गीता जयंती: चेतना का पर्व
गीता जयंती केवल एक तिथि नहीं, बल्कि वह दिव्य क्षण है जब कुरुक्षेत्र की रणभूमि में मोह और विषाद से ग्रस्त अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण ने आत्मबोध का अमृत पिलाया।
“जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥”
गीता जयंती महोत्सव का उद्देश्य
इस महोत्सव का मूल उद्देश्य गीता के शाश्वत संदेश को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाना रहा। गीता को केवल पूज्य ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन के व्यवहारिक मार्गदर्शक के रूप में स्थापित करना इसका प्रमुख ध्येय था। युवाओं और बच्चों में चरित्र निर्माण, आत्मसंयम और कर्तव्यनिष्ठा के संस्कार विकसित करना तथा समाज में धर्म, सत्य, सेवा और करुणा की चेतना को सुदृढ़ करना इस आयोजन की आत्मा रही।
यह महोत्सव गीता परिवार के चतुर्दशकपूर्ति वर्ष के आयोजन का हिस्सा था। जिसमें गीता परिवार ने 40 लाख साधकों तक गीता पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
जिसमें गीता परिवार ने 40 लाख साधकों तक गीता पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।


