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गीता मैत्री अंक १जून से अक्टूबर २०२१
१०पाठ्यक्रम और परीक्षाएँ

विशेष गीता व्याकरण वर्ग

भगवान श्री कृष्ण की असीम कृपा से हम सब श्रीमद्भगवद्गीता सीख ही रहे हैं। गीता परिवार प्रयास कर रहा है कि सभी प्रशिक्षार्थी संस्कृत में गीता का शुद्ध उच्चारण सीख सकें। किसी भी भाषा को सीखने के लिए उसके व्याकरण के नियमों का ज्ञान आवश्यक है अतः संस्कृत व्याकरण का भी सूक्ष्म ज्ञान देने का विचार किया गया।

व्याकरण के वर्गों में नियमित भाग लेकर साधक, गीता जी का संस्कृत भाषा में उच्चारण, सहजता से सीख सकते हैं। व्याकरण वर्गों को समय-समय पर संचालित करके, गीता परिवार ने ‘घर-घर गीता, हर घर गीता’ का संकल्प लिया है। इसी उद्देश्य से गीता संथा वर्गों का सुचारू रूप से संचालन किया जा रहा है। गीता सीखने हेतु संस्कृत भाषा एवं संस्कृत व्याकरण का ज्ञान होना अति आवश्यक है। यह वैज्ञानिक भाषा है। यह देव भाषा है, जैसे लिखी जाती है वैसे ही बोली जाती है।

गीता परिवार द्वारा स्तर अनुसार संस्कृत व्याकरण के विशेष सत्रों का आयोजन प्रत्येक वर्ग हेतु नियमित किया जा रहा है। जिस तरह से गीता संथा वर्ग दिनों- दिन बढ़ता जा रहा है उसी अनुपात में व्याकरण वर्गों की संख्या भी बढ़ाई गयीं हैं।

वैदिक गुरुकुल में जिस प्रकार वेदों उच्चारण किया जाता है उसी पद्धति से संस्कृत व्याकरण के कई नियमों का पालन गीता परिवार में किया जाता है। इसी के अनुरूप हम गीता सिखाते हैं। इसके पीछे हमारी भावना यह है कि भगवान के मुखारविंद से निकले शब्दों को हम पूर्ण रूप से तो नहीं परंतु मिलत-जुलता तो बोल ही सकें। संस्कृत भाषा वृहद भाषा है जिसे सीखने में समय लगता है। संस्कृत भाषा का शुद्ध उच्चारण सिखाने के उद्देश्य से गीता संथा वर्गों में विशेष व्याकरण वर्गों का संचालन किया जाता है।

आचार्य नारायण शेट्टे जी के मार्गदर्शन में इन व्याकरण वर्गों का आरम्भ किया गया जिसमे एक विशिष्ट ज़ूम कक्षा में स्तर 1 के प्रशिक्षार्थियों हेतु एक ‘स्तर 1 - श्रीमद्भगवद्गीता शुद्ध उच्चारण मार्गदर्शिका’ का निर्माण किया गया जिसे बाद में स्तर 2 व 3 के लिए भी बनाया गया। स्तर 4 की मार्गदर्शिका अभी निर्माणाधीन है।

ऋ ॠ ए ऐ ओ औ
ह्रस्व स्वर :- अ इ उ ऋ
दीर्घ स्वर :- आ ई ऊ ॠ ए ऐ ओ औ
व्यञ्जन :-
(क वर्ग) कण्ठ्य :- क् ख् ग् घ् ङ्
(च वर्ग) तालव्य :- च् छ् ज् झ् ञ्
(ट वर्ग) मूर्धन्य :- ट् ठ् ड् ढ् ण्
(त वर्ग) दन्त्य :- त् थ् द् ध् न्
(प वर्ग) ओष्ठ्य :- प् फ् ब् भ् म्
अनुनासिक व्यञ्जन

Visarga :-
maitraḥ karuṇa eva ca – maitraḥ (kh) karuṇa eva ca
tataḥ padaṃ tatparimārgitavya – tataḥ (ph) padaṃ tatparimārgitavyam
ḥ = ś ṣ s
Santuṣṭaḥ satatam = santuṣṭassatatam
Yo madbhaktaḥ sa me priyaḥ = yo madbhaktassa me priyaḥ
Ūrdhvamūlamadhaḥ śākham = ūrdhvamūlamadhaśśākham
Manaḥ ṣaṣṭhānindriyāṇi = manaṣṣaṣṭhānindriyāṇi

हिंदी व अंग्रेजी भाषा में में आचार्य नारायण जी शेट्टे एवं गीता प्रवीण रूपल जी शुक्ला द्वारा अभी तक अनेक स्तर 1 व 2 हेतु ज़ूम वर्गों का आयोजन कर व्याकरण प्रशिक्षण व शंका समाधान सत्र आयोजित किये गए हैं। प्रत्येक वर्ग में एक साथ 5000 से भी अधिक साधकों की उपस्थिति साधकों की संस्कृत के प्रति अगाध प्रेम व श्रद्धा को प्रदर्शित करती है।
यह मागदर्शिका सभी प्रशिक्षार्थियों को नि:शुल्क प्रदान की जाती है एवं ज़ूम पर होने वाले सत्र बाद में भी देखने हेतू गीता परिवार के यूट्यूब चैनल व learngeeta.com पर उपलब्ध रहती है।

संस्कृत भाषा के व्याकरण में स्वर तथा व्यंजन, ह्रस्व व दीर्घ स्वर सभी बातों को समझाया एवं बताया गया। व्यंजन 5 वर्गों में विभाजित हैं। अनुनासिक व्यंजन(ङ्, ञ्, ण्, न्, म्) के प्रयोग को स्पष्ट किया गया। बताया गया कि क वर्ग का उच्चारण कंठ के प्रयोग से किया जाता है, ट वर्ग का उच्चारण मूर्धन्य होता है, त वर्ग का उच्चारण दांतो से होता है, च का उच्चारण तालू से होता एवं प वर्ग का उच्चारण होठों से होता है।

व्याकरण वर्ग में तालव्य वर्ण, मूर्धन्य वर्ण, ओष्ठय, दन्त्य वर्ण, अनुनासिक प्रयोग, स्वरों की मात्राएं, अनुस्वार: (•), विसर्ग (:), आघात (||) सभी आवश्यक नियमों को व्याकरण वर्ग में संपूर्ण पद्धति से सिखाया गया। संस्कृत में 13 स्वर होते हैं। स्वर का उच्चारण स्वतंत्र होता है। व्यंजन का उच्चारण स्वर के साथ मिलाकर किया जाता है। संस्कृत में ह्रस्व व दीर्घ का

उच्चारण ध्यानपूर्वक एवं सही प्रकार से करना चाहिए। महर्षि पतंजलि, पाणीनि, कात्यायनी के शिक्षा शास्त्र के महत्वपूर्ण नियमों के आधार पर इस नियमावली की रचना की गई है, जो श्रीमद्भगवद्गीता सीखने में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई है। इससे हमारा उच्चारण शुद्ध होता है एवं संस्कृत भाषा का उत्तम ज्ञान प्राप्त होता है।

इसी तरह सभी आदरणीय गुरुजनों के निर्देशानुसार हर महीने गीता परिवार में विशेष व्याकरण सत्र का आयोजन किया जाता है। कई प्रतिभागी इसका लाभ उठाकर संस्कृत भाषा संपूर्ण रूप से सीखते हैं तथा विश्व में इस प्राचीन भाषा का प्रचार और प्रसार करते हैं।

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