- चेन्नई, 27 जुलाई 2025
- एक हज़ार से अधिक तमिल गीता साधकों
- कर्नाटक 2.0, 14 दिसम्बर 2025
- तीन हज़ार से अधिक गीता साधकों
- राँची
- राँची | 7 दिसम्बर 2025
- चिंतनिका सत्र
- प्रत्येक एकादशी
गीता मैत्री मिलन चिंतनिका सत्र
27 जुलाई 2025 को चेन्नई में आयोजित गीता मैत्री मिलन एक आध्यात्मिक रूप से उत्थानकारी और स्मरणीय अनुभव बन गया।

संकट से संस्कार तक: एक परिवार की जीवंत अनुभूति
लर्न गीता कक्षाओं का प्रारम्भ उस समय हुआ, जब समूचा विश्व कोरोना जैसी विकट परिस्थितियों से जूझ रहा था। उस कठिन कालखंड में, व्यक्तिगत संघर्षों और अनिश्चितताओं के बीच, हमें एक ऐसा परिवार प्राप्त हुआ—जो प्रारम्भ में किसी कल्पना से कम प्रतीत नहीं होता था।
गीता मैत्री उसी भाव का साकार रूप है, जिसके माध्यम से हम उन दीदी-भैयाओं से प्रत्यक्ष मिल सके, जो हमारे कठिन समय में हमारे साथ खड़े रहे। यह मिलन केवल पुनःभेंट नहीं, बल्कि कृतज्ञता, आत्मीयता और साझा साधना का उत्सव था।
मुख्य झलक
गीता मैत्री—जहाँ साधना ने संबंध बनाए और संबंधों ने परिवार का रूप लिया।
गीता मैत्री मिलन, चेन्नई: एक अविस्मरणीय अध्याय
Link: https://www.youtube.com/live/2om_v_6OE64





27 जुलाई 2025 को चेन्नई में आयोजित गीता मैत्री मिलन एक आध्यात्मिक रूप से उत्थानकारी और स्मरणीय अनुभव बन गया। इस अवसर पर एक हज़ार से अधिक तमिल गीता साधकों का एक साथ एकत्रित होना, स्वयं में एक ऐतिहासिक क्षण था।
इस पावन संगम में श्रीमद्भगवद्गीता के समस्त अठारह अध्यायों का महामहिम पाठ, क्षमा-याचना सहित सम्पन्न हुआ। यह वातावरण साधकों के लिए न केवल उत्साहवर्धक, अपितु अंतःकरण को स्पर्श करने वाला और स्फूर्तिदायक सिद्ध हुआ।
PULL-QUOTE
“जब एक साथ गीता का पाठ होता है, तब साधना सामूहिक चेतना बन जाती है।”
गीता प्रत्याशिक के अंतर्गत आयोजित विविध प्रतियोगिताओं ने सभा में उल्लास और सहभागिता का रंग भर दिया, जिनका दर्शकों ने भरपूर आनंद लिया। मंदिर परिसर और पवित्र ग्रंथ की दिव्य ऊर्जा ने सभी उपस्थित साधकों को अपार शांति और आनंद का अनुभव कराया। सभी भक्तों का उत्साह और ऊर्जा अनुकरणीय थी; साथ ही, सुहावने मौसम ने इस मिलन को और भी सौम्य बना दिया।
प्रेरक बिंदु
जहाँ श्रद्धा, अनुशासन और आनंद एक साथ हों—वहीं सच्चा उत्सव जन्म लेता है।
प्रेरक विचार और दिशा
आदरणीय आशु भैया के गहन और विचारोत्तेजक “बूँद से सागर” विषयक उद्बोधन ने सभा को एक स्पष्ट दिशा प्रदान की। उनका यह कथन विशेष रूप से साधकों के हृदय में उतर गया—
“हम तमिल, हिंदी, गुजराती, बांग्ला या तेलुगु नहीं हैं; हम सर्वप्रथम सनातनी हिन्दू हैं, और हमें इसी भाव के आधार पर एकजुट होना है।”
इस विचार पर व्यापक चर्चा हुई और साधकों ने इसका हृदय से समर्थन किया।
PULL-QUOTE
“पहचान भाषा से नहीं, सनातन संस्कार से बनती है।”
आदरणीय हरि काकाजी के भावपूर्ण और प्रेरणादायी शब्दों ने भी सभा को गहराई से स्पर्श किया। उन्होंने केंद्रीय टीम–11 के गठन की घोषणा की तथा तमिलनाडु भर में गीता परिवार की ऑफ़लाइन गतिविधियों के विस्तार हेतु नौ ज़िलों में टीम–11 के गठन की महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। यह घोषणा गीता परिवार के संगठनात्मक विस्तार की दिशा में एक सशक्त कदम सिद्ध हुई।
मुख्य संदेश
संगठन तभी सशक्त होता है, जब साधना के साथ संरचना भी सुदृढ़ हो।
संगीत, साधना और सौहार्द
हमारी प्रिय तीन दीदियाँ—ज्योति दीदी, रूपल दीदी और कविता दीदी—के संगीतमय गीता पारायण ने समस्त वातावरण को भाव-विभोर कर दिया। यह अनुभव केवल श्रवण का नहीं, बल्कि अंतःकरण को स्पर्श करने वाला एक दिव्य क्षण बन गया। उनके इस अनुपम योगदान के लिए समस्त साधकों की ओर से हृदय से कृतज्ञता व्यक्त की गई।
गुरुजी का आशीर्वाद प्राप्त कर उपस्थित सभी साधक स्वयं को अत्यंत धन्य अनुभव कर रहे थे। इस मिलन के समापन पर यह सामूहिक संकल्प लिया गया कि इस गति को बनाए रखते हुए, मिलकर गीता परिवार की गतिविधियों को तमिलनाडु के प्रत्येक कोने तक पहुँचाया जाएगा।
आह्वान
गीता मैत्री केवल एक आयोजन नहीं—
यह संबंधों की साधना है।
यह उन सभी के लिए आमंत्रण है,
जो गीता को पढ़ना ही नहीं,
जीना और आगे बढ़ाना चाहते हैं।
आइए—इस परिवार का हिस्सा बनें।
ऐतिहासिक गीता मैत्री मिलन कर्नाटक 2.0
Link - https://www.youtube.com/live/L3Fnr-EP6IE?t=7294
आश्चर्य से अनुभूति तक : साधना, संगठन और संकल्प का विराट संगम
(14 दिसम्बर 2025)
आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनम्,
आश्चर्यवद् वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच् चैनमन्यः शृणोति,
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्॥
14 दिसम्बर 2025 का दिन भगवान् श्रीकृष्ण के इस वचन का सजीव साक्षी बना। मैसूर, कर्नाटक स्थित गणपति सच्चिदानंद आश्रम में सम्पन्न गीता मैत्री मिलन कर्नाटक 2.0 ने साधना, संगठन और संकल्प—तीनों के अद्भुत समन्वय को साकार रूप में प्रस्तुत किया।
लगभग दो सौ पचास कन्नड़ कार्यकर्ताओं के सतत, निष्ठापूर्ण परिश्रम से आयोजित इस महायोजन में तीन हज़ार से अधिक गीता साधकों तथा एक सौ गीताव्रती विचक्षणों की सहभागिता ने सभी को विस्मय-विमुग्ध कर दिया। कार्यकर्ताओं के इस प्रचण्ड पुरुषार्थ को देखकर परम पूज्य गणपति सच्चिदानंद स्वामीजी अत्यंत भावविभोर एवं प्रसन्न हुए।
मुख्य झलक
जहाँ साधना में संगठन जुड़ता है, वहाँ इतिहास रचता है।
संगीत के प्रति विशेष अनुराग के कारण, कार्यक्रम में पूजा भाभी, ज्योति दीदी तथा रूपल दीदी द्वारा प्रस्तुत गीता का संगीतमय पारायण स्वामीजी के लिए विशेष आनंद और आश्चर्य का विषय बना। इस अनुपम साधना को देखकर उन्होंने सहर्ष उद्घोष किया—
“यह आपका अपना ही आश्रम है। आप यहाँ भविष्य के सभी प्रकल्प सम्पन्न कर सकते हैं।”
यह वचन गीता परिवार के लिए आशीर्वाद और उत्तरदायित्व—दोनों का प्रतीक बन गया।
हमारे प्रेरणास्रोत परम पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरी जी महाराज के आशीर्वचनों से सभी कार्यकर्ताओं के मुखमण्डल आनंद और कृतज्ञता से दीप्त हो उठे।
PULL-QUOTE
“जब गुरु की कृपा और साधकों का पुरुषार्थ एक हो जाए, तब असंभव भी संभव बन जाता है।”
गीता परिवार के अंतरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष डॉ. आशु गोयल जी का प्रबोधन सीधे अंतर्मन को स्पर्श करता प्रतीत हुआ, मानो वे प्रत्येक जिज्ञासु को उसके आध्यात्मिक पथ का बोध करा रहे हों। उन्होंने गीता के वैश्विक विस्तार के सूत्रों को इतनी आत्मीयता से पिरोया कि प्रत्येक साधक का हृदय आलोकित हो उठा।
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री हरिनारायण व्यास जी ने अपने वात्सल्यपूर्ण और सारगर्भित शब्दों में गीता परिवार की यात्रा, बाल संस्कार केंद्रों की निरंतर बढ़ती व्याप्ति तथा कर्नाटक टीम के असाधारण पुरुषार्थ का प्रभावी चित्रण किया।
प्रेरक बिंदु
साधना जब संस्कार से जुड़ती है, तब पीढ़ियाँ दिशा पाती हैं।
इस अवसर पर गीता को “मथने” की प्रक्रिया का एक विलक्षण प्रत्यक्षिक भी सभी साधकों ने देखा। श्लोकांक, श्लोकार्थ, समान शब्द, स्वराक्षरी, समान चरण, गीता अंत्याक्षरी तथा विविध उपक्रमों का ऐसा समन्वित प्रदर्शन गीता-प्रेमियों के लिए विस्मयकारी अनुभव बन गया।
कर्नाटक गीता परिवार की अध्यक्षा श्रीमती संतोष सोमानी जी के मार्गदर्शन और सहयोग से इस भव्य आयोजन की सफलता का श्रेय समस्त निष्ठावान, कर्मठ कार्यकर्ताओं को जाता है। विशेष रूप से श्रीनाथ जी, जिन्होंने अहर्निश परिश्रम कर समर्पण का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया।
उनके साथ-साथ सुरेश जी, सीमा जी, वेंकट जी, राधा जी, पूजा जी, तेजस भैया, राधाकृष्णन जी, वीणा जी, सुधा जी, सरस्वती जी, ऊषा जी, जयकुमार जी, गायत्री जी तथा प्रत्येक स्वयंसेवक—सभी की सतत सेवा ने इस मिलन को वास्तव में ऐतिहासिक बना दिया।
मुख्य संदेश
गीता मैत्री मिलन केवल आयोजन नहीं, साधकों के संकल्पों की माला है।
गीता मैत्री मिलन की श्रृंखला में यह कार्यक्रम एक अनमोल मणि के समान सुशोभित होगा। पूज्य स्वामीजी की कृपा से अब तक चल रहा ऑफ़लाइन कार्य शीघ्र ही और भी व्यापक स्तर पर प्रारम्भ होगा—ऐसा दृढ़ विश्वास इस आयोजन ने सभी के हृदय में स्थापित कर दिया है।
समस्त बन्धु-भगिनी कार्यकर्ताओं को उत्तम नियोजन, समर्पण और सेवाभाव हेतु अनेकानेक साधुवाद और हार्दिक शुभकामनाएँ।
झारखण्ड गीता मैत्री मिलन
Link: https://www.youtube.com/live/QbBg0jq4Fj0?si=oJBmbynlWRo0tgBC
एक दिव्य, सुवासित आध्यात्मिक पर्व
राँची | 7 दिसम्बर 2025
राँची विश्वविद्यालय के आर्यभट्ट सभागार में उस दिन एक अद्भुत और दुर्लभ दृश्य उपस्थित था। मानो अध्यात्म की अजस्र धारा स्वयं मूर्त रूप धारण कर प्रवाहित हो रही हो। झारखण्ड के विविध जिलों से पधारे साधकों का विशाल समुदाय किसी तीर्थ की श्रद्धा-लहरियों की भाँति उमड़ पड़ा था। सम्पूर्ण वातावरण श्रीमद्भगवद्गीता के शाश्वत संदेश से सुवासित हो उठा।
यह गीता मैत्री मिलन केवल एक आयोजन नहीं था, अपितु मनोजगत में प्रज्वलित होने वाला वह दीपक था, जिसे देखते ही आत्मा में सौम्य जिज्ञासा, श्रद्धा और साधना का आलोक जाग्रत हो जाता है।
इस दिव्य अवसर की शोभा बढ़ाने हेतु गीता परिवार के राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष डॉ. संजय मालपाणी भैया तथा पूर्वांचल उपाध्यक्ष आशा साबू दीदी की मंगल उपस्थिति रही। उनकी उपस्थिति सभा के लिए मानो तेजस्वी सूर्य और शांत चन्द्रमा का सौम्य संयोग बन गई।
अपने प्रेरक संदेश में संजय भैया ने कहा—
“श्रीमद्भगवद्गीता जीवन को नई दृष्टि देती है—चुनौतियों में स्थिरता, संबंधों में समत्व और कर्म में दक्षता।”
उनके शब्द श्रोताओं के हृदय में इस प्रकार उतरे, जैसे किसी पथिक को उसके जीवन-मार्ग की दिशा पुनः स्मरण हो आई हो।
आशा दीदी ने Learn Geeta की वैश्विक गतिविधियों, बाल संस्कार अभियान, युवा मार्गदर्शन तथा झारखण्ड टीम के अथक पुरुषार्थ का भावपूर्ण वर्णन किया। उनके शब्दों में ऐसी स्नेहिल उष्मा थी, मानो कोई माँ अपने संस्कारों से पुष्ट होते परिवार को गर्वपूर्वक निहार रही हो।
मुख्य अतिथि के रूप में बंगाल से पधारे संदीप सोमानी भैया एवं अशोक साबू भैया की गरिमामयी उपस्थिति ने इस आयोजन को एक नया आयाम प्रदान किया।
इस समागम का सर्वाधिक मधुर और हृदयस्पर्शी क्षण था संगीतमय गीता पारायण।
ज्योति शुक्ला दीदी एवं कविता वर्मा दीदी द्वारा प्रस्तुत पारायण ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो स्वयं वेदगान की दिव्य ध्वनियाँ सभा-मंडप में अवतरित हो गई हों।
योग प्रस्तुति, गीता प्रात्यक्षिक, बालकों की सांस्कृतिक झलकियाँ, गीता ग्रंथ स्टॉल, सुरम्य रंगोली एवं पुष्पवर्षा—इन सभी उपक्रमों ने पूरे परिसर को एक जीवंत आध्यात्मिक उत्सव में परिवर्तित कर दिया।
इस भव्य आयोजन की सफलता का आधार बना झारखण्ड गीता परिवार की टीम का लगभग डेढ़ महीने तक चला अथक पुरुषार्थ। सौ से अधिक स्वयंसेवकों की श्रम-ज्योति ने इस पर्व को अपनी उज्ज्वल लौ प्रदान की।
प्रमुख सहयोगियों में ऊषा दीदी, प्रीति दीदी, वेंकटरमण भैया, रीता दीदी, भरत भैया, संदीप भैया, रिचा दीदी, रेणु दीदी, वीणा दीदी, मंजू दीदी, अभय मिश्रा भैया, शामसुंदर भैया, अल्पना दीदी, शेफाली दीदी, विमलेंद्र भैया, अपर्णा दीदी, डी. एन. भैया, अमरनाथ भैया सहित अनगिनत कार्यकर्ताओं का निष्ठापूर्ण परिश्रम उस नींव-पत्थर के समान रहा, जो दिखाई भले न दे, पर सम्पूर्ण संरचना को दृढ़ता प्रदान करता है।
यह गीता मैत्री मिलन झारखण्ड में गीता परिवार के प्रत्यक्ष कार्यारम्भ का ऐतिहासिक दीप-जागरण बन गया। समस्त साधकों ने एक स्वर में यह संकल्प लिया—
“गीता पढ़ें, पढ़ाएँ और जीवन में लाएँ।”
पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरी जी महाराज की अनुकम्पा, पूर्वांचल प्रमुख आशा दीदी, अशोक भैया तथा गीता परिवार के वरिष्ठ मार्गदर्शकों का संकल्प इस आयोजन की सिद्धि का सेतु बना।
हम सभी के आदरणीय आशु भैया का सूक्ष्म मार्गदर्शन तथा रूपल दीदी का सुयोजित नियोजन इस सम्पूर्ण कार्यक्रम के लिए दीपस्तम्भ सिद्ध हुआ।
समस्त साधकों और कार्यकर्ताओं को श्रद्धापूर्वक नमन।
चिंतनिका सत्र
गीता परिवार के माध्यम से आध्यात्मिक चिंतन और निष्काम भक्ति का अनुभव
मुख्य संदेश:
गीता परिवार द्वारा संचालित चिंतनिका सत्र साधकों को श्रीमद्भगवद्गीता के शुद्ध पठन, गहन चिंतन और निष्काम भक्ति में निर्देशित करता है।
परम पूज्य स्वामी श्री गुरु गोविंद देवगिरी जी महाराज के प्रेरक मार्गदर्शन में, गीता परिवार ने गीता जी के ७०० श्लोकों का शुद्ध उच्चारण सीखने हेतु ऑनलाइन कक्षाओं की व्यवस्था की है।
साधक जब समस्त अध्यायों का अध्ययन पूर्ण कर लेते हैं और गीता जी को कंठस्थ कर लेते हैं, तो उन्हें यह प्रश्न आता है—
“अब इसे कैसे समझें और अपने जीवन में कैसे उतारें?”
इसी भाव को जीवन में लाने हेतु आयोजित किया जाता है चिंतनिका सत्र, जो साधक के हृदय में आध्यात्मिक जागृति और गीता की निष्काम भक्तिका संचार करता है।
सत्र का उद्देश्य
चिंतनिका सत्र का प्रमुख लक्ष्य है समस्त विश्व में आध्यात्मिक जागृति का प्रसार।
यह दिव्य प्रयास गीता परिवार द्वारा जगाई गई अलौकिक अलख है, जो साधकों को चिंतन और भक्ति के मार्ग पर अग्रसर करता है।
Pull-quote 1:
“चिंतनिका सत्र साधक के हृदय में गीता के शिक्षापथ को जीवंत कर देता है।”
चिंतनिका सत्र कैसे संचालित होता है?
• सत्र प्रत्येक एकादशी के पावन अवसर पर रात्रि ९ बजे से १० बजे तक झूम प्लेटफ़ॉर्म पर आयोजित किया जाता है।
• पूरे १८ अध्यायों का पठन एवं चिंतन ६ भागों में विभाजित किया जाता है।
o प्रत्येक एकादशी में तीन अध्यायों का पठन और तीन अध्यायों का चिंतन होता है।
o छः सत्रों के माध्यम से पूरा पारायण सम्पन्न होता है।
• गीताव्रती साधक पठन और चिंतन के माध्यम से श्रीमद्भगवद्गीता के समस्त अध्यायों में निष्काम भक्ति का अनुभव करते हैं।
• प्रत्येक अध्याय का चिंतन केवल ५ मिनट में समेटना कठिन कार्य है; फिर भी साधकों द्वारा किया गया यह कार्य अत्यंत सराहनीय है।
Pull-quote 2:
“साधक पठन और चिंतन में तल्लीन होते ही गीता का सार उनके हृदय में अंकित हो जाता है।”
• प्रत्येक तीन अध्याय में से एक अध्याय का चिंतन क्षेत्रीय भाषा में किया जाता है, जिससे सभी साधक सहजता से जोड़ सकें।
• झूम सदन में १०००+ गीता प्रेमी साधक उपस्थित रहते हैं।
• सोशल मीडिया और यू ट्यूब के माध्यम से हज़ारों साधक भी इस दिव्य आयोजन का लाभ उठाते हैं।
• जुलाई से दिसंबर तक के ६ महीनों में, १२ सत्रों में, ३६ साधकों द्वारा पठन और ३६ साधकों द्वारा चिंतन किया गया।
• १२ सत्रों में से ८ सत्रों में एक अध्याय का चिंतन क्षेत्रीय भाषा में सम्पन्न हुआ।
Pull-quote 3:
“चिंतनिका सत्र केवल ज्ञान नहीं, बल्कि अनुभव और भक्ति की यात्रा है।”
सूक्ष्म आह्वान
इस दिव्य सत्र में भाग लेकर आप:
• गीता के संदेश को जीवन में उतार सकते हैं।
• आध्यात्मिक जागृति का अनुभव कर सकते हैं।
• निष्काम भक्ति के मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं।
आप भी इस पुण्य सत्र से जुड़ें और अपने जीवन को सार्थक बनाएं।
श्रीमद्भगवद्गीता जीवन को नई दृष्टि देती है—चुनौतियों में स्थिरता, संबंधों में समत्व और कर्म में दक्षता।




