- आयोजन
- पंचदिवसीय मेगा स्वास्थ्य शिविर
- राज्य
- छत्तीसगढ़
- श्लोक संदर्भ
- अध्याय 6, श्लोक 17
- कार्यकर्ता
- 8 कार्यकर्ता शिविर
मेगा स्वास्थ्य शिविर में गीता परिवार छत्तीसगढ़ का विशेष प्रदर्शनी
इस श्लोक के आलोक में स्वास्थ्य का वास्तविक अर्थ केवल रोग‑मुक्ति नहीं, बल्कि शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक संतुलन है।

ईश्वर एवं पूज्य स्वामी जी की विशेष अनुकम्पा तथा वरिष्ठ सेवियों के मार्गदर्शन से छत्तीसगढ़ शासन द्वारा आयोजित पंचदिवसीय मेगा स्वास्थ्य शिविर में गीता परिवार छत्तीसगढ़ का स्टाल न केवल चिकित्सकीय सेवा का एक व्यापक मंच बना, बल्कि “गीता और स्वास्थ्य” के समन्वित दृष्टिकोण का एक सशक्त उदाहरण भी प्रस्तुत हुआ।
गीता का स्वास्थ्य दर्शन
भगवद्गीता (अध्याय 6, श्लोक 17) में कहा गया है:
“युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥”
अर्थात—जो व्यक्ति आहार‑विहार में संयमित है, कर्मों में संतुलित है, और निद्रा‑जागरण में मर्यादित है, वही योगी दुःखों से मुक्त होकर स्वास्थ्य और शांति का अनुभव करता है।
चिकित्सक समुदाय की सक्रिय सहभागिता
आधुनिक चिकित्सा, आयुर्वेद और होम्योपैथी के विशेषज्ञ चिकित्सकों ने गीता कक्षा के उद्देश्य और दीर्घकालीन प्रभाव को समझा। उन्होंने अनुभव किया कि गीता का अध्ययन केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि रोगी और चिकित्सक दोनों को मानसिक संतुलन और आत्मबल प्रदान करता है।
विशेष रूप से आयुर्वेदिक महाविद्यालय के अधिष्ठाता ने संस्कृत पठन और शुद्ध उच्चारण को आयुर्वेद अध्ययन में सहायक बताते हुए विद्यार्थियों को गीता कक्षा से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।
शिविर में उपस्थित निजी अस्पतालों एवं शासकीय अस्पतालों के विशेषज्ञ चिकित्सकों—विशेषकर शिशु रोग विशेषज्ञ और स्त्री‑प्रसूति रोग विशेषज्ञों ने समूह पंजीकरण की पहल की। उनका मानना था कि गीता कक्षा से रोगियों को केवल औषधीय उपचार ही नहीं, बल्कि मानसिक शांति, आत्मबल और सकारात्मक जीवन दृष्टि भी प्राप्त होगी।
सामान्य जन में गीता के औषधीय प्रभाव की अनुभूति
सामान्य नागरिकों ने गीता के औषधीय और मानसिक स्वास्थ्यवर्धक स्वरूप को प्रत्यक्ष अनुभव किया। स्थल पर ही बड़ी संख्या में पंजीकरण हुए और प्रतिभागियों को “पॉकेट गीता” भेंट की गई। लोगों ने इसे श्रद्धा और उत्साह से स्वीकार किया, मानो उन्हें जीवन का अमृत प्राप्त हुआ हो। अनेक साधक जो पूर्व में पंजीकृत थे किंतु सक्रिय सेवा में नहीं जुड़ पाए थे, इस शिविर में पुनः गीता परिवार से जुड़े। उन्होंने अनुभव किया कि गीता परिवार केवल संगठन नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला परिवार है।
गीता की दृष्टि से स्वास्थ्य के आयाम
शारीरिक स्वास्थ्य: गीता संयमित आहार और नियमित साधना पर बल देती है। उचित आहार, योगाभ्यास और आयुर्वेदिक जीवनशैली शरीर को रोग‑मुक्त और ऊर्जावान बनाते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य: ध्यान, प्रार्थना और गीता का अध्ययन मन को स्थिरता और शांति प्रदान करते हैं। गीता कहती है कि “अशांतस्य कुतः सुखम्” — अशांत मन में सुख नहीं हो सकता। अतः मानसिक संतुलन ही वास्तविक स्वास्थ्य का आधार है।
सामाजिक स्वास्थ्य: सेवा, सहयोग और संगठनात्मक कार्य व्यक्ति को समाज से जोड़ते हैं। गीता का संदेश है कि “ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः” — दूसरों के हित में कार्य करना ही सर्वोच्च धर्म है। यह सामाजिक स्वास्थ्य का मूल है।
आध्यात्मिक स्वास्थ्य: आत्मबल, ईश्वर‑स्मरण और धर्मपालन से जीवन में गहन संतोष और आंतरिक शक्ति का संचार होता है। गीता में कहा गया है कि “मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु” — मन को भगवान में स्थिर करने से जीवन में परम शांति और स्वास्थ्य प्राप्त होता है।
“स्वास्थ्य केवल शरीर की स्थिति नहीं, बल्कि आत्मा की प्रसन्नता और जीवन का संतुलन है।”_
“छत्तीसगढ़ के हर घर में गीता हो, हर कर में गीता हो”—इस संकल्प के साथ गीता परिवार स्वास्थ्य और साधना की इस मशाल को आगे बढ़ाता रहेगा।


