विभिन्न L2, L3 ,L4 वर्गों के शुभारम्भ समारोह
शुभारम्भ का तात्पर्य है—शुभ, पावन और कल्याणकारी आरम्भ।



भारतीय संस्कृति में चार का अंक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना गया है—चार धाम, चार वेद, चार पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) तथा चार आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास)। इसी सांस्कृतिक परम्परा का सजीव प्रतिबिम्ब गीता परिवार में दृष्टिगोचर होता है, जहाँ गीता–पठन को चार स्तरों (Levels) में सुव्यवस्थित किया गया है। प्रत्येक स्तर का शुभारम्भ विधिवत शुभारम्भ समारोह के माध्यम से किया जाता है, जिससे साधना–यात्रा मंगलमय आधार पर आगे बढ़े।
शुभारम्भ का तात्पर्य है—शुभ, पावन और कल्याणकारी आरम्भ। प्रत्येक लेवल का शुभारम्भ प्रभु–चरणों में विनम्र प्रार्थना अर्पित करते हुए दीप–प्रज्ज्वलन के साथ सम्पन्न होता है। दीप–ज्योति मात्र एक परम्परा नहीं, अपितु ज्ञान, सकारात्मकता और ईश्वरीय चेतना का प्रतीक है। यह अज्ञान के अन्धकार को दूर कर आशा, प्रकाश और आत्मशक्ति को जाग्रत करती है।
इस पावन अवसर पर गीता परिवार के राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष आदरणीय डॉ. संजय मालपाणी जी एवं अंतरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष आदरणीय डॉ. आशू गोयल जी अपने ओजस्वी आशीर्वचनों से साधकों को भावविभोर कर देते हैं।
आदरणीय आशू भैया जी गुरु–तत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं—
“गुरु वही है, जो शंकाओं का समाधान करे और शिष्य को प्रभु–चरणों से जोड़ दे।”
गुरु–कृपा से जीवन में तेजस्विता आती है। भक्त के लक्षण बताते हुए वे कहते हैं कि जो ममता और अहंकार से रहित, सुख–दुःख में समभावी और क्षमाशील है, वही सच्चा भक्त है। गीता–पाठ से शारीरिक एवं मानसिक विकृतियों का क्षय होता है। वे पूज्य स्वामी गोविन्द देव गिरि जी महाराज के इस संदेश को विशेष रूप से रेखांकित करते हैं—
“सदैव गीता पढ़ें, पढ़ाएँ और जीवन में उतारें।”
आदरणीय संजय मालपाणी भैया जी साधकों को गीता के गूढ़ तत्त्व से परिचित कराते हुए कहते हैं कि धर्मक्षेत्र हमारे भीतर है—कभी मन विजयी होता है, तो कभी बुद्धि। भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जो मन और बुद्धि दोनों उन्हें अर्पित करता है, वही उन्हें प्राप्त करता है। अर्जुन को गीता का उपदेश तब मिला, जब उसने पूर्ण समर्पण किया। भगवान का संदेश है—हर परिस्थिति में समत्व बनाए रखें; बिना समत्व के योग सम्भव नहीं।
गीता, हरि–मुख से निःसृत पावन वाणी है। इसे गाते हुए साधक स्वाभाविक रूप से योग–पथ की ओर अग्रसर होता है। गीता–पाठ में हम भगवान से शत्रु–विनाश की नहीं, बल्कि शत्रु–बुद्धि–विनाश की प्रार्थना करते हैं। दुःख, अशान्ति, क्रोध और नकारात्मकता से मुक्ति के लिए गीता को पढ़ना और जीवन में उतारना अत्यावश्यक है।
गीता परिवार ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ की भावना से निरन्तर कार्यरत है। वरिष्ठ गीता–साधकों द्वारा दी जाने वाली प्रत्यक्षिक प्रस्तुतियाँ नव–साधकों का मनोबल ऊँचा करती हैं। साधक–मनोगत के माध्यम से साधक अपने हृदय के भाव प्रकट करते हैं और अपनी शंकाओं का समाधान पाते हैं। अनेक साधक, जो शारीरिक एवं मानसिक व्याधियों से जूझ रहे थे, अपने अनुभव साझा करते हैं कि किस प्रकार गीता परिवार से जुड़कर उन्होंने स्वास्थ्य, शान्ति और जीवन–संतुलन पुनः प्राप्त किया। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से ओतप्रोत यह परिवार साधकों को एक महान यज्ञ का सहभागी बना देता है।
समारोह का समापन आभार–ज्ञापन एवं हनुमान चालीसा पाठ के साथ होता है। हनुमान चालीसा का पाठ भय, तनाव और नकारात्मकता को दूर कर मानसिक शक्ति, एकाग्रता और आत्मविश्वास को सुदृढ़ करता है तथा साधक को आन्तरिक बल से परिपूर्ण करता है।
मुख्य बिंदु / Takeaways
- गीता परिवार में चार लेवल—भारतीय सांस्कृतिक परम्परा का सशक्त प्रतिबिम्ब।
- दीप–प्रज्ज्वलन: ज्ञान, सकारात्मकता और ईश्वरीय चेतना का प्रतीक।
- गुरु–तत्त्व, समर्पण और समत्व—गीता साधना के मूल आधार।
- गीता–पाठ से मानसिक–शारीरिक विकृतियों का शमन।
- ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ के भाव से प्रेरित एक वैश्विक साधना–यज्ञ।
सदैव गीता पढ़ें, पढ़ाएँ और जीवन में उतारें।






