सम्पादकीय
Learngeeta प्रोग्राम का जो वर्तमान स्वरुप है इसका संकल्प पूज्य स्वामीजी महाराज ने जब दिसम्बर 2019 में गीता परिवार के कार्यकर्ताओं के सामने ‘हर हर गीता - घर घर गीता’ संकल्पना के साथ रखा, तब यह अनुमान किसी को नहीं था कि इतना शीघ्र ही यह स्वप्न साकार भी हो जायेगा।
गीताशास्त्रमिदं पुण्यम्
गीता परिवार की स्थापना पूज्य स्वामीजी ने परमादरणीय स्व. श्री ओंकारनाथ जी मालपाणी की छत्रछाया में पाण्डव पञ्चमी को सन् 1986 में की थी और तब ही यह घोषणा कर दी थी कि भविष्य में यह पूरे विश्व का सांस्कृतिक नेतृत्व करने वाली संस्था बनेगी। भगवद्भक्ति, भगवद्गीता, भारतमाता, विज्ञानदृष्टि एवं स्वामी विवेकानंद के आदर्श, इस पञ्चसूत्री आधार पर गीता परिवार ने गत वर्षों में देश के छोटे-छोटे गाँवों से लेकर महानगरों तक मीडिया की चमक दमक एवं ग्लैमर आदि से दूर रहकर बाल संस्कार, योग एवं गीता प्रचार का कार्य नि:स्वार्थ भाव से निरंतर किया।
कोरोना काल में गीता परिवार के अनेक केन्द्र अपने-अपने स्थान पर ‘आपदा अन्नसेवा’ के विशाल उपक्रम द्वारा लाखों प्रवासी मजदूरों और दैनिक आय पर आधारित जनमानस तक भोजन पँहुचाने की वृहत सेवा करते रहे। तब यही विचार मन में निरंतर चला कि वर्षों की गीता परिवार की साधना के फल के रूप में भगवान ने ऐसी सेवा के लिये हमें चुना और जब यह ‘Learngeeta - गीता संथा वर्ग’ विशाल वटवृक्ष बनता दिखायी दिया तब ऐसा प्रतीत हुआ कि साधना और सेवा का यह प्रत्यक्ष प्रसाद है कि प्रभु ने अपना सबसे प्रिय कार्य करने हेतु गीता परिवार के कार्यकर्ताओं को नियुक्त कर दिया। गीता परिवार को माध्यम बनाकर आज हजारों-हजार गीतासेवी पूरे विश्वपटल से इस महायज्ञ में अपनी आहुति अर्पित कर अपने जीवन की धन्यता का अनुभव कर रहे हैं।
मात्र पाँच-सात सौ साधकों को सिखाने के विचार से आदरणीय संजय भैया की प्रेरणा से जब इसका नियोजन हुआ तो कल्पना भी नहीं थी कि यह विश्वपटल पर भगवद्गीता का परचम फहराने वाला यह इतिहास का सबसे बड़ा प्रकल्प बन जायेगा। ‘गीताप्रेमी जुड़ते गये और काफिला बनता गया’ मात्र कुछ घंटों में ही 2000 साधकों द्वारा फॉर्म भरने से हमें भविष्य में होने वाले इस चमत्कार की आहट मिल गयी थी। जैसा कि भगवान ने 18वें अध्याय के 69वें श्लोक में कहा – ‘न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः’ उसी के अनुसार भगवान ने अपनी सर्वाधिक प्रिय सेवा के लिए हमें चुन लिया है, ऐसे संकेत मिलने लगे।
लगभग एक वर्ष में 2.5 लाख गीताप्रेमियों का पंजीकरण, नित्य 50000 से अधिक साधकों की ज़ूम कक्षाओं में उपस्थिति, 10 भाषाओं और 13 समय सत्रों में सीखने की सुविधा, इतना प्रचुर शुद्ध ऑडियो वीडियो पीडीएफ आदि साहित्य, उत्तम विनम्र प्रशिक्षकों का सान्निध्य एवं सभी कुछ पूर्णत: नि:शुल्क। साप्ताहिक विवेचन सत्रों में प्रति सप्ताह 30000 से भी अधिक दृश्यों(views) के साथ गीता पाठ एवं विवेचन श्रवण से अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के अनुभवों के भण्डार सुनने को मिलना किसी दैवीय चमत्कार की ही बात लगती है। कोरोना की इस भीषण आपदा में हममें से किसने अपने निकट के इष्ट-मित्र, परिजन, सम्बन्धियों को नहीं खोया और ऐसे में भगवद्गीता का सान्निध्य हजारों साधकों को अवसाद के काल से निकालकर भक्तिपूर्ण कर गया। 5 वर्ष से 88 वर्ष आयुवर्ग के प्रतिमाह लगभग 3000 से 5000 साधकों का कंठस्थीकरण गीता परीक्षाओं में सम्मिलित होकर हतप्रभ कर देने वाला प्रदर्शन।
भगवद्गीता का विराट दर्शन साक्षात् साकार हो रहा है। अपने भाग्य की मैं कैसे सराहना करूँ, उसके लिए शब्दविहीन सा हो गया हूँ। पूज्य स्वामीजी व आ. संजय भैया के नेतृत्व में इस विशाल रथ का सारथ्य करने की मुझमें कोई योग्यता नहीं दिखती परन्तु ‘जा पर कृपा राम की होई, ता पर कृपा करे सब कोई’, इसका प्रत्यक्ष अनुभव मैं नित्य हर क्षण करता हूँ। अब तो श्रीभगवान् व गुरुदेव के चरणों में यही विनती है कि इस अकिञ्चन दास की एक-एक श्वास बस इस सेवा में ही अर्पित होती रहे। परमपूज्य ब्रह्मलीन पथिक जी महाराज की ये पंक्तियाँ स्मरण हो रही हैं -
वह योग्यता दो, सत्कर्म कर लूँ, अपने हृदय में सद्भाव भर लूँ, नर तन है साधन भव सिन्धु तर लूँ,
हे नाथ! अब तो ऐसी दया हो, जीवन निरर्थक जाने न पाये
‘सर्वभूत हिते रताः’ संकल्प के साथ लर्नगीता की पूरी टीम, कुछ प्रत्यक्ष-कुछ अप्रत्यक्ष, कोई प्रशिक्षक, कोई तकनीकी सहायक, कोई ग्रुप कोऑर्डिनेटर, कोई आई.टी सपोर्ट , कोई टेली कालिंग, कोई ट्रांसलेटर आदि आदि प्रतिनिधित्व इतने क्षेत्र हैं कि सब याद रखना भी कठिन हो जाता है, हजारों की संख्या में नित्य सेवा करने वाले साधक कार्यकताओं का सादर अभिनन्दन। इस गुरुतर गुरु-कार्य करने वालों को सादर साधुवाद। सभी कार्यकर्ता ‘निमित्त मात्रं भव सव्यसाचिन्’ के भाव से अग्रसर हैं। यश लेने में निमित्तमात्र परन्तु कार्य करने के लिए सव्यसाची। प्रभुकृपा और स्वामीजी का आशीर्वाद प्राप्त कर सभी का इह लोक और परलोक दोनों संवर जाये ऐसी शुभकामना सभी के लिये अर्पित करता हूँ।
‘प्रभु की कृपा भयउ सब काजू, जन्म हमार सफल भा आजू’ ये विचारकर सब कार्यकर्त्ताओं को अपने अन्दर धन्यता का अनुभव हो रहा है, ऐसे प्रतिसाद नित्य ही सुनने को मिलते हैं।जब विचार करता हूँ तो मुझे लर्नगीता का कार्य विशाल गोवर्धन पर्वत के समान दीखता है। पूज्य स्वामीजी महाराज भगवान श्रीकृष्ण की तरह इस गोवर्धन को अपनी अंगुलि पर उठाये हुये हैं और हम सब कार्यकर्ता गोप और गोपी बनकर अपनी लाठी लगाकर यश प्राप्त कर रहे हैं।
इस न्यूज़लेटर ‘गीता मैत्री’ के प्रकाशन हेतु पूज्य स्वामीजी ने बहुत समय पूर्व ही मुझे निर्देश दिए थे परन्तु अन्य सेवाओं की प्राथमिकता में इस कार्य को करने में बड़ा विलम्ब हो गया उसके लिये हृदय से क्षमा प्रार्थी हूँ। आशा है हमारी टीम के अथक परिश्रम से तैयार किये गये सब लेखों, आंकड़ों व फोटो आदि को देखकर पाठकों को अत्यन्त आनन्द व संतोष की अनुभूति होगी।
यह गीतामैत्री का अंक प्रति 2 माह में प्रकाशित होता रहे, ऐसा विचार है। इस हेतु पाठक अपने लेख एवं इस पत्रिका में प्रकाशन योग्य सामग्री newsletter.geetamaitri@gmail.com पर भेज सकते हैं, चुनी हुयी सामग्री एवं लेखों को प्रकाशित किया जायेगा।
डॉ. आशू गोयल
कार्यक्रम निदेशक
लर्नगीता, गीता परिवार

