गीता संथा वर्ग - स्तर 1 (L1) - नवम वर्ग “शुभ संकल्प पूर्ति समारोह”
गीता संथा वर्ग - स्तर 1 (L1) - नवम वर्ग
“शुभ संकल्प पूर्ति समारोह”
धर्मध्वज धर चल पड़े
लिए शुभ संकल्प
अनन्य पुरुषार्थ
कर सेवा निस्वार्थ
मिला पुण्य फल
1,11,111 पाकर
लक्ष्य निश्चित
पाया अत्यंत हर्ष
हुए आह्लादित
गीता परिवार के संस्थापक परम पूज्य स्वामी गोविंददेवगिरि जी महाराज की अनुमति लेकर आदरणीय डॉ संजय मालपाणी जी (राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष, गीतापरिवार) ने 1,11,111 प्रतिभागियों के रजिस्ट्रेशन के संकल्पित लक्ष्य प्राप्ति के आनंद की अपार अनुभूति का उल्लेख करते हुए उद्घाटन कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
संजय भैया जी ने तत्पश्चात् गीतापरिवार का संक्षिप्त परिचय देते हुए कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों का प्रेमपूर्वक स्वागत किया।
-कार्यक्रम में उपस्थित विशिष्ट अतिथिगण-
- सद्गुरू जग्गी वासुदेव जी महाराज (संस्थापक ईशा फाउंडेशन एवं लेखक) जिन्होंने सम्पूर्ण विश्व के युवाओं के मध्य भारतीय संस्कृति व सनातन मान्यताओं को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया है। सद्गुरु जी विश्व के अरबों-खरबों युवाओं के न केवल प्रेरणा स्रोत हैं वरन धरा पर उनको, उनके स्वयं के अस्तित्व व उद्देश्य से जोड़ा है।
- महामंडलेश्वर अखिलेश्वरानन्द गिरी जी महाराज वैदिक धर्म व संस्कृति के ज्ञान का प्रकाश लिए, प्रमुख प्रचारकों में अपना विशिष्ट नाम रखते हैं। साथ ही अनेक वैदिक धर्म ग्रन्थों जैसे गीता, शंकराचार्य भाष्य, महाभारत, रामायण इत्यादि के परमज्ञाता विद्वान संत हैं।
- स्वामी गोविंददेवगिरि जी महाराज जिन्होंने गीता परिवार की सन 1986 में स्थापना की। भारतीय संस्कृति के अभ्युदय एवं युवा पीढ़ी में संस्कारों के बीजारोपण हेतु निरंतर अथक क्रियाशील हैं। स्वामीजी, वर्तमान में राम जन्मभूमि भूमि ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष भी हैं।
स्वामी स्वामी गोविंददेवगिरि जी एवं सद्गुरु जग्गी जी के मध्य हुयी मधुर ज्ञानवर्धक वार्ता के कुछ स्वर्णिम अंश
ऐसा अद्भुत सहयोग सद्भाग्य से मिलता है। जब उच्च कोटि के ज्ञानी सन्त एक जगह पर सत चर्चा करते हुए मिलते हैं। उक्त वार्ता से स्वर्णिम वातावरण निर्मित हो गया, मानो स्वयं शिव जी एवं पार्वती जी, कृष्ण लीला देखने वृंदावन पधारे हों।
स्वामी गोविंददेवगिरि जी ने सद्गुरु जग्गी जी के समक्ष गीता परिवार के ऑनलाइन गीता कक्षाओं के बारे में संक्षिप्त जानकारी देते हुए बताया कि भगवान श्री कृष्ण के कमल मुख से निकली वाणी स्वयं मंत्र है। अतः गीता उच्चारण करते समय हमारी ऑनलाइन कक्षाओं में इस बात का विशेष महत्व दिया जा रहा है कि सभी प्रतिभागी शुद्ध संस्कृत उच्चारण करते हुए गीता पाठ कर सकें।
इस संदर्भ में स्वामी जी ने अति विनम्रता से करबद्ध निवेदन करते हुए सद्गुरू जी से प्रश्न किया कि शुद्ध संस्कृत उच्चारण पर अत्यधिक ध्यान दिया जाना क्या उचित है? हालांकि गीता विवेचन के माध्यम गीता ज्ञान दो भाषाओं में जन जन तक पहुंचाया जा रहा है।
कोरोना महामारी काल मे गीता परिवार द्वारा किए जा रहे कार्यों की सराहना करते हुए सद्गुरु जी ने कहा कि गीता द्वारा आपने बाह्य महामारी के साथ साथ आंतरिक मानसिक महामारी से सभी की रक्षा की है। जापान का उदाहरण देते हुए बताया कि वर्ष 2020 में करोना महामारी से भी ज्यादा जाने आत्महत्या के कारण चली गयी हैं।
आंतरिक कलह व विषाद के इस युग में गीता विश्व के प्रत्येक मानव तक पहुंचनी चाहिए। भाषा की मर्यादा या सीमा में गीता ज्ञान व इसमें निहित शक्ति को बांधना मेरी व्यक्तिगत राय में उचित नहीं है।
निसंदेह ही संस्कृत अत्यंत ही वैज्ञानिक भाषा है तथा हमें हमारी संस्कृति व भाषा पर अत्यंत गर्व है। मंत्रोच्चार लोगों को अपनी संस्कृति के प्रति आकर्षित एवं प्रेरित करने का सशक्त माध्यम है। जो संस्कृत सीखना चाहते हैं उन्हें अवश्य ही इस हेतु प्रोत्साहित करना चाहिए, किन्तु आज के युग में मानव को मंत्रोच्चार से कहीं अधिक गीता ज्ञान की आवश्यकता है।
आगे सद्गुरु जी कहते हैं कि विश्वरूप दर्शन भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया वह आशीर्वाद है जो गीता का अत्यंत ही महत्वपूर्ण भाग है।
कृष्ण कितनी ही ज्ञान की बातें कितने ही प्रकार से समझाने का प्रयास करते हैं किन्तु हमारे भीतर का अर्जुन सदैव ही असंतुष्ट रहता है, और बार बार नए प्रश्न खड़े करता है।
परन्तु जब भगवान श्री कृष्ण उसे अपने विश्वरूप का दर्शन देकर अर्जुन के माध्यम से प्रत्येक मानव को समझाते हैं कि तुममें भी वही क्षमता है कि तुम स्वयं ईश्वर स्वरूप हो सकते हो। यदि अपने अस्तित्व अपनी चेतना के आयामों का विस्तार कर पाओगे तो स्वयं ईश्वरत्व का अनुभव कर सकते हो।
योग का अर्थ है जोड़ना व योग का परम दिव्य स्वरूप है स्वयं भगवान श्री कृष्ण क्योंकि वह अपने शरणागत अर्जुन को चेतना के उच्चतम स्वरूप का दिव्य दर्शन कराकर गीता ज्ञान के महत्वपूर्ण भाग का प्रत्यक्ष प्रतिपादन करने में सक्षम हैं। चेतना के उच्चतम स्तर तक विकास मानवमात्र के लिए अति आवश्यक है। जीवन की अनुकूलताओं में नैतिकता साथ तो देती है किन्तु परिस्थितियां बदलने पर जब जीवन-मृत्यु का प्रश्न खड़ा हो जाता है तब हमारी चैतन्यता ही हमारी रक्षा करती है।
जब आप online माध्यम से 10 की जगह 1000 लोगों तक पहुंच पा रहे हैं तब तो मैं चाहूँगा कि गीता संदेश के प्रचार प्रसार में आने वाली सभी बाधाओं को दूर करके विश्व की अन्य भाषाओं में अनुवाद कर के, गीता जी के सन्देश व चेतना के सार्वभौमिक सर्वोच्च पहलुओं को विश्व के अरबों लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिए।
स्वामी जी के प्रश्न का उत्तर देते हुए सद्गुरुजी कहते हैं कि भगवान श्री कृष्ण का जीवन ही आज विश्व के सभी युवाओं हेतु गीता का महत्वपूर्ण संदेश है।
महाभारत में हम पाते हैं कि, जहां सभी पात्र अपने घोर कर्मों का फल पाते हैं, वहीं अनेक कल्पनातीत कठिनाईयों का सामना करते हुए भी तथा सूक्ष्म से विशाल कार्यों तक सभी मे संलिप्त रहने के पश्चात भी, कृष्ण सदा मुस्कुराते हुए निर्लिप्त रहते हैं।जीवन की नश्वरता को ध्यान रखते हुए बड़े से बड़े कठिन कार्यों को सरलतापूर्वक करना चाहिए। बस सभी कर्मों को करते हुए कर्मबन्धनों से मुक्त रहना व मुस्कुराते रहना ही जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण सन्देश हमे कृष्ण जीवन से सीखना चाहिए।
“Involved but not Entangled”
सद्गुरु जी के जीवन दर्शन की प्रशंसा करते हुए स्वामी जी कहते हैं कि सद्गुरुजी का जीवन ही उनके द्वारा कहे गए शब्दों का सटीक उदाहरण है। तमिलनाडु में प्राचीन हिन्दू मंदिरों के स्वतंत्रता व संरक्षण हेतु कार्यों की प्रशंसा करते हुए स्वामी जी ने सहयोग का पूर्ण आश्वासन देते हुए आग्रह किया कि यह अभियान पूरे भारतवर्ष में चलाया जाना चाहिए।
भारतीय संस्कृति की मुख्य आधार शिला मंदिरों की चर्चा करते हुए सद्गुरुजी बताते हैं कि हमें मंदिर केवल पूजा, प्रार्थना या याचना हेतु नहीं जाना चाहिए। हमें ईश्वरमूर्ति का दर्शन करते हुए, उसकी दिव्यता को हृदय में आत्मसात करने का प्रयास करना चाहिए। यही हमारी सनातन संस्कृति भी कहती है।
इतिहास के कई पन्नों में हम पढ़ पाते हैं कि किस तरह से हमारी सनातन संस्कृति को नुकसान पहुंचा है। आजादी के 75 वर्षों बाद अब समय आ चुका है कि हम सभी को आपसी मतभेद को मान्यता व आदर देते हुए एक लक्ष्य, एकरूपता के साथ एक मंच पर आना चाहिए। अनेकता में एकता ही हमारी पहचान है और यही गीता भी हमें सिखाती है।
भारतीय संस्कृति ही विश्व की एकमात्र संस्कृति है जो हमें पूर्णता व स्वतंत्रता प्रदान करती है। सत्य व अनुभव को किताबी ज्ञान से भी अधिक महत्व दिया गया है। तभी तो हम अर्जुन की तरह ईश्वर से भी अनेक प्रश्न पूछ सकते हैं।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गीता परिवार द्वारा किया जा रहा कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण कदम व सराहनीय है। यह कार्य यहीं नहीं रुकना चाहिए बल्कि गीता का संदेश एकरूपता व समदर्शिता के साथ हमारे युवा पीढ़ी तक संचरित किया जाना चाहिए।
अब यह हमारी यह विशेष जिम्मेदारी बन जाती है कि आने वाले 25 वर्षों में हमे अपनी सनातन संस्कृति के विस्तार व संरक्षण हेतु बहुत कार्य करना है। अन्यथा हमारी युवा पीढ़ी का बहुत बड़ा नुकसान होगा व पुनरुत्थान हेतु बहुत विलंब हो जाएगा।
“Geeta is not a song, who someone sings.
But it’s a song which our soul sings.”
“My Body and your body may sing a different song
My Mind and your Mind may sing a different song
But my Soul and your soul will sing a same song.”
इस प्रकार कृष्ण को परम योगी बताते हुए सद्गुरुजी ने अपनी वार्ता को समाप्त किया। स्वामी गोविंददेवगिरि जी ने उनके मार्गदर्शन व आशीर्वाद की भविष्य में भी आवश्यकता बताते हुए सद्गुरुजी के चरणों मे प्रणाम अर्पित करते हुए उनकी गरिमामयी उपस्थिति हेतु बहुत बहुत धन्यवाद ज्ञापित किया।
स्वामी गोविंददेवगिरि जी के आशीर्वचन - आज का बड़ा कार्य कालान्तर में छोटा लगने लगता है। निरंतर प्रगतिशीलता बनी रहनी चाहिए।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर।।
भगवान में श्रद्धा रखकर निःस्वार्थ भाव से किया गया जन कल्याण का प्रत्येक कर्म यज्ञ है।गीतापरिवार का कार्य भी ऐसा ही एक यज्ञ है। इससे बड़ा सत्कर्म हो भी नहीं सकता कि “ गीता पढ़ें, पढ़ायें व जीवन में लाएं।” हम गीता पढ़ते रहेंगे, पढ़ाते रहेंगे। साथ ही साथ यह भी देखते रहेंगे की गीता जीवन में कितनी उतरी। नित्य आत्मावलोकन करके देखना चाहिए कि दिन में आज मैंने कौन सा कार्य सत्पुरुषों जैसा किया है? और कौन सा कर्म गलत हो गया है। अपने जीवन का संशोधन करते रहना अधिकाधिक शुद्धि करण करते रहना। यह भी एक साधना है। यही अपने जीवन में गीता उतारने का प्रयास है।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥
किसी विशेष कार्य की प्राथमिकता को ध्यान में रखकर, अन्य सारे कर्मो का त्याग कर तीव्र गति से कार्य मे लगना पड़ता है। किंतु यह बात जीवन में आदत नहीं बननी चाहिए। जीवन में संतुलन व आत्मानुशासन लाना अति आवश्यक है।
यज्ञ का अर्थ भी यही है सभी बातें उचित मात्रा में नाप तोल कर रखी जाए, न कम न ज्यादा। सत्कर्म करते हुए हमारा जीवन भी नपा-तुला होना चाहिए, यह बात भगवान की भी अपेक्षित है।
गीता गान है, गीता गाने का ग्रन्थ है, गीता गुनगुनाने का ग्रन्थ है। प्रसन्न होकर चलते रहें यही मार्ग है। जहां तक शक्ति है चलते रहें, जब कभी थक कर रुक जाएंगे तब कृष्ण आकर गले लगा लेंगे, ऐसा विश्वास रखना चाहिए, यही गीता मार्ग है।
नव संवत्सर की शुभकामनाएं व कोरोना महामारी का जल्दी शमन हो एवं गीता सेवा में मुक्त होकर भ्रमण कर सकें।
नूतन वर्षाभिनंदन धन्यवाद
जय श्री कृष्ण
भारत माता की जय
आओ गीता प्रचारक बनें।
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सहज व सरल ढंग से भगवान की वाणी में गायी गयी भगवद्गीता
का शुद्ध उच्चारण सीखें व अन्यों को प्रेरित कर
भगवान का प्रिय कार्य करने वाला बनें।



