प्रथम L4 वर्ग पूर्णाहुति
पूर्णाहुति का अर्थ है पूर्णता, जो भी कार्य हमने ठान लिया है उसे पूर्ण करना। जो संकल्प स्वामी गोविंददेव गीरि जी महाराज ने लिया, गीतापरिवार के माध्यम से संजय भैया मालपाणी जी तथा डॉ. आशु भैया गोयलजी के द्वारा आरम्भ किया गया था, उसके पूरे चार स्तरों की पूर्णता हुई। ये बहुत ही आनन्द की बात हैं ।
नीता दीदी मुंदड़ा जी ने आरंभिक प्रार्थना की। अविनाश जी संगमनेरकर जो इस उपक्रम की नीव हैं , इन्होने दीपप्रज्वलन करते हुए महोत्सव की भी नींव रखी। संजय मालपाणी जी ने महोत्सव का आरम्भ परम श्रध्येय स्वामीजी तथा स्वामी परमानंद सरस्वती जी महाराज का स्वागत करते हुए किया।
स्वामी गोविंददेव गीरि जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की पुष्पार्चना की। आशू भैया ने कहा कि यह एक सपना था जो हम सबने देखा था, जो आज पूर्ण होते हुए हम देख रहे हैं। जून 2020 में हमारा पहला बैच 2500 साधकों से आरम्भ हुआ। सारे प्रयास नये से शुरु करने थे, सामान्य लोगों के लिए कोई सहज, सुलभ साहित्य उपलब्ध नही था। गीता पठन का शुद्ध उच्चारण करना महत्त्वपूर्ण था। स्वामीजी के सान्निध्य मे एक विद्वानों की समिती का गठन किया गया और अबतक जो उपलब्ध नही था वैसा साहित्य का निर्माण किया। गीता जैसी पढ़ी जाए वैसी ही छापी जाए। सर्व सामान्यों के लिए साहित्य का निर्माण किया गया। गीताजी के उच्चारण के विषय में इतिहास मे एक क्रांति घट गयी। स्वामीजी ने 18 अध्यायों का क्रम बनाकर दिया, कौनसा अध्याय कब और किस क्रम से पढ़ाया जाए ये बताया।
एक साल में 2500 पार्टिसिपंट्स की संख्या 2.5 लाख तक गयी, 2.5 लाख साधकों ने गीता पढने का ठान लिया । 936 वर्गों में लगभग 50,000 लोग दिन में 10 समयों पर 10 अलग-अलग भाषाओं मे, अलग-अलग स्तरों में, अलग-अलग अध्याय सीखते हैं। शनिवार/रविवार को 9 विवेचन सत्र अलग अलग अध्यायों के हिंदी और अंग्रेजी मे चलते हैं । इसके अतिरिक्त व्याकरण के तथा अतिरिक्त वर्ग और हर 3 माह में परीक्षायें होती हैं ।
ये काम होते होते वटवृक्ष बन गया। जो लोग जून 20 मे गीता सीखने के लिए जुड़े उनके, पूरे 18 अध्याय अगस्त 21 मे पूरे हुए और आज इसके पूर्णाहुति महोत्सव में हम सब एकत्र हुए, अब यह यात्रा छूटेगी नही। ऐसे भी यह यात्रा छूटने वाली नहीं क्योंकि गीताजी का अभ्यास पूरा हुआ ऐसा कौन कह सकता है। निरंतर स्नान कराने वाली ये भागीरथी गंगा है। कोई भी कभी भी अपना स्तर पुन: Repeat कर सकता है। परीक्षा में भी यदि मार्क्स कम आये तो वे उसे पुन: कर सकता है। गीता परिवार के सभी साधक गीता माता से सदा जुडे रहें, उनकी गीता मैय्या से मैत्री बनी रहे, प्रीति, भक्ति बढती रहे, इस दृष्टि से प. पू. स्वामीजी के माध्यम से हम सब करते आ रहे हैं । 4 अक्टूबर मे जो नया L1 का बैच शुरू हो रहा है, उसमें नये 50,000 साधक जुडेंगे ऐसी अपेक्षा हैं ।
जो लोग गीता परिवार से जुड़े हैं, वे सदा के लिए जुड़े रहेंगे यही मंगल कामना गीता परिवार आप सभी के लिये कर रहा है। आज मैं बहुत आनंदित हूँ । जो गीताव्रती बने हैं और जिन्होने L4 मे अपना कोर्स पूरा किया उन सबको मैं प्रणाम करता हूँ और उनका अभिनंदन करता हूँ।
संजय भैया ने आशू भैया को धन्यवाद देते हुए उन्होने उन लोगों को आमंत्रित किया जिन्होने इस गोवर्धन को उठा लिया, वे सारे प्रशिक्षक, तंत्र सेवी, जीसी जिन्होने इस यात्रा मे साथ-साथ चलने वाले गीता साधकों को मार्गदर्शन किया, उनकी चारधाम यात्रा पूर्ण करवाई, उन सबके दर्शन करना भी आज के दिवस पर आवश्यक है। फिर उन सभी का एक छोटा-सा वीडियो दिखाया गया ।
तत्पश्चात् सभी गीताव्रतियों को स्क्रीन पर लाकर प. पू. स्वामीजी द्वारा आशीर्वाद प्रदान करवाया गया। स्वामीजी ने कहा कि मैं अचंभित हूँ । आगे स्वामीजी ने कहा कि समर्थ रामदासस्वामी का जन्म रामनवमी को दोपहर को हुआ जिस समय श्रीराम का जन्म हुआ था, और भगवद्गीता के अलौकिक भाष्यकार स्वयं भगवद्स्वरूप स्वरूप ज्ञानेश्वर महाराज का जन्म जन्माष्टमी के पावन अवसर पर मध्यरात्रि मे हुआ। यह अपूर्व संयोग है और इस संयोग के अवसर पर आज हम लोग अपने एक संकल्प की पूर्ति का आनंद अभिव्यक्त कर रहे हैं, वास्तव मे यह अशक्यप्राय लग रहा था कि हम इतने लोगों तक पहुंच पायेंगे, इतने देशों मे पहुंच पायेंगे और इस प्रकार का भगवद्गीतामय वातावरण सारे संसार में निर्माण कर पायेंगे, ये सब अविश्वसनीय भी हो सकता था, हम इसकी कल्पना भी नही कर सकते थे किन्तु अचिंत्य लीला भगवान की, इस कोविड के काल के अत्यंत आपत्तिजनक समय को अवसर बनाकर के हमारे कार्यकर्ताओं ने परिश्रम की पराकाष्ठा की है। उसका अत्यंत सुमधुर फल हम लोग आज अनुभव कर रहे हैं और यह करते समय हम लोगों को आशीर्वाद देने हेतु हमारे मार्गदर्शक और राष्ट्र के सभी पहलुओं मे सूक्ष्म चिंतन करके देश को नई दिशा देने के लिए आचार्यसभा का निर्माण जिन्होने किया ऐसे ब्रह्मलीन पूज्य स्वामीजी दयानंद सरस्वती महाराज के परम शिष्य और आर्शविद्या गुरूकुलम के राजकोट आश्रम के संस्थापक, संचालक पूज्य स्वामीजी परमानंद सरस्वती के चरणों मे मैं साष्टांग वंदन करता हूं। श्री महाराज जी ने पारंपरिक पद्धति से वेदांत का और प्रस्थानत्रयी का पूरा अध्ययन भी किया, आधुनिक पद्धति से मैनेजमेंट आदि विषयों का उनका गहरा चिंतन है। वे अपने अद्भुत वक्तृत्व से अपने ज्ञान का उपयोग अपने समाज के लिए, राष्ट्र की रक्षाके लिए कैसे strategic चिंतन करना चाहिये, ये सारी शिक्षाएं हम पूज्य स्वामीजी से प्राप्त करते हैं। वे इस समय हिंदू धर्म आचार्य सभा के समन्वयक के रूप में अत्यंत बड़ा कार्य कर रहे हैं । हमारे सभी पीठाधीश आचार्यों को जोड़ कर हम सभी की एक आवाज कैसे बनेगी, इसका वे स्वयं मार्गदर्शन कर रहे हैं, इसके साथ साथ हमारा स्वाध्याय संगम होता आ रहा, इसके भी वे मार्गदर्शक और उसके अभ्यासक्रम के निर्णायक रहे हैं। वेदांत पाठ लेना, वेदांत के प्रवचन करना और नित्य आराधना मे तल्लीन रंगनाथ ये सारे स्वामीजी के विशेष अनुकरणीय हैं। उनका आशीर्वाद हम सबको मिले ऐसी मेरी बहुत तीव्र लालसा थी, पूज्य स्वामीजी महाराज जी ने उसे अनुग्रहपूर्वक स्वीकार किया, हम उनका सप्रणाम स्वागत करते है।
इस समय मैं विशेष अभिनंदन करना चाहता हूं, हमारे जिन भाई बहनों ने इस वर्ष मे गीता के 18 अध्याय निर्दोष कंठस्थ कर लिए हैं और परीक्षा भी दी हैं, उन्होनें गीताव्रती की उपाधि प्राप्त कर ली।
सारे 18 अध्याय कंठस्थ करने के बाद आगे क्या, हमारा मिशन स्टेटमेंट हैं , ‘गीता पढ़ें, पढ़ायें, जीवन मे लायें’। गीता पढ़ना, पढ़ाना, जीवन मे लाना ये तो सतत् चलने वाला कार्यक्रम हैं, ये एक सत्र की पूर्णाहुति है, ये इस वर्ष की पूर्णाहुति हैं, अपने कार्य की पूर्णाहुति नही हैं, आपके अध्ययन की पूर्णाहुति नही हैं।
पूर्णाहुति के अवसर पर पूज्य स्वामी जी ने श्रीराम जी के सुंदर विग्रह के साथ आदरणीय आशू भैया जी एवं पूजा भाभी जी का सम्मान किया। उनके द्वारा किये गए अभूतपूर्व कार्य एवं अथक परिश्रम की सभी ने भूरि-भूरि प्रशंसा की। तत्पश्चात् अवसर था अपने गीता चार धाम की यात्रा के अनुभवों को सबके समक्ष रखने का, जिस हेतु बारी बारी से गीताव्रती साधक श्री निर्मल द्विवेदी जी एवं सुश्री मेघा तापड़िया जी ने सबके समक्ष अपने दिव्य मनोभाव प्रकट किए। परीक्षा के स्वरूप को समझने हेतु दो परीक्षार्थियों के परीक्षण की प्रतिकृति प्रस्तुत भी की गयीं। जिनमें 8 वर्षीया श्रिया अग्रवाल एवं 59 वर्षीया श्रीमती शांता भूतड़ा जी सम्मिलित रही एवं उनका परीक्षण आदरणीय प्रशिक्षिका रुपाली कापरे दीदी, अनघा भातखण्डे दीदी ने किया।
तत्पश्चात् स्वामी परमानंद सरस्वती जी महाराज ने गीता के सम्बंध में अपने मौलिक विचार प्रस्तुत किए जो अत्यंत ही सर्वग्राही एवं उत्तम थे। स्वामीजी ने गीता के महत्व को समझाने हेतु 4 बातें कहीं जो इस प्रकार से थी : प्रथम सिद्धान्त -
**गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।
या स्वंय पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिः सृता ।।**
गीता स्वयं पद्मनाभ भगवान् श्रीविष्णु के मुखारविंद से निकली हुई हैं। गीता को माँ कृष्ण को पिता एवं अर्जुन को पुत्र स्वरूप बताते हुए कहा कि गीता तो भगवान के मुख से लोककल्याण हेतु अकस्मात् प्रकट हुई है। जैसे पुत्र की पिता के कोप से रक्षा करने हेतु माँ बीच में आ जाती है। “गीता मे हृदयं पार्थ” गीता स्वयं भगवान का हृदय है।
दूसरा महत्व बताते हुए स्वामी जी बताते हैं की भगवान वेदव्यास बहुत बड़े युगद्रष्टा थे। उन्होंने जान लिया था की आने वाले वर्षों में मनुष्य की ज्ञान, मेधा व स्मरण शक्ति क्षीण हो जाएगी। अतः सम्पूर्ण ज्ञान को 4 वेदों में तत्पश्चात् सारे उपनिषदों का सार गीता में उतार दिया।गीता का तीसरा महत्व बताते हुए स्वामी जी कहते हैं कि
**सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः।
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्।।**
गोपाल भगवान् श्रीकृष्ण ने सभी उपनिषदरूपी गायों के दूध को अर्जुन रूपी बछड़े को रखकर दुहा है।
चौथा एवं अंतिम महत्व का विस्तार करते हुए महाराज जी बताते हैं कि उपनिषदों का सार पाने हेतु ब्रह्मचारी, सन्न्यासी एवं विरक्त शिष्य अरण्य में ऋषियों के पास जाते थे। किंतु अरण्य की विद्या को भगवान् श्रीकृष्ण ने सरल रूप में गृहस्थ अर्जुन को रणभूमि में प्रदान किया है।
आगे गीता जी के ज्ञान को आज के मानव हेतु अति उपयुक्त बताते हुए स्वामी जी बताते हैं की पहले अध्याय में जिस तरह अर्जुन अत्यंत ही विषाद एवं तनावग्रस्त थे। वैसी ही स्थिति आज के मानव की है। अर्जुन की तरह ही हम भी चारों ओर से स्वजनों, उलझनों एवं समस्याओं से घिरे हुए हैं। हमारा मन ही कुरुक्षेत्र है।
गीता में भगवान ने मात्र परिस्थिति जन्य समस्याओं का ही नहीं वरन् जीवन के मूलभूत समस्याओं का भी समाधान दिया है। अतः आज भी गीता उतनी ही प्रासंगिक है।
प्रत्येक मानव जो धर्म अर्थात् सत्य, नैतिकता व कर्तव्यनिष्ठा के मार्ग पर चलना चाहता है वह अर्जुन की तरह है एवं उसका मन कुरुक्षेत्र है। समान्यतः धर्म को आस्था विशेष समझा जाता है किंतु धर्म कर्तव्य विषयक है। गीता के साधक को कर्तव्यनिष्ठ व नैतिकतानिष्ठ होना चाहिए। यही सच्चा बल है और यही हमारी भारतीय संस्कृति की पहचान है।
धर्मप्रधान कई लोग हैं किन्तु इनका भी एक अभिगम होना चाहिए जिसे कर्मयोग कहते हैं। सर्वकर्म को ईश्वर के चरणों मे अर्पित करना ही कर्मयोग है।
आज सभी को अधिक की इच्छा है अत: सभी विषादग्रस्त हैं, अधूरे, अपूर्ण व दु:खी हैं। गीता विषाद से छूटने की विद्या है। गीताव्रती बनना बहुत ही उत्तम है। पर हमें इसके अतिरिक्त गीताज्ञान भी प्राप्त करने में लगना चाहिए। जीवन मे 1 या 2 अध्याय को नित्य पढ़ने का नियम बनाना चाहिए। जीवन में रोज गीता को उतारना ही मनन है। रोज पढ़ने से जीवन में शास्त्र कृपा उतरती है। आप सभी शास्त्र रसिक एवं आत्मरसिक हो जाओ ऐसा आशीर्वाद देते हुए स्वामी परमानन्द सरस्वती जी महाराज ने सभी को साधुवाद देते हुए अपनी वाणी को विराम दिया।
आदरणीय संजय जी मालपाणी भैया ने स्वामीजी के अनेक कार्यों के वर्णन पश्चात् श्रद्धा दीदी के धन्यवाद ज्ञापन, अनुजा लाहोटी दीदी की अंतिम प्रार्थना तथा गीताव्रती परीक्षा के कुछ अविस्मरणीय क्षणों के प्रदर्शन के साथ सभा का समापन किया गया।


