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गीता मैत्री
— ४४
डॉ.आशू गोयल
डॉ.आशू गोयल
अग्रदूतों के मन की बात

संपादकीय: गीता युग का उदय

संगमनेर की पावन धरा से प्रस्फुटित हुई एक लघु सरिता आज 'ज्ञान-गंगा' बनकर विश्व पटल पर प्रवाहित हो रही है।

भारत की सनातन संस्कृति केवल रीति-रिवाजों का संकलन नहीं, अपितु जीवन-मूल्यों का एक जीवंत दर्शन है। हमारे इतिहास की धमनियों में त्याग, सेवा और धर्मनिष्ठा का रक्त प्रवाहित होता रहा है। किंतु, आधुनिकता की अंधी दौड़ और भौतिकता के कोलाहल में कहीं न कहीं हम अपनी जड़ों से विस्मृत होते गए। सुख की मृगतृष्णा में भटकती मानवता के लिए आज 'गीता परिवार' एक सांस्कृतिक ध्रुवतारे के समान पथ-प्रदर्शक बनकर उभरा है।

"राष्ट्र का निर्माण ईंट-पत्थरों से नहीं, बल्कि नागरिकों के चरित्र से होता है।"

इसी मूलमंत्र को केंद्र में रखकर गीता परिवार के हजारों निष्ठावान स्वयंसेवक 'बाल-संस्कार' के महत कार्य में संलग्न हैं। वे भली-भांति जानते हैं कि आज के सुसंस्कृत बालक ही कल के सशक्त भारत की नींव होंगे। खेल, मनोरंजन और रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से नई पीढ़ी के मानस पटल पर नैतिक मूल्यों का बीजारोपण करना एक भगीरथ प्रयास है, जो देश के कोने-कोने में 'सम्यक् आकार' ले रहा है।

संकट में सृजन: डिजिटल अध्यात्म का उदय

वर्ष 2020 का वह कालखंड जब संपूर्ण विश्व कोरोना की विभीषिका से स्तब्ध था, तब गीता परिवार ने आपदा को अवसर में बदलते हुए एक नूतन दिशा की ओर कदम बढ़ाए। वह क्षण किसी सघन वन की नीरवता में गूँजती कृष्ण की बाँसुरी के समान था। ऑनलाइन माध्यम से गीता सिखाने का निर्णय एक साहसिक प्रयोग था। संशय था कि क्या डिजिटल पटल पर संस्कृत की क्लिष्टता और साधकों की एकाग्रता का सामंजस्य हो पाएगा? किंतु, जिज्ञासा की लौ ऐसी प्रज्वलित हुई कि दो हजार से शुरू हुई यह यात्रा आज 14 लाख से अधिक साधकों के विशाल परिवार में परिवर्तित हो चुकी है।

परम पूज्य गुरुदेव का पावन उद्घोष— “गीता पढ़ें, पढ़ायें, जीवन में लायें” —आज एक वैश्विक जन-आंदोलन बन चुका है। डॉ. आशू गोयल जी के नेतृत्व में तकनीक और अध्यात्म का जो मणिकांचन योग बना, उसने व्हाट्सएप और ज़ूम जैसे माध्यमों को 'स्वाध्याय की पाठशाला' बना दिया।

विस्तार और प्रभाव

भाषाई सेतु: तीन भाषाओं से आरंभ होकर आज यह अभियान अनेक क्षेत्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में अनुदित हो चुका है।

अनुशासित पाठ्यक्रम: चार स्तरीय व्यवस्थित पाठ्यक्रम, व्याकरण कक्षाएं और कंठस्थीकरण की योजना ने गीता सीखने को सुगम और वैज्ञानिक बना दिया है।

मानवीय दृष्टिकोण: जेल के बंदियों तक गीता का प्रकाश पहुँचाना समाज के अंतिम व्यक्ति के पुनरुद्धार की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। यह सिद्ध करता है कि गीता केवल सन्यासियों के लिए नहीं, बल्कि संघर्षरत हर व्यक्ति के लिए संजीवनी है।

आज जब विश्व वैचारिक द्वंद्व और अस्थिरता से जूझ रहा है, तब श्रीमद्भगवद्गीता का निष्काम कर्मयोग ही स्थायी शांति का मार्ग है। आलोचक भले ही इसे कलियुग की संज्ञा दें, किंतु गीता परिवार के पुरुषार्थ ने इसे 'गीता युग' में परिवर्तित कर दिया है—एक ऐसा युग जहाँ ज्ञान, भक्ति और कर्म का त्रिवेणी संगम हो रहा है।

“हर घर गीता, हर कर गीता” केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक क्रांति का शंखनाद है। यह संगठन की शक्ति नहीं, बल्कि समर्पण की पराकाष्ठा है। यहाँ जुड़ने वाला हर साधक मात्र एक 'यूजर' नहीं, बल्कि इस आध्यात्मिक चेतना का अभिन्न अंग है।

४० वर्षों की इस यात्रा का सिंहावलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि गीता परिवार अब एक संस्था मात्र नहीं, बल्कि एक जागृत चेतना है, जो 'वसुधैव कुटुंबकम्' के भाव को चरितार्थ कर रही है।

यह नवजागरण का उदय है। यह गीता युग है। और इस मशाल को थामे रखना हम सबका साझा उत्तरदायित्व है।

किंतु, जिज्ञासा की लौ ऐसी प्रज्वलित हुई कि दो हजार से शुरू हुई यह यात्रा आज 14 लाख से अधिक साधकों के विशाल परिवार में परिवर्तित हो चुकी है।

1986स्थापना वर्ष
14 लाख से अधिकसाधक