प्रास्ताविक
गोवर्धन जो स्वयं भगवान ने उठा लिया!
संथा कक्षा का ऑनलाइन उपक्रम लखनऊ की बेटियों ने मात्र 15-20 साधकों के साथ आरंभ किया था। मुझे अतिथिरुप में आमंत्रित किया गया था। यह उपक्रम देख मैंने आशू भैया से कहा कि इसे हम कम से कम एक हजार लोगों तक पहुँचाते हैं। आशू भैय्या ने एक लिंक तैयार कर लोगों को जुड़ने का आवाह्न किया कुछ घंटो में ही 2000 गीताप्रेमी जुड़ गये।
हमें अंदाजा ही नहीं था कि ऐसा प्रतिसाद मिलेगा। मैंने सत्वर संगमनेर के 25 प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण श्रीमती सुवर्णा काकीजी से आरंभ करवाया। कुछ युवा कार्यकर्ता इस उपक्रम को तंत्र सहयोग देने हेतु जोड़े। पहला वर्ग सुचारु रूप से संपन्न हुआ। जब तक दूसरा वर्ग आरंभ होता तब तक और भी प्रशिक्षक तैयार किये गये और देखते ही देखते यह कारवाँ आगे बढ़ता गया। आज प्रतिदिन लगभग 1000 ज़ूम कक्षाएँ चल रही हैं। 10 भाषाओं में संस्कृत देवनागरी के गीता श्लोकों को लिखवाया गया। अनुस्वार, विसर्ग, आघात के चिह्नांकन किये गये और लगभग 5000 कार्यकर्ता इस काम से जुड़ गये।
पीछे मुड़कर देखते हैं तो मात्र एक हजार लोगों के लिए आरंभिक यह उपक्रम देखते ही देखते तीन लाख लोगों को लाभान्वित कर गया। यह देखकर हम भी अचंभित हो गए। यह कैसे संभव हुआ, इस विषय में सोचते हैं तो प्रतीत होता हैं कि यह पूज्य स्वामी श्रीगोविन्ददेव गिरि जी महाराज का संकल्प प्रत्यक्ष भगवान श्रीकृष्ण द्वारा संघ शक्ति के माध्यम से ही चलाया जा रहा हैं। गीता से प्रेम करने वाले हजारों लोग गीता परिवार के सदस्य बन इस उपक्रम से निःस्वार्थ भाव से जुड़ गये हैं।
हर सप्ताह विवेचन करने का दायित्व मुझे सौंपा गया। मेरे जैसे अल्पमति अबोध द्वारा इस कार्यकाल में डेढ़ सौ से अधिक विवेचन ‘मूकं करोति वाचालं’ की अनुभूति देने वाले रहे हैं। आज जहां भी जाता हूँ, लोग गीता के नाम से पहचान रहे हैं यह उस परमपिता की अहैतुकी कृपा ही हैं।
आशू भैया के निर्देशन में यह उपक्रम इतना विस्तारित हुआ है यह देखकर अतीव प्रसन्नता का अनुभव करता हूँ । कोई पूछे कि क्या आपने भगवान को देखा है? तो मेरा उत्तर होगा, जी हॉं ! उसका विराट रूप गीता संथा कक्षा को चलाता हुआ मैं देख रहा हूँ… यह गोवर्धन उसी ने उठा रखा है।
डॉ. संजय मालपाणी
राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष
गीता परिवार
