गीता जयन्ती महोत्सव
गीता परिवार द्वारा गीता जयंती महोत्सव मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी, संवत् 2077 तदनुसार 25 दिसंबर 2020 को शाम 7 से 8 बजे तक ऑनलाइन पद्धति से मनाया गया।
25 दिसंबर 2020, https://youtu.be/TvIpMwwdcjE
यह महोत्सव परम पूज्य श्री गोविंददेव गिरि जी महाराज जो गीता परिवार के सर्वेसर्वा हैं, के सान्निध्य में तथा पूज्य आचार्य श्री बालकृष्ण जी की उपस्थिति में संपन्न हुआ।
महोत्सव का आरंभ श्रीमती नीता जी मूंदड़ा के द्वारा प्रार्थना से की गई। आदरणीय श्री संजय भैया मालपाणी जी ने महोत्सव तथा गीता परिवार की संक्षिप्त प्रस्तावना एवं अन्य उपक्रमों के बारे में बताया।
पूज्य श्रीगोविंददेव गिरी जी महाराज और पू. आचार्य श्री बालकृष्ण जी की प्रशंसा कर उन्हें वंदन किया। तत्पश्चात् दीप प्रज्ज्वलन के साथ कार्यक्रम आरंभ हुआ। तत्पश्चात् अनेक बालक बालिकाओं ने अपने नृत्य द्वारा श्रीकृष्ण का विराट रूप दर्शाया ।
गीता परिवार के उपाध्यक्ष आदरणीय श्री आशू भैया ने ऑनलाईन गीता संथा वर्ग को बहुत ही कम समय में कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया तथा गीता माँ का प्रचार - प्रसार कितनी तीव्र गति से हुआ है, यह बताकर उनके प्रयासों की सराहना की।
आ. आशू भैया ने पूज्य श्रीगोविंददेव गिरि जी महाराज और आचार्य बालकृष्ण जी महाराज को वंदन करते हुए उनका स्वागत किया। श्री संजय जी मालपाणी भैया ने बताया कि आज इस महोत्सव में 70 देशों से 50,000 गीताप्रेमियों द्वारा बारहवें एवं पंद्रहवें अध्याय का ऑनलाइन सस्वर पाठ करेंगे। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पू. आचार्य बालकृष्ण जी ने अत्यंत हर्षपूर्ण अंत:करण से कहा- भगवद्गीता में कर्म की निवृत्ति बतायी है, लेकिन निवृत्ति का अर्थ कर्म को छोड़ना नहीं है। कर्म से विमुख नहीं होना है। निवृत्ति का अर्थ निर्लिप्तता है। निर्लिप्त हो जाए तो सुख में, दु:ख में, राग में, द्वेष में, अनुकूलता में, प्रतिकूलता में, संसार में उलझाने वाले जो तत्व हैं उनसे हम निवृत्त हों।
ऐसा कुछ भी नहीं है जो भगवद्गीता में नहीं है। गीता का एक-एक शब्द सफल मानव जीवन के लिए पर्याप्त है। एक श्लोक भी अगर हम अपने जीवन में उतार लें तो हमारा जीवन सफल हो जाये।
पू. आचार्य बालकृष्ण जी ने गीता परिवार, प. पू. स्वामीजी, श्री संजय मालपाणी, श्री आशू भैया तथा उनकी टीम की सराहना करते हुए कहा कि, भगवान हम सबको भक्तिभाव से और अनासक्त भाव से भर दें। भगवद्गीता कहती है प्रयास मत छोड़ो। महर्षि पतंजलि कहते हैं निरंतरता, दृढ़ता होनी चाहिए। आज की स्थिति पर आचार्य बालकृष्ण बोले, आज हम सबकी अवस्था अर्जुन जैसी है।
आगे उन्होंने बताया, हम उस परंपरा के सहभागी हैं कि, यहाँ स्वयं भगवान ने उपदेश किया है, आज संसार में लोग कर्म तो करते नहीं पर फल की इच्छा रखते हैं, कर्म करना हमारा कर्तव्य है लेकिन फल देना परमेश्वर की व्यवस्था है। इसी क्रम में आदरणीया श्रीमती सुवर्णा काकी मालपाणी जो गत 34 वर्षों से गीता पढ़ा रही हैं, उन्होंने कोरोना काल में प्रशिक्षक तैयार करने का काम बखूबी निभाया है, उन्होंनें और उनके समूह में शामिल आ. सौ. सुनिता अटल जी, मंजू मणियार जी, मंजू सोमाणी जी, जयश्री मणियार जी, जयश्री अटल जी, रचना मालपाणी जी, छाया अग्रवाल जी, प्रज्ञा डांगे जी और नीलांबरी जी ने हारमोनियम पर संगत देते हुए, 12वें अध्याय का (जिसका नाम भक्तियोग है) और 15 वें अध्याय (जो पुरुषोत्तम योग नामसे जाना जाता है) का एक स्वर में सुमधुर पाठ किया।
फिर संजय भैया ने प. पू. स्वामीजी महाराज को वंदन किया और अनुरोध किया कि वे हमें मार्गदर्शन करें व आशीर्वचन प्रदान करें।
अत्यंत आनंद से भरे अंत:करण से स्वामी जी ने बोलना आरंभ किया, उन्होंने कहा दीप प्रज्ज्वलन के समय मैं पूज्य बालकृष्ण जी की तथा आप सबकी, जिन्होंने गीता जयंती महोत्सव के लिए परिश्रम उड़ेल दिये हैं आरती उतार रहा था। वे सारे लोग जिन्होंने आज पाठ किया वो सारे मेरे लिए अभिनंदनीय है। भगवान उनसे प्रेम करते हैं जो भगवान का कार्य करते हैं, भगवान सक्रिय, क्रियाशील भक्ति चाहते हैं, भगवान के प्रति प्रेम हमारी क्रियाओं में दिखना चाहिए। उन्होंने कहा कि “आचार्य बालकृष्ण के बारे में सोचता हूँ तो मेरा अंत:करण भर आता है, उन्होंने स्वयं आयुर्वेद को माध्यम बनाकर भारत की गरिमा को सारे संसार में स्थापित कर दिया है। उन्होंने आयुर्वेद की यह चुनौती स्वीकार की फिर भी अपना जीवन सादगी में रखा। उन्होंने आगे कहा कि आचार्य जी का और मेरा प्रेम पुरातन है क्योंकि हम लोग एक ही कार्य अलग अलग आयामों में कर रहे हैं, भारत माता की सेवा कर रहे हैं। स्वधर्म, अपना कर्तव्य करना बड़ा ही प्रशंसनीय है। सभी को सोचना चाहिए कि मैं केवल अपने लिए न रहते हुए, सारे सृष्टि के लिए बन जाऊँ, अर्थात सर्व भूतहिते रता:, हमें बालकों को संस्कार देने चाहिये, अगली पीढ़ी को तैयार करना चाहिए। कार्यक्रम के प्रति आश्चर्य प्रदर्शित करते हुए उन्हें गदगद मन से बोला - “यह कारवाँ इतना बढ़ गया है कि मैंने भी कभी कल्पना नहीं की थी, यह सारा मेरे साथियों का पुरुषार्थ है, यह पुरुषार्थ यह प्रेम निरंतर बढ़ता जाए। Universal Brotherhood हमारे भीतर जागृत रहे । विश्व बंधुता का भाव गीता परिवार द्वारा जागृत किया गया। Sky is the limit, हम निरंतन आगे बढ़ते जाएँ ऐसी प्रार्थना मैं करता हूँ” यह कहते हुए प. पू. स्वामी जी ने अपने शब्दों को पूर्ण विराम दिया।
इसके पश्चात् ध्रुव ग्लोबल एकेडमी के बालकों द्वारा प्रस्तुत गीता जी की आरती ने सभी के मन को गीता भक्ति की भावना से भर दिया। सभी मानों उसमें रम गए । अंत में गीता परिवार दक्षिणांचल प्रमुख एवं पू. स्वामीजी के प्रिय शिष्य आ. श्री हरि नारायण व्यास जी ने आभार प्रदर्शन किया। पूरे कार्यक्रम को सुन्दरता से समाप्त करते हुए सुलेखा सोनी जी ने समापन प्रार्थना की और इसी के साथ गीता जयंती महोत्सव का समापन हुआ ।

