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गीता मैत्री अंक १जून से अक्टूबर २०२१
१२पाठ्यक्रम और परीक्षाएँ

एक्स्ट्रा क्लासेस

जैसा कि हम सबको विदित है, गीता परिवार गीता को सरलता व शुद्धता से सिखाने हेतु सतत प्रयत्नशील है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन का साथ कभी नहीं छोड़ा। हम सब जानते हैं कि युद्ध के आरंभ में ही अर्जुन विषादग्रस्त हो गए थे। उन्होंने, गुण और सामर्थ्य होते हुए भी उन्होंने अपने गुण और सामर्थ्य का स्मरण नहीं किया और वो निराशा और भय से पीड़ित हो गये।

श्री कृष्ण, हर प्रकार से अर्जुन को समझने और संभलने का अवसर देते रहे। उन्हें कर्म करते रहने के लिये प्रेरित करते रहे। अंतत: अर्जुन अपने धर्म के रास्ते पर चलने के लिये तैयार हुए। इसी प्रकार का अनुभव हमें गीता परिवार से जुड़ने पर होता है। गीता परिवार साधकों का हाथ कभी नही छोड़ता। हर साधक अपने (भगवद्गीता सीखने के) मार्ग पर चल पाए और अपने निश्चित गंतव्य तक (जैसे कि L-1, L-2, गीता गुंजन आदि) पहुँच पाये, इसका पूरा ध्यान रखते हैं। साधक को प्रयास करने का अधिक समय मिल सके,गीता परिवार इसके लिये प्रयास कर रहा है।

यही कारण है कि गीता परिवार द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओं के लिये अतिरिक्त कक्षाओं की सुविधा दी जाती है। प्रथम पड़ाव है ‘गीता गुंजन’। इसमे दों अध्याय होते हैं -अध्याय 12 और 15वाँ। प्रत्येक अध्याय की समाप्ति के पश्चात एक अतिरिक्त कक्षा होती है। यह कक्षा अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में होती है।

दूसरा पड़ाव है ‘गीता जिज्ञासु’। यह तीन अध्यायों पर आधारित है। अध्याय 12,15,16 के लिये दो अतिरिक्त कक्षाओं के संचालन होता है, एक पुनरावृत्ति के लिये और दूसरी व्याकरण के लिए। इसमें नियम, आघात और उच्चारण के तरीके को दोहराया जाता है, जिससे परीक्षार्थियों को परीक्षा का अभ्यास करने में मदद हो। साधकों के प्रश्नों को समझ कर उन्हें मार्गदर्शन दिया जाता है।

उसके बाद के पड़ाव हैं - गीता पाठक, गीता पथिक और गीताव्रती। इन महत्वपूर्ण पड़ाओं को पार करने हेतु तथा साधक के संशय निवारण हेतु कक्षाओं की श्रृंखला बनायी जाती है, जो 3 या 4 दिन की होती है। एक पूर्व नियोजित समय पर उस कक्षा में प्रतिदिन एक अध्याय का शंका-समाधान होता है।

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मूल अंक, पृष्ठ ४०