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गीता मैत्री अंक १जून से अक्टूबर २०२१
०७इतिहास और पड़ाव

शुभारम्भ

निराशा या अवसाद से उबारने का कार्य करती है गीता!
-परमपूज्य स्वामी जी

एक ऐसा समय जब पूरे विश्व में त्राहि त्राहि मची थी, सभी लोग अपने अपने घरों में बैठे थे, कितने ही लोग डिप्रेशन, स्ट्रेस आदि से ग्रसित हो रहे थे। उस समय अंधकारमय विश्व को प्रकाश प्रदान करने “तमसो मा ज्योतिर्गमय” इस सिद्धांत को लेकर गीता परिवार द्वारा वर्षों से चल रही श्रीमद्भगवद्गीता की ऑफलाइन कक्षाओं के अनुभव से शुभारम्भ हुआ “ऑनलाइन गीता संथा वर्ग” का अनौपचारिक रूप से प्रयोग रूप में 2-3 ऑनलाइन कक्षायें मार्च 2020 में की गयीं। प्रयोग कक्षाओं की सफल संचलन प्रणाली एवं इसकी सार्थकता का विचारकर गीता परिवार के राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष आ. डॉ. संजय जी मालपाणी ने आशू भैया को इसे विश्व स्तर पर कार्यान्वित करने हेतु एक विशाल योजना बनाने का निर्देश दिया।

किसी भी कार्य के शुभारंभ की उत्सुकता होना स्वाभाविक है। गीता संथा वर्ग के शुभारंभ के ऐतिहासिक क्षण भी ऐसे ही थे। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया, मंगलवार 23 जून 2020 को पहला आधिकारिक अंतर्राष्ट्रीय ऑनलाइन गीता संथा वर्ग गीता परिवार द्वारा विश्वस्तर पर आरम्भ करने का निश्चय हुआ। प्रवेश फॉर्म प्रकाशित करने के 24 घंटे के भीतर ही 7 देशों से 2000 से भी अधिक गीता प्रेमियों द्वारा फॉर्म भर दिये गये जिनमें भारत के सभी 29 राज्यों एवं 8 केंद्र शासित प्रदेशों से लोग सम्मिलित थे। इतनी शीघ्रता से इतनी संख्या में फॉर्म भर जाने से फॉर्म बंद करना पड़ा। गीता सीखने का इतना अधिक उत्साह देख सभी हतप्रभ थे, सम्भवत: अब समय आ गया था जब लोग पुनः अपने मूल को जानने की ओर लौटना चाहते थे। गीता के श्लोकों का शुद्ध उच्चारण के साथ सस्वर पाठ सीखना है, वह भी घर बैठे, वह भी पूर्णत: निशुल्क ! यह विचार नि:संदेह सबको उत्सुक करने वाला था। पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं इसी को चरितार्थ करते हुए गीता परिवार के व्हाट्सएप ग्रुप में 19 जून 2020 को आ. आशू भैया ने लिखा – “मुझे तो यह गीता परिवार के अगले पड़ाव का आरम्भ यहाँ से दिखायी दे रहा है जिसमें पूज्य स्वामीजी की भविष्यवाणी कि 50वें वर्ष में गीता परिवार ‘पूरे विश्व में एक गीता का कार्य करने वाला सर्वाधिक प्रमाणिक व मान्य संगठन होगा’ सत्य होती दिख रही है।”

इन कक्षाओं को अधिक से अधिक प्रभावशाली ढंग से सम्पादित करने के लिये एक बड़ी अनुभवी व विद्वत टीम पूरे मनोयोग से कार्य में लग गयी। हिंदी एवं अंग्रेजी भाषाओं में 50-50 प्रशिक्षार्थियों की संख्या में 45 बैच बनाये गये जिसमें एक मुख्य प्रशिक्षक, एक सहायक प्रशिक्षक और एक टेक्निकल असिस्टेंट, साथ ही 10 बैच के लिये एक एक ग्रूप कोऑर्डिनेटर होंगे ऐसा निश्चित हुआ।

अब विषय था इतने कार्यकर्ताओं का चयन होगा किस प्रकार से, किन्तु इस महायज्ञ में आहुति डालने हेतु गीता परिवार के सभी केन्द्रों से कार्यकर्ता उत्साहपूर्वक दायित्व सँभालने हेतु आगे आयें। जिसमें उपाध्यक्ष श्री श्रीहरिनारायण व्यास जी, आ. प्रमिला जी महेश्वरी, आ. श्रीमती निर्मला जी मारू, आ. श्रीनिवास वर्णेकर जी, आ. श्री अविनाश जी संगमनेरकर, आ. श्रीमती सरिता रानी जी, आ. श्रीमती मीनाक्षी गुप्ता जी सहित गीता परिवार के सभी मुख्य कार्यकारिणी सदस्यों का प्रमुख योगदान रहा। इस प्रकार सभी बैच पूर्णत: गीता परिवार की पद्धति से चलें इसके लिए प्रशिक्षण वर्ग गीता साधिका प्रमुख प्रशिक्षिका आदरणीया सुवर्णा मालपाणी जी के मार्गदर्शन में हुआ।

23 जून सायं 7 बजे वह समय आ चुका था जिसकी तैयारियों में कई आँखें कई दिनों से सोई नहीं थीं। उद्घाटन समारोह में सम्मिलित होने हेतु 7 देशों से लगभग 2000 प्रशिक्षार्थी अपने फोन, लैपटॉप के माध्यम से, ज़ूम एवं फेसबुक पर इन ऐतिहासिक क्षणों के, विश्व में आज तक के सबसे बड़े ऑनलाइन गीता संथा वर्ग के साक्षी हो रहे थे - https://www.facebook.com/geetaparivar/videos/573431133370934 कार्यक्रम योगेश्वर श्रीकृष्ण की प्रार्थना से आरंभ हुआ। गीता परिवार के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. आशू जी गोयल ने सभी का स्वागत, अभिनंदन किया एवं गीता परिवार के दक्षिणांचल प्रमुख एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री हरि नारायण जी व्यास ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया।

सर्वप्रथम आ. आशू भैया ने इस कार्य हेतु पूर्व व पूर्ण नियोजन की संक्षिप्त जानकारी देते हुए शुद्ध उच्चारण का गहन महत्व बताया। Learngeeta में प्रथम स्तर (L-1) पर इस पर विशेष ध्यान देते हुए इसका अभ्यास कराया जायेगा व आगे के स्तरों में अध्याय सीखने के साथ कंठस्थ करने के प्रकल्प भी होंगे। विभिन्न स्तरों पर विशिष्ट कंठस्थीकरण परीक्षाओं को उत्तीर्ण करने पर अंकपत्र एवं प्रमाणपत्र प्रदान किये जाने की भी जानकारी दी। यह सब कुछ बहुत ही सहज व सरल रूप में होगा जो सभी आयु वर्गों के सभी आम से आम जनमानस को पूर्णत: नि:शुल्क उपलब्ध होगा। गीता संस्कृत में है, हम कभी पढ़ सकेंगे क्या? ऐसा सोचने वाले भी इसे कंठस्थ कर सकेंगे, सभी में ऐसे विश्वास का संचार उन्होंने अपनी ओजस्वी वाणी से किया। आशू भैया ने कहा कि इस कार्य में प्रत्येक कार्यकर्ता सेवाभाव के साथ ही “साधनाभाव” से भी जुड़ें हैं; यहाँ “अर्थभाव” तो है ही नहीं, कीर्ति आदि की भी कामना नहीं है। तत्पश्चात् इस कार्य की इसी विशिष्टता को रेखांकित करते हुए आगे के मार्गदर्शन के लिए उन्होंने गीता परिवार के राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष आ. डॉ. संजय मालपाणी को आमंत्रित कर अपना उद्बोधन पूर्ण किया।

तत्पश्चात् गीता परिवार के राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष व अनेक दिव्य संस्थाओं के गरिमामयी पद पर विभूषित आ. डॉ. संजय जी मालपाणी ने सभी का अभिवादन कर अपने उद्बोधन के पहले आ.सुवर्णा काकी जी से आग्रह किया कि वे बारहवें अध्याय के प्रथम दो श्लोक पढ़ें। आ. सुवर्णा काकी जी जिन्होंने अपने पूरे जीवन में लाखों बालक/युवा/वृद्धों को को गीता की संथा देकर शुद्ध उच्चारण सिखाया है, उनके मधुर स्वर, शुद्ध व स्पष्ट उच्चारण के साथ श्लोकों को सुनाकर सभी शिक्षार्थी आनंदित व उत्साहित हुए और आश्वस्त हुए कि अब हम ऐसा सीखेंगे और बोलेंगे भी।

तत्पश्चात् गीताव्रती-गीता विशारद आ.संजय भैया ने प.पू.स्वामीजी श्री गोविन्द देव गिरि जी महाराज के सान्निध्य में अपने बाल्यकाल के संस्मरण सुनाते हुए कहा कि जैसे श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्नों के उत्तर देते थे, वैसे ही स्वामीजी मेरे कभी न समाप्त होने वाले प्रश्नो का सहज ही उत्तर देकर मुझे बचपन में शांत करते थे। स्वामीजी योगी व ज्ञानी हैं और जैसे योगी ज्ञान को अपने में ही समेटकर नहीं रखते वरन् उसे बाँटते हैं, स्वामीजी सदा वैसा ही करते हैं। उनकी ही प्रेरणा व छत्रछाया में 50 वर्ष की आयु में उन्होंने सम्पूर्ण गीता कंठस्थ की उसके प्रेरक अनुभव बताते हुए उन्होंने सबको सन्देश दिया कि “अपने द्वारा लिया हुआ संकल्प अपने इष्ट मित्रों को अवश्य बतायें”। ऐसा करने से हम दूसरों का उत्साहवर्धन करते हैं, उन्हें प्रेरणा देते हैं और हमारा संकल्प और दृढ़ होता हो जाता है, हम उसे पूरा करने की ठान लेते हैं। इसीलिये इस संथा वर्ग में सब साथ-साथ एक दूसरे को प्रोत्साहित करेंगे। अध्ययन तो अकेले कर सकते हैं, पर निश्चित समय में सीखना, कंठस्थ करना और अगले स्तर पर जाना यह सब के साथ ही सहज होगा। गीता को अपना मित्र बनाएं, वह सबका भला चाहती है, भलाई का मार्ग दिखाती है। इसके उच्चारण के साथ हमें अपने आचरण को भी ठीक करना होगा। स्वयं भगवान ने ऐसा कहा है कि “मनुष्य आप ही स्वयं अपना बंधु है और आप ही अपना शत्रु” अतः आप अपने मित्र बन कर गीता की सीख को अपनाये। अंत में इस पुण्य कार्य हेतु उन्होंने सभी का अभिनंदन कर शुभेच्छा व्यक्त की।

अब समय था प.पू.स्वामीजी के आशीर्वचनों का। विशेष बात यह थी कि स्वामी जी ने यह आशीर्वचन अपने अत्यन्त व्यस्त कार्यक्रम में समय निकालकर एयरपोर्ट से भेजे! क्यूंकि पूज्य स्वामीजी उस समय श्रीराममंदिर निर्माण की एक महत्वपूर्ण बैठक में भाग लेने हेतु प्रवास पर थे।प.पू. स्वामीजी ने सभी का अभिनंदन कर कहा, “यह तो ऐसा है कि भगवान जगन्नाथ स्वयं सब के हृदय में विराजमान होकर अपनी रथयात्रा पर निकले हैं। आप भगवद्गीता के अर्जुन के साथ बैठकर, श्रीकृष्ण को अपना सारथि बनाकर अपनी विजय यात्रा का आरंभ करने जा रहे हैं।

यह अद्भुत ग्रंथ है। 5000 वर्ष पूर्व एक महान योद्धा द्वारा दूसरे योद्धा को दिया यह उपदेश आज भी और सर्वकाल समयोचित रहेगा। यह हमारे जीवन की छोटी “गाइड” है, जिसमें हमें जीवन को सफल बनाने के सूत्र मिलेंगे। केवल 700 श्लोकों की गागर में भगवान ने सारे उपदेशों का सागर भर दिया है। गीता आपके जीवन का पथ-प्रदर्शन करेगी। भगवद्गीता ने भारत के ही नहीं, विदेश की अनेक महान हस्तियों का भी मार्गदर्शन किया है। जीवन को आलोकित करने वाला दिव्य प्रकाश है यह ग्रन्थ।

आप अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ते रहें, न केवल आगे बढ़ें अपितु सफल हों। किंतु अकेले नहीं, अनेक लोगों को साथ लेकर चलें। सभी को जीवन की धन्यता का अनुभव करा सकें। यह सारे सूत्र लेकर गीता परिवार ने यह अनुपम कार्य आरम्भ किया है। भगवद्गीता कैसे बोली जाये, यह ऑनलाइन पढ़ाने की व्यवस्था करने का महती कार्य गीता परिवार ने किया है। आम लोगों के कल्याण के लिये, गीता परिवार के कार्यकर्ता दिन-रात अथक परिश्रम कर रहे हैं। आपसे अनुरोध है कि इसका लाभ उत्साह के साथ लें। भगवद्गीता को अपने चिंतन का अंग बनायें। जहाँ कहीं आपके मन में कोई शंका होगी, आप जब किंकर्तव्यविमूढ़ हों, निराशा की गर्त में डूबे हों या अवसाद से घिरे हों, ऐसे में गीता संजीवनी का काम करती है।

अन्य देशों में सुदूर बैठे गीताप्रेमी भक्त इस कार्यक्रम का लाभ ले सकें, इसीलिए गीता परिवार यह दिव्य गीता सीखने के कार्यक्रम का शुभारम्भ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उच्चतम मानकों के साथ कर रहा है। यह स्वर्णिम ऐतिहासिक क्षण है, जिस प्रकार भगवान जगन्नाथ का रथ 5000 वर्षों से अनवरत चलता आ रहा है, उसी प्रकार हमारे जीवन का रथ निर्बाध रूप से निरंतर आगे बढ़े। विश्व में भारतीय संस्कृति का डिमडिम अधिकाधिक निनादित हो और भारत माता सभी के लिये आदरणीय बने, यही इस कार्य की सार्थकता है। आपका जीवन सफल हो, परिवार मंगलमयता का अनुभव करे और आप एक उत्तम नागरिक और सार्थक जीवन जीने वाले योग्य व्यक्ति बनकर लोगों की दृष्टि में महानतम बनें यह बल व विवेक आपको प्राप्त हो, ऐसी प्रार्थना भगवान से करता हूँ।”

प.पू.स्वामीजी का अनमोल मार्गदर्शन व शुभेच्छापूर्ण आशीर्वाद गीता परिवार की इस उड़ान को अनंत उंचाई पर ले जायेगा, उन्नत शिखर पर ले जायेगा, यह तो होगा ही—यह विश्वास और दृढ़ हुआ। स्वामीजी का विमानतल से आशीर्वाद प्रदानकर गंतव्य के लिये उड़ान भरना इसी बात का प्रतीक लगा।

अंत में गीता परिवार के उपाध्यक्ष व पश्चिमांचल प्रभारी आ. श्री गोविंदजी माहेश्वरी ने सहृदय सभी सहयोगियों,प्रतिभागियों, कार्यकर्ताओं व गीता परिवार के पदाधिकारियों को कृतज्ञता ज्ञापित कर सभी का अभिनन्दन किया।

योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की कृपा, भगवद्गीता से मैत्री और प.पू स्वामी जी के आशीर्वाद इस प्रस्थानत्रयी के साथ गीता परिवार की अखंड यात्रा में यह संकल्प एक अद्भुत उदाहरण बन सभी का जीवन सार्थक करेगा, इस विश्वास के साथ सभी ने इस शुभारम्भ कार्यक्रम प्रवास में सहयात्री बनकर गौरव का अनुभव किया।

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