गीता चिन्तनिका सत्र
पूज्य स्वामीजी के अनुग्रह से एक नये उपक्रम का आरम्भ रात्रि नौ से दस बजे के बीच में आयोजित किया जा रहा है। प्रत्येक एकादशी को कुल 3 अध्यायों का क्रमशः पारायण एवं उसका चिंतन प्रत्येक बार चुने हुए विभिन्न गीताव्रती साधकों के श्रीमुख से होना निश्चित किया गया है।
- चिन्तनिका 1 - https://youtu.be/HdFo4SjRRhw
- चिन्तनिका 2 - https://youtu.be/a1F1BJW57WM
- चिन्तनिका 3 - https://youtu.be/EHdJEV8QKuw
- चिन्तनिका 4 - https://youtu.be/5yI1nuqwW5o
इस शृंखला का मुख्य उद्देश्य भावी कुशल वक्ता खोजना है जो कि गीता का सरल शब्दों में व्याख्यान कर सकें।
अजा एकादशी 3 सितम्बर को श्रिया करवा जी (आठ वर्षीया), पहला अध्याय; सुनीता सोमानी जी (उनचास वर्षीया) दूसरा अध्याय और रीमा दातार जी (इक्यावन वर्षीया) तीसरा अध्याय का शुद्ध उच्चारण किया। तत्पश्चात् गीता चिंतन आरंभ हुआ।
गीता चिंतन के प्रथम वक्ता श्री अशोक शर्मा जी ने ऋषिकेश से बताया कि केवल अर्जुन का विषाद ही भगवान् की सन्मुखता होने के कारण योग अर्थात् भगवान् से नित्य सम्बंध कराने वाला हुआ इसलिये पहले अध्याय का नाम अर्जुनविषाद योग रखा गया। भगवान् ने अर्जुन को युद्ध करने के लिए प्रेरित किया क्यूंकि वह उनका क्षत्रिय धर्म हैं।
द्वितीय वक्ता श्रीमती सुनंदा सोमानी जी ने कहा कि भगवान् कृष्ण ने हमे सिखाया कि कोई भी व्यक्ति उदास हो तो पहले उसको सुनना जरूरी है ना कि उपदेश देना। भगवान् ने पहले अध्याय में अर्जुन की बात पूरी सुनी फिर अपनी बात आरम्भ की।
तृतीय वक्ता श्री श्रीकृष्ण नवाडे जी ने कहा कि भगवान् ने अर्जुन को संसार की नश्वरता का विचार कर शरीर को लेकर ज्यादा विषाद नहीं करने का उपदेश दिया।
तत्पश्चात् प्रथम चिन्तनिका को दैदीप्यमान करने हेतु पूज्य स्वामीजी का आगमन हुआ। पू. स्वामीजी ने गीता को मंत्रमय ग्रन्थ बताया और कहा कि पुनः-पुनः गीता की आवृत्ति और मनन ही हमारे जीवन का सम्पूर्ण उद्धार कर देती है। उद्देश्यपूर्ण रीडिंग से चिंतन में गहराई आती है और जब विचारों को किसी के सामने प्रस्तुत करना होता हैं तो वह कब अपने बन जाते हैं पता हीं नहीं चलता इसी को चिंतनिका कहते हैं। आवृत्ति से उत्थान होता रहता है। उन्होंने कहा हम अधिकाधिक परमांनद पूर्ण जीवन के यात्री बन जायें, यही हमारी दृष्टि हो जानी चाहिये।
द्वितीय सत्र 17 सितम्बर में परिवर्तिनी एकादशी को जिगीषा जी (आठ वर्षीया) चौथा अध्याय; अनिकेत जी (उन्नीस वर्षीय) पांचवा अध्याय और प्रेरणा जी (नौ वर्षीया) छठा अध्याय बड़े भक्ति भाव से पढ़ा।
ललिता मालू जी ने चौथे अध्याय के चिंतन में बारह यज्ञ –श्रवण, मनन, स्वाध्याय, पाँचो इन्द्रियों का अनुशासन, आत्मसंयम, दैवपूजा, प्राणायाम और नियमित आधार की महिमा गायी। ज्योति जोशी जी ने कर्मयोग की श्रेष्ठता बताई। शिल्पा राठी जी ने ज्ञान बिखेरा कि हम ही अपने मित्र और शत्रु हैं।
स्वामीजी के प्रिय शिष्य गीता विशारद आ. श्री श्रीनिवास जी वर्णेकर इस अवसर पर विशेष वक्ता के रूप में पधारे और उन्होंने कहा पू. स्वामीजी ने हमारे अंदर के भगवान् को गीता परिवार के रूप में जागृत किया। आग्रह किया कि सभी के कल्याण के लिए ही हम अपना जीवन बनायें। आ. श्रीमती निर्मला जी मारू जी के धन्यवाद ज्ञापन से सत्र समाप्त हुआ। प्रति एकादशी इन चिन्तनिका सत्रों में हजारों की संख्या में गीताप्रेमी उपस्थित होकर आनंद की अनुभूति कर रहें हैं।


