निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्
Learngeeta कार्यक्रम में ये सभी कार्यकर्ता गत डेढ़ वर्षों से निरंतर कार्य कर रहे हैं, इन्हें देखकर गीता का श्लोक स्मरण में आता है -
- स्वामी गोविन्ददेव गिरि
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते।।
भगवद्गीता ने सात्त्विक कार्यकर्ता की जो व्याख्या की है वह इन सभी कार्यकर्ताओं में दिखती है, क्योंकि जिस उत्साह एवं धृति के साथ ये सभी कार्य कर रहे हैं वह अद्भुत है। मुझे तो प्रतीत होता है कि संजय भैया और आशू भैया ने यह प्रण लिया है कि न सोयेंगे न सोने देंगे।
ये सभी कार्यकर्ता दिन में तो कार्य करते ही है किंतु रात्रि में भी इनके कार्यों का प्रवाह नही टूटता है। और यह सबकार्य जो ये कर रहें हैं इसमे किसी का कोई निजी स्वार्थ नही है। सभी के अन्तःकरण में मात्र एक बात है कि गीता घर घर तक पहुँचे। श्रीकृष्ण की वाणी जो मंत्रमयी है एवं सभी मे उत्साह भरती है। गीता हमें अनेक बाते सिखाती है, उनमे से दो बातें जो आज मैं कहना चाहता हूँ प्रथम भगवद्गीता हमे जीवन में संतुलन का संदेश देती है। समत्वं योग उच्यते!
समत्व का जीवन जीना ही तो भगवद्गीताकार ‘योग’ कहते हैं। दूसरी बात है ‘दक्षता’ - ‘अनपेक्ष: शुचिर्दक्ष’
भगवान का भक्त दक्ष भी होना चाहिये यदि वह दक्ष नहीं होगा तो आगे दीर्घकाल तक कार्य नही कर पायेगा। और इन्ही सब बातों को समेटकर ये कार्यकर्ता डेढ़ वर्षों तक कार्य करते रहें। मैं तो इनके साथ नाम मात्र से जुड़ा हूँ। किन्तु फिरभी ये कार्य का श्रेय मुझे दे देते है।
आश्चर्य की बात है कि 117 देशों से तीन लाख से अधिक साधक 13 विभिन्न समयों पर 10 भाषाओं में गीता सीख रहे हैं। गीता इतना व्यापक प्रचार हो गया तो इसे देखकर एक बात संज्ञान में आती है कि यह कार्य हम नही कर रहे हैं किंतु यह कार्य तो स्वयं श्रीकृष्ण ही कर रहे हैं। हमे तो उन्हीने कृपा करके इस कार्य का निमित्त बना दिया। वे स्वयं गीता में कहते हैं- ‘निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्!’
कार्य तो वे स्वयं कर रहे हैं किंतु श्रेय गीता परिवार को देना चाहते हैं। ‘तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व!’
अतः भगवान हमसे यह कार्य करवा रहे हैं। इसी कार्य का सम्पूर्ण एक वर्ष का लेखा जोखा यहां गीता मैत्री में संकलित किया जा रहा इसके लिए मुझे अत्यंत प्रसन्नता है।
आज यह कहते हुए अत्यंत आह्लाद होता है कि गीता सीखने की जो शुद्ध प्रक्रिया आज गीता परिवार द्वारा निर्माण की गई है वह सभी के द्वारा प्रमाण मानी गयी है एवं संसार मे अग्रगण्य है। इसका श्रेय सभी कार्यकर्ताओं को जाता है। हमारी टोली निरन्तर जमकर यह कार्य करती रहेगी।
‘एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह य:। अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति।।’
एक बात हमे अवश्य ध्यान में आती है कि जो लोग इस कार्य मे जुड़ पाएं हैं उन्हें अपनी धन्यता का अनुभव अवश्य होने वाला है और जो लोग इस गंगा में गोते लगाने से रह गयें। उन्हें भी कभी न कभी यह पछतावा अवश्य होने वाला है। इस विराट कार्य को सदा ही संतों का आशीर्वाद है। अतः यह कार्य और पुष्ट होगा इसमे कोई संदेह नहीं है। अतः धन्य है वे जो गीता पढ़ते हैं पढ़ाते हैं एवं जीवन मे लाते है।
आओ गीता प्रचारक बनें
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सहज व सरल ढंग से भगवान की वाणी में गायी गयी भगवद्गीता
का शुद्ध उच्चारण सीखें व अन्यों को प्रेरित कर
भगवान का प्रिय कार्य करने वाला बनें।

