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गीता मैत्री अंक १जून से अक्टूबर २०२१
१०पाठ्यक्रम और परीक्षाएँ

कण्ठस्थीकरण परीक्षायें

परीक्षा से न लगे हमें डर।
हम तो हैं गीता परिवार के पर।
प्रसिद्धि की ऐसी उड़ान भरेंगे।
हर घर में गीता पहुँचायेंगे।

गीता पढ़ें, पढ़ाएं और जीवन में लाएं यह उद्देश्य लेकर हम गीता परिवार के साथ जुड़ चुके हैं। आगे बढ़ने की प्रेरणा हमें गीता परिवार से मिली कि हम सब मिलकर गीतारूपी भवसागर में डूब जाएं और हमारा हाथ श्री कृष्ण थाम लेवें। गीता जी सीखने के लिए हमें learngeeta कार्यक्रम के अंन्तर्गत स्तर एक (L-1) में पंजीकरण करना होता है। इसके पश्चात् हम गीता कक्षा के व्हाट्सएप समूह में जुड़ जाते हैं। उस ज़ूम लिंक के द्वारा हम स्तर एक की कक्षा में सम्मिलित होते हैं।

गीता कक्षाओं के चार स्तर हैं । गीता कक्षाओं में पंजीकरण करने की न्यूनतम आयु 6 वर्ष है। अपने माता- पिता, भाई - बहन, दादा - दादी, नाना - नानी को गीता कक्षाओं में सीखते देख छोटे बच्चों का भी रूझान गीता अध्ययन में होने लगा है। कहीं कहीं तो माता – पिता के साथ ही सीखते-सीखते 3 - 4 साल के बच्चे भी बहुत ही अच्छे से गीता के अध्यायों को कंठस्थ कर के बोलने लगते हैं।

जिस प्रकार मनुष्य जीवन की चार अवस्थाएं होती है उसी तरह गीता स्तर को हम जीवन की अवस्थाओं के साथ जोड़ सकते हैं। जैसे प्रथम “बाल्यावस्था”, अच्छे संस्कार करने का समय। गीता परिवार द्वारा यह कार्य प्रशंसनीय है। ‘संस्कार’ स्तर एक से ही शुरू होता है। अर्थात इस स्तर में 12वां व 15वां अध्याय सिखाया जाता है। इसमें पुरुषोत्तमयोग और भक्तियोग मार्ग बताया गया है। बालक रूपी साधक को गीता परिवार उंगली पकड़ कर जीवन का एक लक्ष्य दिखाते हैं और हम उस राह पर हँसते-हँसते चलने लगते हैं। मन लगाकर गीता पढ़ने का हमारा साहस और भी बढ़ जाती है। हमें जो कुछ प्राप्त करने की इच्छा है वह यहाँ ही मिलेगी और कहीं भी नहीं। इस दृढ़ संकल्प के साथ हम उभरते हैं। यह अनुभव गीता परिवार के साथ जुड़े हुए प्रत्येक साधक को होता है। स्तर-दो अर्थात् हमारे मानवीय जीवन की षोडशावस्था, इस स्तर पर, सूक्ष्म से सूक्ष्म व्याकरण सहित उच्चारण ह्रस्व, दीर्घ,आघात, विसर्ग, अनुस्वार उपयोग पर बल दिया जाता है। स्तर-तीन यानि तरुणावस्था इसमें हमें गीता के 6 अध्यायों का पठन सिखाया जाता है। हम और भी प्रगल्भ हो जाते हैं और स्तर-चार यानि प्रौढ़ावस्था। इसमें हमें गीता के 6 अध्यायों का पठन और कंठस्थीकरण करना होता है। हमें जो कुछ प्राप्त करने की इच्छा है वह यहां ही मिलेगी और कहीं भी नहीं, इसी दृढ़ संकल्प के साथ हम उभरते हैं। यह अनुभव गीता परिवार के साथ जुड़े प्रत्येक साधक को होता है।

गीता कक्षाओं में प्रत्येक स्तर पर परीक्षा होती है। परीक्षाओं के कई लाभ हैं और परीक्षा लेने के उद्देश्य भी हैं।

गीता कक्षा में गीता परीक्षा लेने का उद्देश्य यह है कि आप इस महान ग्रंथ को कण्ठस्थ करें और अपने इस ज्ञान पर ध्यान एवं मनन करके जीवन में आने वाली मुसीबतों और बाधाओं से चिंता मुक्त होकर कर्म की राह पर चल सकते हैं। जिस तरह जब युद्ध में अर्जुन जी अपना कर्म भूल गए थे तब कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर श्रीकृष्ण ने उनके सारथी बनकर उन्हें गीता उपदेश देकर सही राह दिखाई थी और सिखाया था कि कर्म पर ध्यान रखें फल की इच्छा ना करें।

गीता कक्षाओं में गीता परीक्षा लेने का एक और उद्देश्य यह भी है कि साधकों को गीता परीक्षाओं के माध्यम से अधिकतम अध्याय कण्ठस्थ हो जाए जिससे वह हमारे मस्तिष्क में दीर्घकाल तक रहें। हमें आत्मसात हो जाएं और जब हम उन श्लोकों के अर्थों का चिंतन करते हैं तो वे हमें शीघ्रता से समझ में आ जाएं। गीता अध्याय कण्ठस्थ करने के बाद, उनके अर्थ समझने का करोड़ों गुना लाभ मिलता है, जैसे हम व्यापार को समझने के लिए एम.बी. ए. की डिग्री लेते हैं। उसी तरह इस भवसागर को पार करने के लिए हमें गीता जी का ज्ञान होना बहुत जरूरी है। गीता जी को जीवन में लाने से हमारी बुद्ध ,आचार-विचार , चित्त की एकाग्रता में बड़ा ही परिवर्तन आता है। संसार को देखने की दृष्टि ही बदल जाती है। हमारा बाह्य और अंर्तमन बदल जाता है, हम अंर्तमुखी हो जाते हैं । एक समय ऐसा आता है कि हम गीताजी में तल्लीन हो जाते हैं।

प्रत्येक स्तर पर परीक्षा देना आवश्यक नहीं है, किन्तु परीक्षा देने से साधकों का मनोबल बढ़ जाता है। गीता कक्षाओं में परीक्षा देने के लिए कोई आयु नहीं है। 4 साल के बालक से लेकर किसी भी उम्र तक आप परीक्षा दे सकते हैं।
आइए विभिन्न परीक्षाओं के बारे में जानते हैं। गीता कक्षाओं में कुल 5 परीक्षाएं होती है:-

1. गीता गुञ्जन
2. गीता जिज्ञासु
3. गीता पाठक
4. गीता पथिक
5. गीताव्रती

अब जानते हैं कि, गीता परिवार की परीक्षाएं किस तरह से होती हैं। 4 गीता परीक्षाओं का तरीका एक समान है। गीता गुञ्जन परीक्षा देने का तरीका कुछ अलग है।

  • गीता गुञ्जन :- इस परीक्षा में साधक को 12वें और 15 वें अध्याय के, शुद्व उच्चारण के साथ, अपना ऑडियो वीडियो बनाकर व्हाट्सएप ग्रुप में भेजना होता है। प्रशिक्षक के द्वारा उसे चेक किया जाता है, सही होने पर प्रशिक्षणर्थी को उत्तीर्ण घोषित किया जाता है और गीता गुञ्जन प्रशस्ति पत्र दिया जाता है। यह परीक्षा बिल्कुल सहज और सरल है।
  • गीता जिज्ञासु:- जब हम स्तर दो में प्रवेश लेते हैं तो उसके बाद जो परीक्षा होती है उसे गीता जिज्ञासु कहते हैं। इस परीक्षा के लिए 3 अध्याय (12, 15, 16वाँ ) कण्ठस्थ होने चाहिए। सही उच्चारण के साथ इस बात पर ध्यान रखना होता है कि श्लोक में कहाँ आघात, अनुस्वार, हलंत, ह्रस्व और दीर्घ का उपयोग करना है और जब प्रशिक्षक हमारी परीक्षा लेते हैं तो प्रशिक्षक जो भी श्लोक पूछते हैं प्रशिक्षणर्थी को आंखें बंद करके उसको बोलना होता है। अध्याय 12, 15 , 16वें अध्याय के शुद्ध कण्ठस्थ परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले साधकों को गीता जिज्ञासु उपाधि से विभूषित किया जाता है एवं प्रशस्ति पत्र ई-मेल या पोस्ट के द्वारा प्रदान किया जाता है।
  • गीता पाठक: - गीता पाठक परीक्षा में कुल 6 अध्याय कण्ठस्थ कर परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले गीता साधक को गीता पाठक की उपाधि से विभूषित किया जाता है।
  • गीता पथिक :- गीता पथिक परीक्षा, स्तर 3 पर ली जाती है । इसमें कुल 12 अध्यायों को शुद्ध कण्ठस्थ करना होता है। परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले साधकों को गीता पथिक की उपाधि से विभूषित किया जाता है।
  • गीताव्रती :- जब प्रशिक्षार्थी स्तर-4 में आते हैं और परीक्षा देते हैं उसे गीताव्रती कहते हैं। गीताव्रती परीक्षा देने के लिए संपूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता जी अर्थात् 18 अध्यायों के 700 श्लोकों को कण्ठस्थ कर परीक्षा देनी होती है। परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले साधकों को गीताव्रती उपाधि से विभूषित किया जाता है।

प्रत्येक स्तर पर परीक्षा में यही आकलन किया जाता है कि प्रशिक्षर्थी का उच्चारण सही है या नहीं और आघात, दीर्घ हृस्व, अनुस्वार, अनुनासिक, हलंत का ध्यान रख रहे हैं या नहीं और श्लोक आपको कण्ठस्थ हैं या नहीं। गीता गुंजन के बाद होने वाली परीक्षाओं में, जो भी अध्याय परीक्षा के लिए निर्धारित हैं उन सबकी पुनरावृत्ति के लिए, परीक्षा से पहले, एक्स्ट्रा क्लास होती हैं। इनमें वह अध्याय फिर से सही उच्चारण के साथ सिखाया जाता है और कहाँ गलती हो सकती है, बताया जाता है।

गीता श्लोक कण्ठस्थ करने के बहुत से लाभ हैं, पूज्य स्वामी गोविंददेव गिरी जी महाराज हमेशा कहते हैं कि गीता के अध्याय कण्ठस्थ करने से वाणी शुद्ध होती है। जिह्वा का व्यायाम होता है। कंठ की नस नाड़ियों का शुद्धिकरण होता है। कंठ की सुमधुरता बढ़ती है । हमारी थायराइड ग्रंथि कार्यान्वित होकर उसका शरीर पर बहुत अच्छा प्रभाव होता है। इसके नियमित पाठन मानव को आध्यात्मिक और शारीरिक दोनों लाभ होते हैं।

एक-एक परीक्षा पार करते हुए साधक गीता पथ पर आगे बढ़ते जाते हैं और लंबे समय तक गीता परिवार से जुड़ जाते हैं। इससे सबका उद्धार हो जाता है। साधक के साथ-साथ उनके परिवार, मित्रों, समाज और अंत में पूरे विश्व का उद्धार होता है।

ऐसा लगता है और विश्वास है कि साक्षात् श्री कृष्ण भगवान स्वयं ही अपने साधकों से गीता का अनुष्ठान करवाते हैं। यह अद्भुत अनुभव साधक लेते हैं । गीता पठन से साधक का शरीर भगवद् स्वरूप की आभा से प्रकाशमान हो जाता है। जीवन के उद्देश्यों को राह मिल जाती है। आत्म रंग का आनंद ले सकते हैं। गीतामय जीवन ही हम सबके लिए पथ प्रदर्शक है।

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