
कोविड में गीता
प. पू. स्वामीजी एवं पू. स्वर्गीय श्री ओंकारनाथ जी मालपाणी ने जब गीता परिवार की स्थापना की उस समय से ही गीता परिवार को एक साधना के रूप में कार्यकर्ताओं के समझ प्रस्तुत किया।
और आज भी गीता परिवार की यह मूल भावना वैसे ही है। Learngeeta कार्यक्रम के अंतर्गत हम इसे स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। आज हज़ारों की संख्या में गीता परिवार से जुड़कर साधक दिन रात बिना किसी पारितोषिक या नाम आदि के निरंतर पूरी श्रद्धा से कार्य कर रहे हैं। मनुष्य के जीवन का मुख्य ध्येय साधना है जिससे वह अपने दोषों को, जन्मांतर के पापों को एवं परम् लक्ष्य को प्राप्त करने जी बाधाओं को दूर कर सके।
यदि गीता परिवार के कार्य की व्याख्या गीता की दृष्टि से की जाए तो मात्र एक शब्द में यह कार्य समाहित हो जाता है - “कर्मयोग”।
यही तो कर्मयोग है। कार्यकर्ता ‘ॐ श्रीकृष्णर्पणमस्तु’ बोलकर बिना किसी अपेक्षा के स्वार्थरहित होकर अपना अमूल्य समय एवं ऊर्जा दे रहे हैं।गीता में भगवान ने कहा है -
‘यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यमिति चापरे।’
गीता परिवार का कार्य भी यज्ञ अर्थात् साधन की दृष्टि से हमारा मनोनीत कर्तव्य है, जिसमे अपने सांसारिक सुखों की आहुति डालकर परम् सुख की ओर बढ़ने की प्रेरणा प्रगाढ़ होती है। ओर गीता कार्य प्रचार हेतु अपने समय एवं ऊर्जा को लगाना यह परम दान है, अंत मे किसी भी कार्य को करने में बाधा न आये ऐसा हो नही सकता। साधना जितनी बड़ी होगी समस्याएं भी उतनी गहरी होंगी। और उन्हें सहर्ष सहन करना ही हमारा तप है।
**“लोकमन संस्कार करना यह परम गति साधना है।”
“राह काटों से भरी है कुशलता से लांघना है।”**
हमारे कार्यकर्ताओं ने इसे बड़ी दक्षता से समझा है। यही तो कारण है कि कितने ही साधक कोविड पॉजिटिव होकर भी अपनी कक्षा लेना, उसमे पढ़ना, पढ़ाना, टेक आदि की सेवा देना छोड़ा नही।
कितने ही लोगों ने कक्षाओं के बीच में ही अपने प्रियजनों को खो दिया किन्तु इस मुश्किल समय मे भी उन्होंने गीता की कक्षा छोड़ी नही वरन् और अधिक उत्साह के साथ ये इस यात्रा में आगे बढ़ गयें।
अनुभव तो यहां तक आ गए कि एक 80 वर्ष की माता जी अपनी अंतिम सांसे ले रही थीं एवं उस काल मे भी उन्होंने गीता परिवार द्वारा निर्मित गीता पठन सामग्री नही छोड़ी, श्लोकों की ऑडियो, पीडीएफ प्रिंट्स सभी को हृदय से लगाकर रखा एवं उसी अवस्था मे परलोक गमन किया। यह घटना एवं इसीप्रकार की अन्य घटनाएं मन को झंझोर कर रख देती हैं।
इसीक्रम में एक अनुभव यह भी आता है कि हमारी ही एक प्रशिक्षिका आ. किरण मुंदडा जी जो कि गीता परीक्षाओं में परीक्षक के रूप में अपनी सेवा देती हैं। किसी कारण से उन्हें जिज्ञासु परीक्षा के समय अस्पताल में एडमिट करना पड़ा। किन्तु गीता परिवार की साधना की शक्ति, घटना स्मरण में आते ही आह! निकल आती है कि उन्हीने किसी कार्यकर्ता को इसकी भनक नही लगने दी एवं हॉस्पिटल के बेड से ही उन्होंने गीता परीक्षाएं ली। अपने सेवा को अपना परम् कर्तव्य बनाकर ऐसे जटिल अवस्था मे भी उसे छोड़ा नही। और यह बात मात्र कार्यकर्ता की नही किन्तु कितने ही प्रशिक्षार्थी भी ऐसे हुए जिन्होंने गीता परीक्षाएं अस्पताल के बेड से ही दी।
तब ही तो हमारे संजय भैया एवं आशू भैया कहते हैं कि ऐसे सभी कार्यकर्ता एवं गीता साधक प्रणम्य हैं। जब सभी घटनाओं को एक साथ याद करो तो कुछ ऐसा प्रतीत होता है कि
**‘एक हाथ मे ग्लूकोज़ की बोतल तो दूसरे हाथ मे Learngeeta की क्लास...
नयनो में जल की धारा तो और धारा में गीता ही एक आस.. सूखे कंठो में अध्यात्म की प्यास...
यही तो है गीता परिवार, यही तो है एक साधना।’**

