गीता भाव गीत ~डॉ संजय मालपाणी
तप्त मन जब शुष्क हो हरि नाम का संस्मरण हो। भाव जब निष्पर्ण हो तब भक्ति का अंकुरण हो॥
13 गीता भाव गीत ~डॉ संजय मालपाणी
13 गीता भाव गीत
~ रचना डॉ संजय मालपाणी
तप्त मन जब शुष्क हो
हरि नाम का संस्मरण हो।
भाव जब निष्पर्ण हो तब
भक्ति का अंकुरण हो॥
शत्रुता मन में घिरे जब
मैत्री मंगल स्मरण हो।
धर्म का विस्मरण हो तब
कृष्ण का अवतरण हो॥
क्रोध की ज्वाला जले जब
सजगता से तरण हो।
मोह का आवरण हो तब
पार्थ सा जागरण हो॥
अभय से अंतर जगे जो
भयक्रांत मन संकीर्ण हो।
अज्ञान का जब तम घनेरा
ज्ञान रवी अवतीर्ण हो॥
जब कामना का ज्वर उठे
और लोभ का अभिसरण हो,
संयमन का ले सहारा
शुद्ध अंतःकरण हो॥
मृत्यु जब नर्तन करे
अमृत सुधा का वरण हो।
दंभ दानव घेर ले तब
दिव्य दैवी शरण हो॥
अभिमान का विष दंश हो तब
हृदय में श्री चरण हो
मन करे सुमिरन सदा
और दर्प का संहरण हो॥
असत् की अवधारणा पर
सत्य का अवतरण हो।
तमस् के वातावरण में
ज्योति रश्मि किरण हो॥
धर्म का विस्मरण हो तब कृष्ण का अवतरण हो॥