स्तर 4 शुभारम्भ समारोह
5th Batch - May23 - 17 जुलाई 2023
मई 2023, (स्तर 4, भाग -॥) का शुभारंभ समारोह 17 जुलाई 2023 को सायं 7:00 बजे हुआ। भक्तिरसपूर्ण सुमधुर प्रार्थना से तन मन शुद्ध कर, जूम प्रांगण को ज्योतिर्मय करने के लिए मुम्बई से तकनीकी सहायक व ट्रेनर श्रीमती गायत्री सिंह जी ने सूत्र संचालक के रूप में कार्यक्रम का आरंभ किया। ईश्वर की आराधना के पश्चात् स्वागत भाषण व गीता संदेश देने हेतु गीता परिवार के आधारस्तंभ, ऑनलाईन गीता संथा वर्ग के संचालक, गीता परिवार के अन्तरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष, बहुमुखी प्रतिभा के धनी हमारे आदरणीय आशू भैया गोयल जी पधारे।
सभी साधकों को संबोधित करते हुए आ. आशू भैया जी ने कहा कि भारत के हर कोने से, विभिन्न संप्रदायों से, विभिन्न मठों से, तीन धामों की गीता यात्रा कर आप सभी इस चतुर्थ धाम में आ पहुंचे हैं। ऐसा एक भी सम्प्रदाय नहीं है जहाँ गीता का आदर न होता हो। केवल भारतीय आचार्य विनोबा भावे या लोकमान्य तिलक ने ही गीताजी पर भाष्य नहीं लिखे, वरन् शास्त्र परंपरा को मानने वाले पाश्चात्य तत्त्वचिंतक (Physicist )Oppenheimer से लेकर (philosopher of Pessimism) Schopenhauer तक द्वारा गीता पर भाष्य व टीका लिखी गयी हैं। कोई भी ऐसा नहीं जो गीताजी से प्रभावित न हुआ हो। गीताजी पर आज तक अठारह सौ (1800) प्रामाणिक टीकायें हुई हैं। आपके जीवन में गीताजी ने मात्र श्लोक सीखने के लिए प्रवेश नहीं लिया है, वरन् एक असीम उपलब्धि के स्वरूप में आपके क्लेश शांत करने हेतु, उलझनों को सुलझाने हेतु, स्वास्थ्य लाभ देने हेतु आपको चुना है। प्रारम्भ में जटिल लगने वाली संस्कृत भाषा, शनैः शनैः त्रिष्टुप छंद के श्लोक भी अब मुखोद्गत कराने लगी है।
अब प्रश्न उठता है कि यदि अन्य कोई भी भाषा (फ्रेंच, जैपनीज, जर्मनी, मॅन्डेरिन) सीखते या अन्य ग्रंथ पढ़ते, तब भी क्या दैवी घटनायें घटतीं, जो आज आप अनुभव कर रहे हैं । इसका उत्तर है……..
यह भगवान कृष्ण के मुखारविन्द से निकली मंगलमयी वाणी है, जिसे हम शुद्धता से उच्चारित करते हैं। परिणामतः सारा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। श्रद्धेय स्वामी श्रीगोविन्ददेव गिरि महाराज कहते हैं ……
'Chanting with Pure and correct Pronunciation creates such Vibrations which alters the Brain cell's programming’
योग क्या है ? श्लोकों का शुद्ध उच्चारण शारीरिक व मानसिक दोनों व्याधियों को नष्ट करता है। भगवद्वाणी का प्रसार दैवी शक्तियाँ करती हैं, ये शक्तियाँ हमारा मानसिक संतुलन संभाले रखती हैं, जिसे योग कहते हैं।
गीता में योग की व्याख्या कुछ इसप्रकार है - समत्वं योग उच्यते, जीवन में समता ही योग है। प्रत्येक परिस्थिति में स्वयं को संतुलित रखना ही योग है। योग के दो प्रकार हैं
1. योगः कर्मसु कौशलम् (कुशलता से कर्म करना योग कहलाता है) इसे बहिरंग योग कहते हैं ।
2. समत्वं योग उच्यते (कर्म करने पर यदि अपेक्षित परिणाम न मिले तब भी संतुलित रहें) तब इस समत्व योग को अंतरंग योग कहते हैं।
हमारे जीवन में अनेक उलझनें रहती हैं, इसिलिये हम संतुलित नहीं रहते। गीताजी पढ़कर यह समत्व जीवन में आता हैं। आपके जीवन का क्या उद्देश्य हो ?
आप सभी साधकगण अब ज्येष्ठतम (Super Senior) हो गये हैं, आप अब केवल चालीस मिनट की कक्षा व 1 - 2 घंटो के विवेचन सत्र तक सीमित न रहें। अब आप स्वाध्याय आरंभ करें। कानपुर IIT की gitasupersite पर जाकर महापुरुषों की श्लोकों पर लिखी मीमांसा व अर्थ चिंतन का अध्ययन कर सकते हैं। महापुरुषों के विशाल कोष उपलब्ध हैं, उन्हें आप सब पढ़ें।
‘Action plan should be with us, think how can we implement this in our life.’
पास व साथ रहने वालों के साथ उदारता दिखायें, आस पड़ोस से ही आप यह आरम्भ कर सकते हैं। अपना जीवन सत्कार्य में लगायें, सेवा दें, सेवा से साधना प्रगल्भ होती है, पुष्ट होती है, स्थायी होती है। साधना से स्थैर्य आता है।
गीता परिवार ज्ञानी, सुशिक्षित व सुसंस्कारित गुणीजनों से परिपूर्ण है। बाहर कोई कितने ही बड़े ओहदे पर क्यों न हो, गीता परिवार में वह गीता सेवी ही कहलायेगा। आप इन सेवाओं मे से कोई भी सेवा अपने लिए चुन सकते हैं। प्रचार कार्य कर सकते हैं, गीताव्रती तक परिक्षायें उत्तीर्ण कर सकते हैं। यह यात्रा आपके जीवन में नया पड़ाव लाएगी, आप सदा के लिए इस यात्रा के पथिक बन जायेंगे। आप आजीवन यह चालीस मिनट की कक्षा कर सकते हैं। यह नि:स्वार्थ, निष्काम यज्ञ है, आईये इस यज्ञ में सेवा की आहुति देकर जीवन कृतार्थ करें।
कंठस्थीकरण के प्रात्यक्षिक
आदरणीय आशू भैया के सकारात्मक मार्गदर्शन के पश्चात् गीताव्रती उत्तीर्ण साधकों के प्रात्यक्षिक हुए। USA California से 51 वर्षीय श्रीमती सुनीता सोमाणी, संभाजीनगर से 65 वर्षीय श्रीमती मीना अर्जुन पटवाल तथा अकोला से 11 वर्षीय समर्थ राठी ने श्लोकांक के साथ श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों का उच्चारण कर प्रात्यक्षिक दिये। गीताजी जब ग्रंथ से कंठ में आ जाये, तो वह हमारी हो जाती है। नींद में भी वह मस्तिष्क में रहती है, यह जन्म जन्मांतर तक साथ रहती है। तीन वर्ष का बालक अपनी मां की गोंद मे बैठ जब प्रात्यक्षिक देता है, तब वह इस जन्म के ही नहीं, पिछले जन्म के भी पुण्यकर्म वहन करता है।

