०२संत वाणी
स्वागत - ‘गीता मैत्री’ का

।।ॐ।।
गीता-गोरस उपनिषदों का
कृष्ण-कन्हैया बाँट रहे
सुनकर दौड़े बालक सारे
धूम मची, सब लूट रहे
ग्वाल बाल - बालाएँ अगनित
जुटकर गीता सीख रहे
गीता पढ़ें, पढ़ायें कैसे
यह प्रयास कर देख रहे
धन्य हुआ आभासी परदा
गीता-गान चला ऐसा
वर्षावधि का विवरण इसमें
एकत्रित है सुंदर सा
'गीता-मैत्री' हम सबकी यह
जनम-जनम तक बनी रहे
मधुरिम है यह यात्रा मित्रों
टोली अपनी जमी रहे
मार्ग० कृ. २
युगाब्द. ५१२३
दि. २१.११.२०२१
स्वामी गोविंददेवगिरि
