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गीता मैत्री अंक ६जुलाई से दिसम्बर २०२३
१२Pondering Pages of Geeta Maitri

चौपाई पहचाने खेल

नीचे दी हुईं चौपाइयों के शब्द इधर-उधर किये गए हैं,
क्या आप उन्हें पहचान कर ठीक कर सकते हैं

1.सदा सिद्धि नौ माता राम रसायन दाता जानकी निधि बर दीन के अस के रघुपति दासा अष्ट पासा रहो तुम्हरे
2.सीता रसिया को काज गुनी सुनिबे अति प्रभु लखन आतुर चरित्र राम विद्यावान करिबे मन को राम चातुर बसिया
3.सहस्र जोजन ताहि जानू मधुर लील्यो माना मंत्र लंकेस्वर तुम्हरो भए जुग पर बिभीषन सब जाना भानू जग फल
4.क्रम संकट ध्यान पीरा हनुमान लावै निरंतर हरै मन तें हनुमत छुड़ावै बीरा सब जपत बचन जो नासै रोग
5.तुम के और मनोरथ सकल राजा फल पर कोई सोइ तपस्वी राम पावै लावै अमित तिन काज जो सब जीवन साजा
6.मूंज जग सुवन औ जनेऊ महा बज्र ध्वजा केसरीनंदन कांधे तेज बन्दन प्रताप संकर हाथ साजै बिराजै
7.हनुमत सर्ब सुमिरै धरई चित्त सुख जो न पीरा मिटै संकट कटै सब सेइ बलबीरा करई देवता और हनुमत
8.दुआरे काहू तुम्हारी लहै रक्षक पैसारे सब सरना तुम राम आज्ञा तुम ना बिनु होत को सुख रखवारे न डर
9.आवै सुनावै लोक सम्हारो पिसाच तीनों भूत कांपै जब महाबीर तें हांक नाम आपै तेज निकट नहिं आपन
10.उपकार कुबेर दिगपाल सके सुग्रीवहिं जहां कबि कोबिद कहां तुम राम कहि जम ते पद राज मिलाय कीन्हा ते दीन्हा

चौपाई पहचाने खेल

उत्तरमाला

1.अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता अस बर दीन जानकी माता राम रसायन तुम्हरे पासा सदा रहो रघुपति के दासा
2.विद्यावान गुनी अति चातुर राम काज करिबे को आतुर प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया राम लखन सीता मन बसिया
3.तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना लंकेस्वर भए सब जग जाना जुग सहस्र जोजन पर भानू लील्यो ताहि मधुर फल जानू
4.नासै रोग हरै सब पीरा जपत निरंतर हनुमत बीरा संकट तें हनुमान छुड़ावै मन क्रम बचन ध्यान जो लावै
5.सब पर राम तपस्वी राजा तिन के काज सकल तुम साजा और मनोरथ जो कोई लावै सोइ अमित जीवन फल पावै
6.हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै कांधे मूंज जनेऊ साजै संकर सुवन केसरीनंदन तेज प्रताप महा जग बन्दन
7.और देवता चित्त न धरई हनुमत सेइ सर्ब सुख करई संकट कटै मिटै सब पीरा जो सुमिरै हनुमत बलबीरा
8.राम दुआरे तुम रखवारे होत न आज्ञा बिनु पैसारे सब सुख लहै तुम्हारी सरना तुम रक्षक काहू को डर ना
9.आपन तेज सम्हारो आपै तीनों लोक हांक तें कांपै भूत पिसाच निकट नहिं आवै महाबीर जब नाम सुनावै
10.जम कुबेर दिगपाल जहां ते कबि कोबिद कहि सके कहां ते तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा राम मिलाय राज पद दीन्हा
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मूल अंक, पृष्ठ ६४मूल अंक, पृष्ठ ६५