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गीता मैत्री
— ४४
डॉ. संजय मालपाणी
डॉ. संजय मालपाणी
अग्रदूतों के मन की बात

धर्मक्षेत्रे - कुरुक्षेत्रे

गीता परिवार की स्थापना 1986 में संगमनेर (महाराष्ट्र) में हुयी। उस मंगल क्षण को इस वर्ष चालीस वर्ष पूर्ण हुये।

कुरुक्षेत्र का अर्थ

भगवद्गीता का आरंभ ही ‘धर्मक्षेत्रे - कुरुक्षेत्रे’ इन शब्दों से होता है। कहते है की यदि संपूर्ण भगवद्गीता का संस्मरण नहीं कर सकते हो तो गीता का पहला श्लोक कंठस्थ करना चाहिए। यदि पुरा श्लोक कंठस्थ करने का सामर्थ्य नहीं हो तो कम से कम ये दो शब्द ‘धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे’ स्मरण में रखने चाहिए।

कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र बनाने वाले जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण है। गीता के तेरहवें अध्याय का नाम क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग योग है। इस में क्षेत्र का अर्थ शरीर तथा क्षेत्रज्ञ का अर्थ क्षेत्र का ज्ञाता अर्थात शरीर को जानने वाला ऐसा बताया गया है।

शरीर प्रकृति और पुरुष के संयोग से बना है। जिसमे पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रिय, मन, बुद्धि एवं अहंकार यह सारी प्रकृती की देन हैं। केवल आत्मा हमें पुरुष से अर्थात परमात्मासे प्राप्त होता है। देह याने क्षेत्र की निर्मिती का यह शास्त्र जानने के पश्चात अब ‘कुरु’ शब्द को समझते हैं। कुरु का अर्थ है कार्य अर्थात कर्म! अर्थात कुरुक्षेत्र का अर्थ होता है ‘कर्म करनेवाला शरीर’!

कर्म के प्रकार

हमारा शरीर निरंतर कार्यमग्न होता है। व्यक्ति का शरीर जब कोई भी कार्य करता है तब मन तथा बुद्धि उस कर्म को पंचेंद्रियों के माध्यम से करवाती हैं।

कर्म के तीन प्रकार गीता में बताये गये है।

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।

अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥ (4.17)

कर्म विकर्म और अकर्म ऐसे तीन प्रकार के कार्यों का उल्लेख यहॉं हैं।

कर्म विकर्म और अकर्म को सरल शब्दों में समझने का प्रयास करते हैं।

कर्म - जब बुद्धि कहती है यह कर्म करो और वह कार्य करने को मन राजी नहीं होनेपर भी बुद्धि द्वारा वह कार्य करवाया जाता है तब उसे ‘कर्म’ कहा जा सकता हैं। जैसे कार्यालय में समय पर पहुँचना... कई बार मन आलस्य के कारण ऐसे कार्य को नहीं करना चाहता। परंतु बुद्धि प्रबलता से वह कार्य करवाकर रहती हैं। ऐसे अधिकतर कार्य स्वार्थ मूलक होते हैं। मन मारकर वह कार्य अनिवार्य है इस लिए किये जाते हैं।

विकर्म - अनेक बार मन कहता है की यह कार्य करों। परंतु बुद्धि मना करती हैं। जैसे मधुमेह के रोगी का मन मीठाई खाने को करता हैं। तब बुद्धि कहती है की यह कार्य ठीक नहीं हैं। परंतु बुद्धि की ना सुनकर वह रोगी मिठाई खा लेता है। ऐसे कर्म व्यक्ति को विकृती की ओर ले जाते हैं। इस प्रकार के कर्म विनाश के कारण बनते है। ऐसे कार्य को ‘विकर्म’ समझना चाहिए।

अकर्म - जब बुद्धि कहती है की यह कार्य करना चाहिए और मन भी उस कार्य में आनंद की अनुभूती करता है ऐसे कुछ कार्य होते हैं। जैसे समाजहित में किसी सामाजिक संस्था का कार्य करते समय बुद्धि और मन दोनों ही संतुष्टी का अनुभव करते हैं। जिस कार्य में स्वार्थ नहीं अपितु परमार्थ हो ऐसे कार्य सहसा इस अकर्म की श्रेणी में आते हैं। मनुष्य ऐसे कार्य बडे ही उत्साह से करता हैं। कर्मफल की अपेक्षा के परे, निस्वार्थ भाव से किये गये ऐसे कार्य को ‘अकर्म’ कहा जाता है।

विकर्म मनुष्य को अधर्म हेतु प्रवृत्त करता है एवं अकर्म मनुष्य को धर्म की राह दिखाता हैं।

बुद्धि और मन का जुडाव ही योग है

भगवान श्रीकृष्ण अनेक स्थानों पर मन और बुद्धि को साथ जोडकर कर्म करने की बात करते हैं। जैसे -

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्। (8.7)

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।(12.8)

मन और बुद्धि को जोडने की विधा को ही योग कहा गया हैं। इस योग शास्त्र का नाम ही भगवद्गीता है।

जब यह योग जीवन में उतरता है तब हम विकर्म से निवृत्त होकर अकर्म हेतु प्रवृत्त होने लगते है। अर्थात कुरुक्षेत्र (कार्य करने वाला शरीर) धर्मक्षेत्र (अकर्म करने वाला शरीर) बनने लगता है। मानव जीवन को सफल बनाने की यह एकमात्र विधा है।

युद्धारंभ से पहले शंखनाद

महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र पर हुआ। इस युद्ध से पहले सभी वीर योद्धाओं ने अपने अपने शंख बजाएं।

शङ्खान् दध्मुः पृथक् पृथक्॥(1.18)

शंख का आकार हृदय जैसा होता है। और हृदय में परमात्मा का अंश आत्मा बसता हैं।

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।(18.61)

युद्ध की स्थिति में अपने अंतरात्मा की आवाज अर्थात भगवान की बात जो सुनता है वहीं जीवन में विजयी होता है। शंखनाद इसी का प्रतिक है।

गीता परिवार के चतुर्दशकपूर्ति निमित्त कुरुक्षेत्र में जो ‘सहस्र गीता कण्ठनाद’ कार्यक्रम आयोजित हो रहा है वहॉं एक हजार गीता साधक संपूर्ण गीता कण्ठस्थ कर एक स्वर में गीता गान करने वाले हैं। कुरुक्षेत्र की पावन धरा पर पूज्य स्वामीजी की उपस्थिति में सहस्र कण्ठों से गुँजने वाले स्वर्गीय स्वर आत्मबोध का दीप प्रज्ज्वलित कर इन गीता व्रतियों का जीवन निश्चित ही धर्ममय करेंगे इसमें संदेह नहीं। कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र बनाने वाला यह समारोह हमारे आत्मोद्धार का मार्ग प्रशस्त करें इसी शुभकामना के साथ कुरुक्षेत्र में आप का स्वागत हैं…..

संपादकीय: गीता युग का उदय - एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण की ४० वर्षीय यात्रा

इसी शृंखला में कुरुक्षेत्र में एक सहस्र गीता व्रती एकसाथ मुखोद्गत गीता कण्ठनाद करने वाले है।