्र
तुम मेरी आस हो,विश्वास हो
लगता है तुम दूर हो पर
अगले ही क्षण दिखते तुम मेरे पास हो
मेरी कामयाबी में बिखेरते रहे इत्र
हे कान्हा! तुम ही हो मेरे सच्चे मित्र

  • अर्चना शर्मा 'अर्ची', गाजियाबाद

नहीं मैं एकलव्य,
ना ही मैं हूँ अर्जुन..!
आतुर हो रहे कर्ण मेरे,
पदचाप सुनने अपने गुरू की..!!

राह तकती ये नजर,
आँख भर आयी ये मेरी..!
आतुर हो रहा मन मेरा,
परछाई देखने अपने गुरू की..!!

नतमस्तक हूँ मैं शीश नवाँ,
कंठ हो रहा है रुंध..!
मानवंदन को रहा आतुर,
चरणधूली सजाने अपने गुरू की..!!

क्या मिल पायेगा इस जनम,
स्पर्श उनका अपने सर पर..?
क्या देख पाउँगा इस जनम,
साक्षात स्वरूप अपने गुरू की..??

  • मनीष माणिकराव गोडे, नागपुर
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