- इक्तालीसवाँ शुभारम्भ समारोह, 18 जुलाई
- पचहत्तर देशों से लगभग चालीस हज़ार गीताप्रेमी साधकों
- बयालीसवाँ शुभारम्भ समारोह, पाँच सितम्बर
- बानवे देशों से लगभग सत्तर हज़ार गीताप्रेमी साधकों
- तैंतालीसवाँ शुभारम्भ समारोह, इकतीस अक्टूबर
- अस्सी देशों से चालीस हज़ार से अधिक गीताप्रेमी साधकों
- चौवालीसवाँ शुभारम्भ, उन्नीस दिसम्बर
- पंचानबे देशों के पचास हज़ार से अधिक गीताप्रेमी
L1 उद्घाटन समारोह
पिछले छह महीनों में स्तर एक के चार वर्गों का शुभारम्भ हुआ।

घर-घर गीता : एक वैश्विक संकल्प की साकार यात्रा
परम पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरी जी महाराज का दिव्य उद्घोष—
“घर-घर गीता, हर कर गीता”—
आज विश्व के अनेक देशों में जीवंत अनुभूति बनकर प्रकट हो रहा है। स्तर एक से जुड़ते साधकों की निरंतर बढ़ती संख्या इस तथ्य की साक्षी है कि गीता अब केवल ग्रंथ नहीं, जीवन-मार्गदर्शक बन चुकी है।
पिछले छह महीनों में स्तर एक के चार वर्गों का शुभारम्भ हुआ। साधकों ने प्रथम चरण पूर्ण कर स्तर दो, फिर क्रमशः स्तर तीन और चार तक प्रगति की—श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों का पाठ, मनन, स्मरण और आत्मसात करते हुए। जुलाई से दिसंबर तक सभी स्तरों की तीन-तीन टुकड़ियों के शुभारम्भ समारोह श्रद्धा और सामूहिक संकल्प के साथ सम्पन्न हुए।
परम पूज्य स्वामी जी के मार्गदर्शन में गीता परिवार का उद्देश्य केवल आरम्भ कराना नहीं, बल्कि साधकों की साधना को स्थायी और सुदृढ़ बनाना है। इसी भाव से भारत के प्रतिष्ठित सनातन मठों से ईश्वर-समर्पित, ओजस्वी साधु-संतों का सान्निध्य साधकों को प्राप्त होता है—जो इस यात्रा को परंपरा, प्रेरणा और आशीर्वाद से समृद्ध करता है।
यह केवल एक कार्यक्रम नहीं, जीवन की दिशा है।
जो भी अपने जीवन में स्पष्टता, संतुलन और उद्देश्य की खोज में हैं, उनके लिए गीता-पथ का द्वार खुला है।
आह्वान:
आइए—इस वैश्विक साधना का अंग बनें।

इक्तालीसवाँ शुभारम्भ समारोह
गीता-पथ पर वैश्विक सहभागिता का एक और सशक्त चरण
18 जुलाई को सम्पन्न इक्तालीसवाँ शुभारम्भ समारोह गीता-पथ की यात्रा में एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायी अध्याय के रूप में अंकित हुआ। इस पावन अवसर पर पूज्य स्वामी अनंतदास जी महाराज (इस्क्कोन, मुंबई) का विशेष अतिथि के रूप में सान्निध्य प्राप्त होना साधकों के लिए अत्यंत सौभाग्य का विषय रहा। इस वर्ग में पचहत्तर देशों से लगभग चालीस हज़ार गीताप्रेमी साधकों का जुड़ना, इस तथ्य का सशक्त प्रमाण है कि गीता आज वैश्विक चेतना का केंद्र बन रही है।
मुख्य झलक
गीता अध्ययन अब सीमाओं में बँधा अभ्यास नहीं, विश्वव्यापी साधना बन चुका है।
पूज्य स्वामी अनंतदास जी महाराज का जीवन स्वयं गीता के कर्मयोग का सजीव उदाहरण है। अल्पायु से ही ईश्वर-चिंतन में रत स्वामीजी को परम पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरी जी महाराज के प्रति अपार श्रद्धा प्राप्त है। कंप्यूटर विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट और वेरिटास जैसे प्रतिष्ठित संगठनों में कार्य किया, किंतु राष्ट्र और समाज के प्रति गहन उत्तरदायित्व-बोध ने उन्हें सांसारिक उपलब्धियों से विरक्त कर मानवता-सेवा के पथ पर अग्रसर कर दिया।
प्रेरक बिंदु
गीता का पथ केवल अध्ययन नहीं, सेवा और उत्तरदायित्व का जीवन-दर्शन है।
स्वामी अनंतदास जी महाराज के विचार
अपने उद्बोधन में स्वामीजी ने साधकों का ध्यान एक गहन दार्शनिक सत्य की ओर आकृष्ट किया। उन्होंने बताया कि आज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर Mindfulness, कर्तृत्व-बोध और कर्ता कौन है जैसे विषयों पर व्यापक विमर्श हो रहा है। हाल ही में सिंगापुर में आयोजित एक गोष्ठी में चीनी दर्शन की तुलना भारतीय गीता-विज्ञान से की गई।
स्वामीजी ने स्पष्ट किया कि चाहे वह लाओत्से हों, बौद्ध दर्शन हो अथवा कोई अन्य बौद्धिक परंपरा—जिन प्रश्नों पर आधुनिक विश्व आज मंथन कर रहा है, उनके सुस्पष्ट उत्तर श्रीभगवान ने सहस्रों वर्ष पूर्व श्रीमद्भगवद्गीता में प्रदान कर दिए हैं। उन्होंने साधकों को हृदयपूर्वक बधाई दी कि वे अपनी क्षमता और सुविधा के अनुसार गीता को कंठस्थ कर रहे हैं, परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर रहे हैं और साधनामार्ग पर दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ रहे हैं।
PULL-QUOTE
“आज जिन सत्यों को विश्व खोज रहा है, वे गीता में पहले से ही प्रकाशित हैं।”
स्वामीजी ने वर्तमान समाज में विकसित हो रही हाइप-संस्कृति पर भी विचार प्रकट किए, जिसमें गीता के शाश्वत तत्त्वों को नए नाम देकर पश्चिमी उद्गम का बताया जाता है। कोई उन्हें बौद्ध दर्शन से जोड़ता है, कोई ईसाई परंपरा से—जबकि इन सभी का मूल स्रोत गीता और वैदिक शास्त्र ही हैं।
पाश्चात्य जगत में इस प्रवृत्ति को आज की भाषा में डाइजेशन कहा जा रहा है—
हमारे ही तत्त्व लेकर, उन्हें नए नामों से हमें ही प्रस्तुत किया जा रहा है।
PULL-QUOTE
“अपने शास्त्रों को जानना ही बौद्धिक आत्मसम्मान की पहली शर्त है।”
स्वामी अनंतदास जी महाराज के ये विवेकपूर्ण, मार्गदर्शक और समयसापेक्ष विचार सभी साधकों के हृदय को गहराई से स्पर्श कर गए। यह समारोह केवल एक औपचारिक शुभारम्भ नहीं रहा, बल्कि साधकों के भीतर गीता-पथ पर और अधिक दृढ़ता, गर्व और संकल्प को जाग्रत करने वाला अनुभव बन गया।
आह्वान
गीता का यह वैश्विक प्रवाह उन सभी को आमंत्रित करता है, जो जीवन में
स्पष्टता, स्थिरता और सार्थकता की खोज में हैं।
आइए—इस चेतना-यात्रा का अंग बनें।
बयालीसवाँ शुभारम्भ समारोह
गीता-पथ का विश्वव्यापी विस्तार : एक ऐतिहासिक कीर्तिमान
पाँच सितम्बर को सम्पन्न बयालीसवाँ शुभारम्भ समारोह गीता-पथ की यात्रा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। इस नवीन वर्ग ने वैश्विक स्तर पर एक अभूतपूर्व कीर्तिमान स्थापित किया।
बानवे देशों से लगभग सत्तर हज़ार गीताप्रेमी साधकों का इस वर्ग से जुड़ना इसे विश्व की अब तक की सबसे बड़ी गीता कक्षा के रूप में स्थापित करता है।

मुख्य झलक
गीता अध्ययन अब व्यक्तिगत साधना नहीं, वैश्विक चेतना का उत्सव बन चुका है।
इस सौभाग्यपूर्ण अवसर पर पूज्य श्री श्री सुगुणेन्द्र तीर्थ स्वामी जी महाराज,
मध्वपीठाधिपति — श्री पुतिगे मठ, उडुपि,
का पावन सान्निध्य साधकों के लिए विशेष प्रेरणा का स्रोत बना।
स्वागत-वक्तव्य में परम पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरी जी महाराज ने कहा कि जब भी आदर्श महापुरुषों की चर्चा होती है, तो पूज्य सुगुणेन्द्र तीर्थ स्वामी जी महाराज का नाम स्वतः स्मरण में आता है। वे भगवान उडुपी श्रीकृष्ण की अखण्ड सेवा के साथ-साथ कोटि श्रीमद्भगवद्गीता लेखन महायज्ञ के माध्यम से भावी पीढ़ियों को गीता से जोड़ने का विराट कार्य कर रहे हैं।
PULL-QUOTE
“सेवा और साधना जब एक हो जाएँ, तब परंपरा भविष्य का मार्ग बनाती है।”
पूज्य स्वामी जी का जीवन स्वयं एक जीवंत प्रेरणास्रोत है। बारह वर्ष की अल्पायु में संन्यास-दीक्षा प्राप्त कर उन्होंने वर्षों तक गहन शास्त्राध्ययन किया और शिक्षा, संस्कार, सेवा तथा संस्कृति के क्षेत्र में अद्भुत योगदान दिया।
कोटि गीता लेखन महायज्ञ के अंतर्गत लाखों हाथों से लिखी गई गीता-प्रतियाँ उडुपी श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित होकर पुनः प्रसाद और प्रशस्ति-पत्र सहित घर-घर पहुँच रही हैं—जिससे प्रत्येक गृह मंदिर का स्वरूप ग्रहण कर रहा है।
प्रेरक बिंदु
जब गीता घर में प्रवेश करती है, तब जीवन में संस्कार स्वतः प्रतिष्ठित होते हैं।
पूज्य श्री श्री सुगुणेन्द्र तीर्थ स्वामी जी महाराज के विचार
अपने आशीर्वचनों में पूज्य सुगुणेन्द्र तीर्थ स्वामी जी महाराज ने गीता परिवार द्वारा की जा रही मानवता-सेवा की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि जैसे श्रीकृष्ण ने गोवर्धन धारण कर ग्रामवासियों की रक्षा की, वैसे ही परम पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरी जी महाराज परिवारों और समाज की रक्षा का दायित्व निभा रहे हैं।
स्वामी जी ने यह भी कहा कि वे सनातन के कल्याण हेतु उत्तर और दक्षिण को जोड़ने वाले सेतु का निर्माण कर रहे हैं। सनातन परंपरा की यह मान्यता रही है कि उत्तर भारत में भगवान विराजते हैं और दक्षिण भारत में उनकी सेवा करने वाले आचार्य। इस आध्यात्मिक संतुलन को सुदृढ़ करना आज के समय की आवश्यकता है।
PULL-QUOTE
“गीता का प्रचार स्वयं श्रीभगवान को अत्यंत प्रिय है।”
स्वामी जी ने यह भावपूर्ण उद्घोष किया कि जो गीता का प्रचार करता है, वह श्रीभगवान को अत्यंत प्रिय होता है, और इसी कारण पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरी जी महाराज को स्वयं भगवान ने अपने मंदिर का कोषाध्यक्ष चुना। यह कथन न केवल गीता परिवार के लिए, बल्कि समस्त साधकों के लिए गौरव और प्रेरणा का विषय बना।
मुख्य संदेश
गीता का कार्य केवल सेवा नहीं, ईश्वरीय उत्तरदायित्व है।
आह्वान
यह ऐतिहासिक उपलब्धि प्रत्येक साधक को आमंत्रित करती है—
कि वह गीता को केवल पढ़े नहीं,
जीए, बाँटे और आगे बढ़ाए।
आइए—इस वैश्विक गीता-यात्रा का अंग बनें।
तैंतालीसवाँ शुभारम्भ समारोह
गीता-पथ का विस्तार : भाषा, भूमि और भावनाओं से परे
इकतीस अक्टूबर को सम्पन्न तैंतालीसवाँ शुभारम्भ समारोह गीता परिवार की यात्रा में एक विशेष और ऐतिहासिक पड़ाव सिद्ध हुआ। इस वर्ग में अस्सी देशों से चालीस हज़ार से अधिक गीताप्रेमी साधकों का जुड़ना, गीता-ज्ञान के वैश्विक विस्तार का सशक्त प्रमाण बना।
इस अवसर को और भी विशिष्ट बनाते हुए गीता परिवार ने मणिपुरी भाषा में गीता-ज्ञान के प्रवाह का शुभारम्भ कर एक नवीन कीर्तिमान स्थापित किया। साथ ही, इसी सत्र में गीता जयंती पोर्टल का भी विधिवत उद्घाटन सम्पन्न हुआ—जो गीता-पथ को डिजिटल माध्यम से नई गति प्रदान करने वाला महत्वपूर्ण चरण है।
मुख्य झलक
गीता अब न केवल विश्वव्यापी है, अपितु भाषायी समावेशन के साथ सर्वसुलभ बन रही है।
इस दिव्य अवसर पर साधकों को आशीर्वाद प्रदान करने हेतु
परम पूज्य श्री श्री विश्वप्रसन्न तीर्थ स्वामीजी महाराज
(पेजावर मठ, उडुपि) का पावन सान्निध्य प्राप्त हुआ। स्वामीजी श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट, अयोध्या के ट्रस्टी होने के साथ-साथ प्रह्लाद गुरुकुलकी स्थापना द्वारा भावी पीढ़ियों में सनातन संस्कारों के सुदृढ़ प्रतिष्ठापन हेतु सतत कार्यरत हैं। जनता शिक्षण समिति के अध्यक्ष के रूप में उनके नेतृत्व में लाखों बच्चों तक शिक्षा और संस्कार का प्रकाश पहुँचा है। उनकी विद्वत्ता, दूरदर्शिता और सेवा-भाव के प्रति समाज का नमन स्वाभाविक है।
प्रेरक बिंदु
संस्कारयुक्त शिक्षा ही राष्ट्र का दीर्घकालिक भविष्य गढ़ती है।
परम पूज्य श्री श्री विश्वप्रसन्न तीर्थ स्वामीजी महाराज के विचार
अपने ओजस्वी और प्रेरणादायी उद्बोधन में स्वामीजी ने साधकों से आध्यात्मिक साधना को जीवन की प्राथमिकता बनाने का आह्वान किया। गीता परिवार तथा परम पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरी जी महाराज के अथक प्रयासों की सराहना करते हुए उन्होंने इस श्लोक के माध्यम से समस्त साधकों को आशीर्वाद प्रदान किया—
यत्र योगेश्वरः कृष्णो, यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
PULL-QUOTE
“जहाँ गीता है, वहाँ श्री, विजय और नीति का वास सुनिश्चित है।”
परम पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरी जी महाराज के आशीर्वचन
अपने प्रेरक उद्बोधन में परम पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरी जी महाराज ने श्रीमद्भगवद्गीता को सम्पूर्ण राष्ट्र-संस्कृति को एक सूत्र में बाँधने वाला अमर ग्रंथ बताया। उन्होंने कहा कि भारत के ईशान कोने में गीता-ज्ञान का प्रवाह आरम्भ होना अत्यंत शुभ संकेत है, क्योंकि ऐसे पुण्य कार्य का फल अनेक गुणा होकर समाज को प्राप्त होता है।
मणिपुरी भाषा में गीता-ज्ञान के शुभारम्भ पर उन्होंने गीता परिवार एवं समस्त साधकों को हार्दिक बधाई दी और सभी को गीता परिवार के नवनिर्मित संकल्पों में सक्रिय सहभागिता हेतु प्रेरित किया।
PULL-QUOTE
“गीता का ज्ञान जब स्थानीय भाषा में उतरता है, तब वह जन-जीवन का संस्कार बन जाता है।”
आह्वान
भाषा, क्षेत्र और सीमाओं से परे
गीता का यह प्रवाह
प्रत्येक जिज्ञासु, साधक और सेवाभावी हृदय को आमंत्रित करता है—
आइए—इस वैश्विक, सर्वसमावेशी गीता-यात्रा का सक्रिय अंग बनें।
चौवालीसवें शुभारम्भ समारोह की प्रेरक गाथा
चौवालीसवें वर्ग का शुभारम्भ उन्नीस दिसम्बर को अत्यन्त पावन वातावरण में सम्पन्न हुआ। इस वैश्विक साधना–यात्रा से पंचानबे देशों के पचास हज़ार से अधिक गीताप्रेमी जुड़े—यह स्वयं में गीता के सार्वकालिक और सार्वभौमिक प्रभाव का सजीव प्रमाण है।
इस वर्ग में सम्मिलित नव–साधकों का यह परम सौभाग्य रहा कि उन्हें आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन प्रदान करने हेतु तेजस्वी संत, परम पूज्य स्वामी श्री गिरिशानन्द सरस्वती जी महाराज (साकेत धाम आश्रम, जबलपुर) का सान्निध्य प्राप्त हुआ। स्वामीजी ने मात्र चौदह वर्ष की आयु में संन्यास ग्रहण कर आध्यात्मिक जीवन का वरण किया और पूज्य स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज के प्रिय शिष्य बने। देश–विदेश में उनकी भागवत कथाएँ श्रद्धालुओं को गहन आध्यात्मिक अनुभूति से ओतप्रोत करती रही हैं। आपने बिहार स्कूल ऑफ योग से भी निकटता से जुड़कर साधना–परम्परा को समृद्ध किया।
नर्मदा–सेवा के क्षेत्र में स्वामीजी का योगदान अतुलनीय है। उच्च न्यायालय में सतत संघर्ष कर आपने नर्मदा जी की स्वच्छता सुनिश्चित करवाई, तट–परिसर में धर्मशालाओं का निर्माण कराया और इस दैविक नदी की गरिमा, पवित्रता एवं शोभा को पुनः प्रतिष्ठित किया—यह सेवा केवल पर्यावरण–संरक्षण नहीं, अपितु सांस्कृतिक पुनर्जागरण का भी श्लाघ्य उदाहरण है।
साधकों को संबोधित करते हुए स्वामीजी ने कहा कि उन्होंने गीता–विलक्षणों के मुख से गीता–गायन का आरोही–अवरोही क्रम तथा श्लोकांक सहित श्लोक–स्मरण जैसी अद्भुत साधना प्रत्यक्ष देखी। इस अनुशासित, समर्पित और सामूहिक साधना को देखकर उनका विश्वास और दृढ़ हुआ कि भारत विश्वगुरु था, है और रहेगा।
स्वामीजी ने अर्जुन–कृष्ण के अद्वितीय संबंध की मार्मिक व्याख्या करते हुए कहा—जब अर्जुन ने अपने विषाद में भगवान को जोड़ लिया, तो उसका विषाद भी योग बन गया। अर्थात, जब हम भगवान से जुड़ते हैं, तो हमारे दोष भी गुण में परिवर्तित हो जाते हैं। भगवान की असीम कृपा प्राप्त करने के लिए उनसे संबंध जोड़ना अनिवार्य है—हमें अर्जुन बनना होगा।
आज जिन सत्यों को विश्व खोज रहा है, वे गीता में पहले से ही प्रकाशित हैं।










